भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० भावप्रकाशनिघण्टुः के साथ खिलाते हैं इसके पत्तों का रस घी के साथ मिला कर परिसर्प में लगाया जाता है। मांसक्षय वाले बच्चों को इससे सिद्ध तैल की मालिश की जाती है। अथ पाषाणभेदः, तस्य नामानि गुणाँश्चाह पाषाणभेदकोऽश्मघ्नो गिरिभिद्भिद्र्नयोजिनी । अश्मभेदो हिमस्तिक्तः कषायो बस्तिशोधनः ॥१८४॥ भेदनो हन्ति दोषार्शोगुल्मकृच्छ्राश्महृद्रुजः । योनिरोगान्प्रमेहांश्च प्लीहशूलव्रणानि च ॥१८५॥ ६२. पाषाणभेद पाषाणभेद एक संदिग्ध वस्तु है। इसके स्थान पर अनेक वनस्पतियाँ ली जाती हैं तथा विभिन्न विद्वान् भिन्न-भिन्न वनस्पतियों को पाषाणभेद मानते हैं। राजनिघण्टु में पाषाणभेदक, वटपत्री, शिलावल्का तथा चतुष्पत्री ये पाषाणभेद के चार भेद वर्णित हैं। निम्नलिखित वनस्पतियों को भिन्न-भिन्न आधुनिक विद्वान् पाषाणभेद मानते हैं— १. Saxifraga ligulata, Wall. (सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा, वॉल)। Fam. Saxifragaceae (सॅक्सिफ्रॅगासी)। २. Aerva lanata, Juss (एरूवा लॅनेटा, जस०)। Fam. Amaranthaceae (अॅमरेन्थेसी)। ३. Kalanchoe pinnata Pers. (कॅलॅञ्च पिन्नॅटा पर्स०)। Fam. Crassulaceae (क्रॅस्सुलसी)। ४. Coleus aromaticus, Benth. (कोलिअस् ॲरोमेटिकस्, बेन्थ०)। Fam. Labiatae (लेबियेटी)। ५. Homonoia riparia, Lour. (होमोनोइया राइपेरिया, लोर)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बियेसी)। ६. Rotula aquatica Lour. (रोटूला ॲक्वॅटिका लोर०)। Fam. Boraginaceae (बोरॅजिनॅसी)। ७. Ocimum basilicum Linn. (ओसिमम् बॅसिलिकम् लिन०)। Fam. Labiatae (लेबिएटी)। इन वनस्पतियों के अतिरिक्त कुछ लोगों ने एक खनिज पाषाणभेद भी लिखा है लेकिन उसका विशेष वर्णन नहीं मिलता है। उपर्युक्त वनस्पतियों में से अधिकांश मूत्रल अवश्य हैं लेकिन प्रथम वनस्पति सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा का ही ग्रहण पाषाणभेद नाम से उचित है। उपर्युक्त वनस्पतियों का अलग-अलग वर्णन आगे दिया जा रहा है। ओसिसम् बॅसिलिकम् का वर्णन आगे तुलसी के साथ दिया जावेगा। (१) Saxifraga ligulata, Wall. (सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा, वाल.)। Fam. Saxifragaceae (सॅक्सिफ्रॅगासी)। सं०—पाषाणभेद, वटपत्रीभेद। हिं०—पखानभेद, सिलफडा, पोपल, वनपत्रक, दकचु। म०—पाषाणभेद। पं०— शफ्रोकी। ने०—सोहंपे सोआ। का०—बथेव। रावी—सप्रोत्री। खासिया—अतिअ। चिनाव—बलपिआ। कुमाऊँ— शिलफोडा। इसके पौधे काश्मीर, नेपाल तथा हिमालय के मध्य भाग में प्रायः ५००० फीट के ऊपर पर्वतों की ढालों पर पत्थरों की दरारों में बहुतायत से निकलते रहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA