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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः ३०७ कृषिजन्य इसके अनेक प्रभेद पाये जाते हैं तथापि इनका वर्गीकरण दो वर्गों में किया जा सकता है। एक में काँटे होते हैं और दूसरे में काँटे नहीं होते। काँटे वाले की अपेक्षा बिना काँटे वाले के फूलों से बहुत उत्तम रंग निकलता है। काँटेवाले पौधे तैल की दृष्टि से अच्छे समझे जाते हैं। इसके पुष्पों के किञ्जल्क केसर के समान दिखलाई देते हैं तथा केसर में इनकी मिलावट की जाती है। असली केसर के तन्तु सुगन्धित तथा एक रङ्ग के होते हैं किन्तु कुसुम के किंजल्क तन्तु गन्धरहित तथा श्वेत धब्बों से युक्त होते हैं। इसके बीज, पंचांग, तैल, पुष्प एवं मूल का व्यवहार चिकित्सा में किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसके पुष्पों में जल में अविलेय कार्थामिन् (Carthamin) नामक एक लाल रंग एवं जल में विलेय अन्य पीत रंग पाये जाते हैं। इसके बीजों में २०-३०% तक एक स्थिर तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके बीज विरेचक, मूत्रल तथा बल्य होते हैं। इसका पुष्प विरेचक, स्वेदजनन, बल्य एवं आर्तव वृद्धिकर होता है। तैल विरेचक एवं व्रणरोपक है। इसका मूल मूत्रल तथा पंञ्चाग उष्ण होता है। (१) इसके कोमल पत्तों का शाक प्रतिश्याय में खाया जाता है। इसके पत्तों में रेनेट् (Rennet) की तरह दूध जमाने की शक्ति होती है। (२) इसके शुष्क पुष्पों को ४ माशे की मात्रा में कामला में देते हैं। इसका फांट स्वेदल होता है तथा प्रतिश्याय, कष्टार्तव एवं मांसपेशीय आमवात (Muscular rheumatism—मसक्यूलर ह्यूर्मैटिज्म) में दिया जाता है तथा इसका हिम रोमान्तिका आदि स्फोटक ज्वरों में (Eruptive fevers—एरप्टिह फोवरस्) में विस्फोट बाहर निकालने के लिये प्रयुक्त करते हैं। (३) इसके बीजों से प्राप्त तैल खाने के काम आता है। बाजारू मीठे तेल में तथा घी में इसकी मिलावट करते हैं। इससे पाखाना साफ होता है। प्रमेह में इसके तैल को खाने से लाभ होता है। खुजली में इसको ५, ६ बार लगाने से बहुत लाभ होता है। आमवात एवं सन्थिशोथ में इसकी मालिश की जाती है तथा व्रणों पर इसको लगाते हैं। सुगन्धि के काम के लिए विदेशों में इसका निर्यात किया जाता है। कुछ लोगों ने इसके पंचांग से सिद्ध तिल तैल का व्यवहार सन्थिशोथ, आमवात, अङ्गघात, खुजली एवं पुराने घाव आदि में लगाने के लिये लिखा है। कुसुम बीजतैल का प्रयोग भी इसके स्थान पर किया जा सकता है। इसकी खली टिकाऊ होती है तथा जानवरों के खाने के काम में एवं ऊख आदि के लिये खाद के रूप में काम में ली जाती है। साबुन एवं तैलीय रंगों में भी खली का उपयोग होता है। (४) इसके बीज द्राक्षारस के साथ अश्मरी एवं मूत्रकृच्छ्र में लाभदायक हैं। इसके बीजों की मांड मृदुविरेचक होती है एवं उदरशूल तथा आमवात में दी जाती है। प्रसूता में गर्भाशय की पीडा हो तो इसकी पुल्टिस् बनाकर पेडू पर बाँधा जाता है। मात्रा—शुष्क पुष्प चूर्ण २-४ माशा। बीज २-४ माशा। अथ लाक्षा (लाही) तस्या नामानि गुणाँश्चाह लाक्षा पलंकषालक्तो'यावो वृक्षामयो जतुः । लाक्षा वर्ण्या हिमा बल्या स्निग्धा च तुवरालघुः ।। १९३।। (ब्राह्मण्यङ्गारवल्ली' च खरशाखा च हञ्जिका) । अनुष्णा कफपित्तास्रहिक्काकासज्वरप्रणुत् ।। १९४।। व्रणोरःक्षतवीसर्पकृमिकुष्ठगदापहा । अलक्तको गुणैस्तद्वद्विशेषाद्द्व्यङ्गनाशनः ।। १९५।। लाख के नाम तथा गुण—लाक्षा, पलङ्कषा, अलक्त, याव, वृक्षामय और जतु ये सब लाख के पर्यायवाची शब्द हैं। किसी-किसी पुस्तकों में ब्राह्मणी, अङ्गारवल्ली, खरशाखा और हञ्जिका ये अधिक पर्याय मिलते हैं। लाख—शरीर १. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।