भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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३०२ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग- यह स्नेहन, मूत्रजनन, वेदनाहर, अश्मरीघ्न, कृमिघ्न एवं कासहर है। इसकी क्रिया अपामार्ग की तरह होती है। बस्तिस्थ अश्मरी में इसके पुष्पों का फांट देने से बहुत लाभ होता है। मूत्रकृच्छ्र में इसके मूल का क्वाथ देने से मूत्र की राशि बढ़कर लाभ होता है। तमकश्वास में इसकी सूखी पत्तियों तथा पुष्पों का धूम्रपान किया जाता है। (३) Kalanchoe piunata pers. (कॅलॅञ्चो पिन्नॅटा पर्स०)। Fam. Crassulaceae (क्रासुलेसी)। सं०-पर्णबीज। हिं०-जखमेहयात, अहिरावण, महिरावण, पथरचूर। बं०-कोप्पाता। म०-घायमारी। क०-काडुसले। इसके मांसल, बहुवर्षायु क्षुप भारतवर्ष के सभी भागों में उत्पन्न होते हैं लेकिन दक्षिणी बंगाल में अधिक पाये जाते हैं। कांड-स्वावलम्बी, मोटा, पोला, लाल तथा ४ फीट तक ऊँचा। पत्र-नीचे के प्रायःसाधारण किन्तु ऊपर के संयुक्त, ३-५ या कभी ७ पत्रकों से युक्त। पत्रक-गोलदन्तुर, विपरीत क्रम में, मांसल एवं लट्वाकार। पुष्प-बड़े, नलिकाकार, २ इञ्च लम्बे, रक्ताभ हरित तथा नीचे की ओर झुके हुये। इसके पत्तों के मूल से अंकुर प्ररोह निकलकर नया पौधा उत्पन्न हो जाता है। इसके पत्तों एवं स्वरस का औषध में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके स्वरस में कॅल्शियम् सल्फेट् (Calcium Sulphate) तथा ॲसिड टारट्रेट् ऑफ पोटॅशियम् (Acid Tartrate of Potassium) एवं बचे हुए कल्क में कॅल्शियम् ऑक्सॅलेट् (Calcium oxalate) होता है। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते व्रणशोधक, व्रणरोपक, रक्तस्तम्भक, ग्राही तथा प्रतिदूषक हैं। इसका उपयोग रक्तस्राव, चोट, अतिसार, अश्मरी एवं विसूचिका आदि में किया जाता है। यह रक्तवाहिनी केशिकाओं का संकोच करके रक्तस्राव रोकता है इसलिये आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के रक्तस्राव में लाभदायक है। (१) रक्तयुक्त अतिसार में इसके पत्तों का रस १/४ से १/२ तोला, जीरा तथा दुगने घी के साथ देने से खून गिरना बन्द होता है। (२) चोट, मोच, सभी प्रकार के व्रण, फोड़े एवं कीटदंश आदि पर इसके पत्तों को जरा गरम करके कूचकर बाँधने से सूजन, रक्तिमा एवं वेदना कम होकर लाभ होता है। घावों के लिये यह बहुत ही अच्छी ओषधि है। नये व्रण का इतने जल्दी व्रण पूरण होता है कि बाद में निशान तक नहीं रहता। मात्रा-१/४-१/२ तोला। (४) Coleus aromaticus, Benth. (कोलिअस् ॲरोमेटिकस्, बेन्थ.) Fam. Labiatae (लॅवियेटी)। सं०-पाषाणभेदी। हिं०-पाथरचुर, पत्थरचूर, पाषाणभेद। बं०-पाथर कुची, अम्ल कुची, पातेरचूर। म०- पानांचा ओवा। गो०-ओवापान। ता०-कर्पूरवल्ली। अं०-Country borage (कण्ट्री बोरेज)। इसका बहुवर्षायु क्षुप भारतवर्ष के सभी प्रान्तों में तथा लङ्का में बगीचों आदि में रोपण किया जाता है। राजपुताना में वन्य अवस्था में भी मिलता है। इसका क्षुप-१-३ फीट ऊँचा; कांड-सरस; पत्र-मोटे, सरस, गूदेदार, दन्तुर, रोमश, १-३ इञ्च के घेरे में, गोलाकार, सुगन्धयुक्त एवं स्वाद में कटु। पुष्प-पुराने क्षुपों में १/८ इञ्च लम्बे, हलके बैंगनी तथा गुच्छों में आते हैं। मद्य को सुगन्धित करने के लिये इसका उपयोग करते हैं। औषध में इसके पञ्चाङ्ग का व्यवहार किया जाता है। मवेशियों के रोगों में भी इसे व्यवहार में लाते हैं। बंगाल की तरफ पाषाण भेद नाम से इसका उपयोग किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA