भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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हरीतक्यादिवर्गः ३०५ मण्डूकपर्णी भण्डीरी भण्डी योजनवल्ल्यपि । रसायन्यरुणा काला रक्ताङ्गी रक्तयष्टिका ।।१८९।। भण्डीतकी च गण्डीरी मञ्जूषा वस्त्ररञ्जिनी । मञ्जिष्ठा मधुरा तिक्ता कषाया स्वरवर्णकृत् ।।१९०।। गुरुरुष्णा विषश्लेष्मशोथयोन्यक्षिकर्णरुक् । रक्तातीसारकुष्ठास्रवीसर्पव्रणमेहनुत् ।।१९१।। मंजीठ के नाम तथा गुण-मंजिष्ठा, विकसा, जिङ्गी, समङ्गा, कालमेषिका, मण्डूकपर्णी, भण्डीरी, भण्डी, योजनवल्ली, रसायनी, अरुणा, काला, रक्ताङ्गी, रक्तयष्टिका, भण्डीतकी, गण्डीरी, मञ्जूषा और वस्त्ररञ्जिनी ये सब मंजीठ के नाम हैं। मंजीठ-मधुर, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्वर को उत्तम करने वाली तथा वर्ण को उज्ज्वल करने वाली, गुरु, तथा उष्णवीर्य होती है और विष, कफ, शोथ, योनि, नेत्र तथा कर्ण सम्बन्धी रोग, रक्तातिसार, कुष्ठ, रक्तदोष, विसर्प, व्रण और प्रमेह दूर करने वाली होती है। [१८८-१९१] ६४. मञ्जिष्ठा (मजीठ) हिं०-मजीठ, मंजीठ। बं०-मञ्जिष्ठा। म०-मञ्जिष्ठ। ते०-मञ्जिष्ठतीती, ताम्रवल्ली, मण्डास्टिक। ता०- मञ्जिट्टी, मन्दित्ता। गु०-मजीठ। पं०-मञ्जीठ। मल०-पून्त। फा०-रोदक। अ०-फुब्बतु, फुब्बाह, फौहुल अवागीन। अं०-Madder root (मँडर रूट); Indian madder (इण्डियन् मँडर)। ले०-Rubia cordifolia, Linn. (रूबिया कॉर्डिफोलिया, लिन०)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। मंजीठ इस देश की पहाड़ी भूमि में पश्चिमोत्तर हिमालय से पूर्व की ओर तथा दक्षिण की ओर नीलगिरी, सीलोन और मलाका एवं नेपाल में ८ हजार फीट तक उत्पन्न होती है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में दूर-दूर तक फैल जाती है। इसकी लम्बी जड़ भूमि के भीतर दूर तक घुस जाती है। डंठल-कई गज लम्बा, गावदुम, खुरदरा, जड़ की ओर कठोर। छाल-सफेदी मायल किन्तु भीतर का भाग लाल होता है। शाखा-प्रशाखाओं करके सघन बेल निकटवर्त्ती वृक्षों पर चढ़कर फैलती है। पत्ते-प्रत्येक ग्रन्थि पर चार-चार के चक्रों में, जिसमें से दो बड़े होते हैं। ये १॥ से ४ इञ्च लम्बे, लट्वाकार-ताम्बूलाकार, नोकीले, खरस्पर्श युक्त या चिकने होते हैं। पत्रनाल-२ से ४ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प-नन्हें-नन्हें श्वेतवर्ण के गुच्छों में रहते हैं। फल- काले, चने के बराबर तथा दो बीजों से युक्त होते हैं। मूल-लम्बे, लम्बगोल तथा ताजी अवस्था में लाल तथा सूखने पर कुछ काले हो जाते हैं। मूल का स्वाद प्रारम्भ में मिठास लिये हुये, लेकिन बाद में कुछ तीता और कड़वा होता है। इन्हीं मूलों का औषध में व्यवहार किया जाता है। बाजार में नेपाली, ईरानी, अफगानी तथा हिन्दुस्तानी नाम से चार प्रकार के मूल बिकते हैं जिसमें से अफगानी मूल जो सिन्ध के रास्ते से आता है वह अच्छा समझा जाता है तथा हिन्दुस्तानी कनिष्ठ मानते हैं। इनका व्यवहार रँगने के काम में भी किया जाता है। इसका पर्याय नाम जो 'समङ्गा' दिया गया है उसके विषय में विद्वानों में मतभेद है। इसकी कभी-कभी चिरायते में मिलावट रहती है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में राल, गोंद, शर्करा, चूने के योग एवं रञ्जक पदार्थ पाये जाते हैं। रंजक द्रव्यों में रक्त रवेदार पर्प्यूरिन (Purpurin), पीत ग्लूकोसाइड मंजिस्टिन एवं गैरेंसिन् (Manjistin & Garancin), नारंगरक्त अॅलिझॅरिन् (Alizarin) एवं पीत क्झॅन्थाइन् (Xanthine) आदि पाये जाते हैं। गुण तथा प्रयोग-यह रक्तशोधक, ग्राही, पौष्टिक, गर्भाशय संकोचक, शोथघ्न, त्वग्दोषहर, वेदनास्थापक, मूत्रल एवं व्रणरोपक है। अल्पमात्रा में देने से इससे मस्तिष्क एवं वातनाड़ियों पर शामक प्रभाव पड़ता है लेकिन अधिक मात्रा में देने से कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। इससे मूत्र एवं दुग्ध का रंग लाल हो जाता है। इसका क्वाथ अङ्गघात, कामला, मूत्रावरोध, अश्मरी, आर्तवविकार, अनार्तव, शोथ, रक्तातिसार, प्रमेह, छाती के शोथयुक्त विकार एवं चर्मरोग आदि में दिया जाता है। (१) मंजिष्ठादि क्वाथ का उपयोग चर्मरोगों में बहुत लाभदायक है। इसके प्रयोग से त्वचा की रक्ताभिसरण क्रिया २३ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA