भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः ३०१ यह क्षुप जाति की वनस्पति बारहों मास पायी जाती है। मूलस्तम्भ-रक्ताभ (भीतर सफेद) और लगभग एक इञ्च मोटा होता है। इससे पतले उपमूल निकलकर पत्थरों के बीच में फैले रहते हैं। पत्र-मांसल, चिकने, कुछ-कुछ गोलाई लिये, प्रायः ३-५ इञ्च व्यास में, किनारे पर सूक्ष्म सघन शूकों से युक्त (Ciliate = सीलियेत) तथा निचले पृष्ठ पर प्रायः गुलाबी रंग के होते हैं। एक स्थान में प्रायः ३ या ४ पत्तियों से अधिक नहीं निकलतीं। फूल-छोटे, सफेद, गुलाबी या जामुनी रंग के आते हैं। फल-नीलाभ श्वेत तथा छोटे होते हैं। इनके मोटे मूल के टुकड़े बाजार में बिकते हैं। ये टुकड़े करीब १-२ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च मोटे, कपिशवर्ण के, कड़े एवं इनकी छाल खुरदरी तथा झुर्रीदार होती है। इन पर टूटे हुये उपमूलों के निशान एवं गोल गढ़े रहते हैं। इनका आन्तरिक भाग सफेद होता है। इनका स्वाद कुछ सुगन्धित एवं कसैला होता है। कुछ लोग इसे वटपत्री मानते हैं। रासायनिक संगठन-इसके मूल में चूना ११ १/२%, टॉनिक् तथा गॉलिकु ॲसिड १५ १/२%, शर्करा ५ १/२%, गोंद २ ३/४%, स्टार्च १९%, खनिजक्षार ३ ३/४% तथा कॅल्शियम ऑक्झॅलेट् (Calcium oxalate ११ ३/४% होता है। गुण और प्रयोग-इसका मूल स्नेहन, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न, ग्राही एवं श्लेष्मघ्न है। इससे मूत्र की वृद्धि होकर उसकी अस्वच्छता दूर होती है तथा अश्मरी भी घुलकर निकल जाती है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी, बस्तिरोग, आमातिसार एवं कास आदि फुप्फुस विकारों में किया जाता है। (१) वृक्कशूल एवं अश्मरी आदि में इससे बहुत लाभ होता है। (२) बच्चों में इसको दूध में घिसकर देने से पेशाब की अस्वच्छता दूर होती है। दन्तोद्भेद के समय जब मुख में व्रण होते हैं तब इसको मधु के साथ घिसकर लगाते हैं। (३) फोड़ों एवं नेत्राभिष्यन्द में इसका लेप किया जाता है। (४) ग्राही होने के कारण आमातिसार में इससे लाभ होता है। आंत्र के लिए बल्य होने के कारण ज्वर में अतिसार होने पर इसका उपयोग किया जाता है। आन्त्रशिथिलता के कारण उत्पन्न अतिसार में भी प्रयोग किया जा सकता है। मात्रा- चूर्ण ५-१० रत्ती। (२) Aerva lanata, Juss. (एरुवा लॅनेटा, जस०)। Fam. Amaranthaceae (ॲमॅरेन्थेसी)। सं०-आदानपाकी, शतकाभेदी ? हिं०-गोरखगांजा, गोरखबूटी, कपूरीजड़ी। बं०-चय। गु०-गोरख गांजो, कपुरी मधुरी। म०-कपुरफुटी, कुम्रपिंडी। पं०-भु(बु) इकल्लान। सिं०-बुइ। ता०-चिरूबूलै। ते०-पेंडिडोंड। क०-विलेसुलि। मला०-चिरापूल। इसके छोटे बहुवर्षायु क्षुप सभी स्थानों में मैदानों में पाये जाते हैं। कांड-अनेक, लचीले लेकिन स्वावलम्बी तथा श्वेत रोमों से युक्त। पत्र-एकांतारित, प्रधान काण्ड पर एक इञ्च तक लम्बे, आधा इञ्च तक चौड़े तथा अन्य शाखाओं पर छोटे, दीर्घ वृत्ताकार या अर्ध अंडाकार या कुछ गोलाई लिए हुये एवं अधोतल पर श्वेतरोमयुक्त होते हैं। पुष्प- छोटे, हरिताभ श्वेत, गुच्छों में आते हैं। फल-चर्मल फल होता है जिसमें चमकीला काला बीज होता है। मूल- अनन्तमूल के समान और कर्पूर सदृश गन्धयुक्त। इसके पुष्पों को उत्तर हिन्दुस्तान में भु(बु) इकल्लान एवं गुजरात में बूर कहते हैं।