भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०४ भावप्रकाशनिघण्टुः ने०-दहिरी। ले०-Woodfordia floribunda, Salisb. (बुडफोर्डिआ फ्लोरीबंडा, सॅलिस्ब); Syn. Woodfordia fruticosa Kurz. (वुडफोर्डिआ फ्रूटिकोसा, कुर्ज.) । Fam. Lythraceae (लिथ्रेसी) । धातकी के क्षुप प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं देखने में आते हैं। ये पहाड़ों में ५ हजार फीट की ऊँचाई तक एवं देहरादून के जंगलों में बहुतायत से पाये जाते हैं तथा वाटिकाओं में भी रोपण किये जाते हैं। इसका क्षुप-बड़ा तथा १०-१२ फीट तक ऊँचा होता है। शाखाएँ-लम्बी, फैली हुई और सघन रहती हैं। नवीन शाखाओं तथा पत्तियों पर काले-काले बिन्दु होते हैं। पत्ते-समवर्ती या कुछ विषमवर्ती और कहीं-कहीं तीन-तीन पत्ते एक साथ गुच्छों में दिखाई पड़ते हैं। वे २-४ इञ्च लम्बे, ३/४-११/४ इञ्च चौड़े, मालाकार या लट्वाकार-भालाकार, नोकदार तथा सरलधार होते हैं। पुष्प-१/२ से ३/४ इञ्च, चमकीले लालरंग के नलिकाकार फूल आते हैं। यह शाखाओं के संपूर्ण काण्ड से छोटे-छोटे गुच्छों में निकले रहते हैं। बीजकोष-छोटा और बीज-चिकने भूरे रंग के होते हैं। औषधि के लिये इसके फूलों का व्यवहार किया जाता है तथा इससे रेशम रँगने के लिये एक लाल रंग निकाला जाता है। रासायनिक संगठन-इसके फूलों में २०१/२% टॅनिन् होता है तथा इसके क्षुप से एक प्रकार का गोंद भी निकलता है जो रँगने के काम आता है। गुण और प्रयोग-इसके फूल संग्राहक, उत्तेजक, विषहर, रक्तस्राव रोकने वाले एवं व्रणशोधक तथा व्रणरोपक होते हैं। इनका प्रयोग अतिसार, रक्तातिसार, ज्वरातिसार, प्रवाहिका, संग्रहणी, रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, अर्श, यकृत् विकार, सर्पविष तथा व्रण में किया जाता है। गर्भिणी में उत्तेजक औषध के रूप में बिना किसी हानि के इसका प्रयोग किया जा सकता है। अतिसार आदि में इसके साथ अन्य औषधियाँ भी दी जाती हैं। आसवों में सन्धान क्रिया ठीक होने एवं उसका रंग सुन्दर बनाने के लिये इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। (१) अतिसार एवं प्रवाहिका आदि में मट्ठे या मधु के साथ इसका पुष्पचूर्ण दिया जाता है या धाय के फूल, बेल की गुद्दी, लोध्र की छाल, सुगन्धवाला एवं गजपीपल सब समान लेकर, २ तोले का क्वाथ बनाकर प्रयोग करते हैं। बच्चों के अतिसार में भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। (२) मधु के साथ इसका चूर्ण या अवलेह रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर एवं अर्श आदि में लाभदायक है। श्वेतप्रदर में १ तोला पुष्प चावल के धोवन के साथ दिया जाता है। (३) कोंकण की तरफ 'मण्यारी' नामक सर्पविष के लिये यह रामबाण औषध मानी जाती है। इसके लिये धाय के पत्तों का स्वरस पिलाते हैं, नाक में डालते हैं एवं शरीर पर उसे मलते हैं। (४) पैत्तिक शिरःशूल में इसके पत्तों का स्वरस सिर पर लगाया जाता है तथा उसके साथ-साथ मुख में तैल का कवलग्रह किया जाता है। (५) पानीदार विस्फोटों एवं दुर्गन्धयुक्त व्रणों में स्राव को कम करने के लिये तथा व्रण पूरण के लिये इसके पुष्पचूर्ण का उपयोग किया जाता है तथा इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन भी करते हैं। (६) आसवारिष्टों में शीघ्र किण्वोत्पत्ति के लिए धाय के फूलों का व्यवहार किया जाता है। इससे सन्धान भली प्रकार हो जाता है। मात्रा-पुष्पचूर्ण १-२ माशा। अथ मञ्जिष्ठा (मंजीठ) तस्या नामानि गुणाँश्चाह मञ्जिष्ठा विकसा जिङ्गी समङ्गा कालमेषिका ।।१८६८।।