भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१३८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पान के दो पीक थूकने के बाद खाने का विधान—पान का पहला पीक विष की भाँति, दूसरा पीक भेदी (मल को भेदन करने वाला) और दुर्जर (जल्दी नहीं पचने वाला) होता है। अत एव इन दोनों को थूकने के बाद तीसरे पीक से पान खाना चाहिये। ऐसा पान अमृत तुल्य और रसायन होता है ॥१९३॥ अथाधिकताम्बूलभक्षणे दोषानाह- ताम्बूलं नातिसेवेत न विरिक्तो बुभुक्षितः ॥१९४॥ देहदृक्केशदन्ताग्निश्रोत्रवर्णबलक्षयः। शोषः पित्तानिलास्त्रं स्यादातिताम्बूलचर्वणात् ॥१९५॥ अधिक पान खाने से दोष—अधिक पान नहीं खाना चाहिये और जिसके दस्त आते हों तथा भूख लगी हो, उसे तो अधिक पान नहीं ही खाना चाहिये, क्योंकि अधिक पान खाने से देहदृष्टि-केश-दाँत-जठराग्नि-श्रवण (सुनने की शक्ति)-वर्ण और बल का क्षय होता है और शोष तथा पित्त, वायु और रक्त की दुष्टि होती है ॥१९४-१९५॥ अथ ताम्बूलभक्षणानर्हजनानाह- ताम्बूलं न हितं दन्तदुर्बलैक्षणरोगिणाम्। विषमूच्छामदार्त्तानां क्षयिणां रक्तपित्तिनाम् ॥१९६॥ पान खाने के अयोग्य पुरुष—दाँतरोग वाले, दुर्बल, नेत्ररोगी, विष, मूर्च्छा और मद रोग से युक्त क्षय तथा रक्तपित्त रोग वाले को पान खाना हितकर नहीं होता है ॥१९६॥ अथ भोजनोत्तरं चक्रमणगुणानाह- भुक्त्वा शतपदं गच्छेच्छनैस्तेन तु जायते। अन्नसंघातशैथिल्यं ग्रीवाजानुकटीषु च ॥१९७॥ भोजन के बाद टहलने के गुण—भोजन करके धीरे धीरे सौ कदम तक टहलना चाहिये, ऐसा करने से भोजन किया हुआ अन्न का समूह उदर में शिथिल होता है एवं ग्रीवा, जानु (घुटना) तथा कमर को सुख पहुँचाता है ॥१९७॥ अथ भोजनोत्तरमुपवेशनशयनादिफलान्याह- भुक्त्वोपबिशतस्तन्द्रा शयानस्य तु पुष्टता। आयुश्चङ्क्रममाणस्य मृत्युर्धावति धावतः ॥१९८॥ भोजनोपरान्त बैठने, लेटने, टहलने और दौड़ने से लाभ—भोजन करके तुरन्त बैठने से तन्द्रा, लेटने से शरीर की पुष्टता, धीरे-धीरे सौ कदम टहलने से आयु की वृद्धि और दौड़ने से मृत्यु होती है ॥१९८॥ चङ्क्रममाणस्य=पदशतं शनैर्गच्छतः ॥१९८॥ यहाँ पर 'चङ्क्रममाणस्य' का 'धीरे-धीरे सौ कदम टहलने वाले की' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१९८॥ अथ भोजनोत्तरं शयनरीतिमाह- श्वासानष्टौ समुत्तानस्तान् द्विःपार्श्वे तु दक्षिणे। ततस्तद्द्विगुणान्वामे पश्चात्स्वप्याद्यथासुखम् ॥१९९॥ भोजनोपरान्त शयन विधि—भोजनोपरान्त प्रथम आठ श्वास तक उत्तान लेटे, उसके बाद उससे दूना (सोलह) श्वास तक दाहिने करवट लेटे, उसके बाद उससे दूना (बत्तीस) श्वास तक बायें करवट लेने तत्पश्चात् जैसी इच्छा हो वैसे लेटे ॥१९९॥ अथ सर्वदा वामपार्श्वेन शयने हेतुमाह- वामदिशायामनलो नाभेरूर्ध्वंऽस्ति जन्तूनाम्। तस्मात्तु वामपार्श्वं शयीत भुक्तप्रपाकार्थम् ॥२००॥ सर्वदा बायें करवट लेटने का विधान—प्राणियों के बाईं तरफ नाभि के ऊर्ध्व भाग में जठराग्नि रहती है, अतः खाये हुये अन्न के शीघ्र परिपाक होने के निमित्त मनुष्यों को सर्वदा बायें करवट सोना चाहिये ॥२००॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA