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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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३०६ भावप्रकाशनिघण्टुः बढ़ कर उसकी विनिमय क्रिया में परिवर्तन होता है। इससे वातरक्त, दाद, खुजली, श्वित्र एवं व्यंग आदि में बहुत लाभ होता है। (२) यह गर्भाशय संकोचक होने से प्रसव के बाद गर्भाशय शुद्धि के लिये इसके साथ ईश्वर मूल, पिपरामूल आदि अन्य औषधियों का प्रयोग किया जाता है। इससे गर्भाशय संकोच होकर स्राव की वृद्धि होती है तथा पीड़ा कम होती है। (३) अश्मरी में शस्त्रकर्म करने के पूर्व एक बार इसका प्रयोग करके देखना चाहिये। इसके चूर्ण को १ माशे की मात्रा में दिन में ३ बार देना चाहिये। इससे सभी प्रकार की पथरी गलकर निकल जाती है। यदि इससे लाभ न हुआ तो फिर शस्त्रकर्म किया जा सकता है। (४) यह फक्कारोग (Rickets) राजयक्ष्मा, आंत्रिकशैथिल्य एवं दुर्गन्ध युक्त जीर्ण अतिसार आदि में भी लाभदायक है। राजयक्ष्मज अतिसार एवं आंत्रिक व्रणों में इसके उपयोग से वेदना की शांति होती है। फुप्फुसावरणशोथ (प्ल्यूरिसी- Pleurisy)) आदि छाती के विकारों में भी इससे लाभ होता है। (५) मंजिष्ठ में चन्दन के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। (६) मधु के साथ इसको घिस कर लगाने से व्यङ्ग, दाद एवं श्वित्र आदि जीर्ण चर्मरोगों में बहुत लाभ होता है। लोध्र एवं चन्दन के साथ पीस कर इसे लगाने से विसर्प में लाभ होता है। (७) मञ्जीठ, अर्जुन, मुलेठी एवं सुगन्धवाला इनका क्वाथ अस्थिभग्न में पिलाया जाता है तथा उसी का लेप भी करते हैं। केवल मञ्जीठ एवं मुलेठी को काञ्जी में पीस कर लगाने से भी शोथ कम होकर पीड़ा कम होती है। (८) अग्निदग्ध व्रण पर मञ्जीठ, रक्तचन्दन तथा मूर्वा से सिद्ध घृत का उपयोग किया जाता है। इससे पीड़ा का शमन होकर व्रण दूर होता है। (९) इसके फल का प्रयोग यकृत् के कारण उत्पन्न अवरोध में किया जाता है। मात्रा-मूल चूर्ण १ से ३ माशा दिन में तीन बार। अथ कुसुम्भम्, तस्य नामानि गुणाँश्चाह स्यात्कुसुम्भं वह्निशिखं वस्त्ररञ्जकमित्यपि। कुसुम्भं वातलं कृच्छ्ररक्तपित्तकफापहम् ।।१९२।। कुसुम के नाम तथा गुण-कुसुम्भ, वह्निशिख और वस्त्ररञ्जक ये नाम कुसुम के हैं। कुसुम्भ-वातकारक तथा मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त और कफ का नाश करने वाला होता है। [१९२] ६५ कुसुम्भ हिं०-कुसुम, कुसुम्भ, बरें। बं०-कुसुम फूल। म०-करडई। गु०-कसुम्बो। क०-कसुम्बे। ते०-लतुक, लक्क, बंगारमु, वंगारम, अग्निशिखा, कुसुम्बा वित्तुलु। पं०-कूसम, कर्तुम, कुर्तुम, करर। उ० प्र०-बर्र, कर्र। फा०-खश्कदाने, गुलेमश्कर। अ०-अखरीज़, झरतम। अं०-Safflower (सैफ्फ्लावर); Parrot seed (पैरट्सीड); Bastard saffron (बॅस्टर्ड सॅस्फ़्रॉन्)। ले०-Carthamus tinctorius, Linn. (कार्थेमस् टिंक्टरियस, लिन.)। Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी)। इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। इसका क्षुप-१-३ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-लम्बे, किनारों पर कटे हुए, नुकीले और काँटेदार होते हैं। पुष्प-केसरिया लाल रंग के पुष्प गोल गुच्छों में आते हैं। फल- चतुष्कोणीय चर्मल फल आते हैं। बीज-सफेद, चिकने तथा शंख की आकृति के समान होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA