भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३१३ दारुहलदी की १२-१३ जाति की कंटकित झाड़ियाँ अधिकतर हिमालय के पहाड़ों पर तथा आसाम में पाई जाती हैं। इनमें से चार जातियाँ मध्य तथा दक्षिण भारत (निलगिरी पर्वत) में पाई जाती है। छोटा नागपुर के पारसनाथ की पहाड़ी पर भी एक भेद पाया जाता है। इनमें से विशेष रूप से ब० ॲरिस्टेटा एवं ३, ४ अन्य पौधों का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है जिनका वर्णन आगे दिया जा रहा है। गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने से सभी के गुण और प्रयोग एक साथ दिये गये हैं। गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने से सभी के गुण और प्रयोग एक साथ दिये गये हैं। दारुहलदी के मूल, काष्ठ, कांड, फल (जिसे झरिक्क कहते हैं) एवं सत्व (रसौंत) का व्यवहार किया जाता है। रसौंत का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। झरिक्क—ये कालाई लिये लाल तथा सूखने पर काले अंगूर की तरह दिखलाई देते हैं। ये काले अंगूर से छोटे तथा अधिकांश में बीजहीन होते हैं। इनका स्वाद खट्टा या रुचिकर खटमिठ्ठा होता है। (क) Berberis aristata, DC. (बर्बेरिस् ॲरिस्टॅटा, डीसी०)। जौन०—काशमोई। गढ०—किंगोरा। इसके क्षुप हिमालय पर्वत पर ६००० से १०५०० फीट की ऊँचाई पर एवं निलगिरी के पहाड़ों पर पाये जाते हैं। इसका क्षुप—बड़ा, पतनशील (Deciduous-डेसिड्यूअस्), कँटीला एवं साधारणतः ६ से १२ फीट तक ऊँचा लेकिन कभी-कभी १५ फीट तक ऊँचा एवं ८ इञ्च व्यास के कांड से युक्त होता है। शाखाएँ—श्वेताभ या हलके पीताभ धूसर वर्ण की होती हैं। पत्ते-१.५-४ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च चौड़े, अभिलटवाकार, चर्मवत्, सूक्ष्म शिराओं से युक्त, सरल धार वाले या दूर-दूर पर तीक्ष्ण काँटों से युक्त एवं उनका अधीपृष्ठ हलके हरे रङ्ग का होता है। फूल-स्वर्ण- पीत पुष्प २-३ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल-बीजिमांसल फल (Berry-बेरी), अण्डाकार, नीले बैंगनी रङ्ग के चमकीले एवं रजावृत होते हैं। मूल-पीताभ बादामी, नलिकाकार, कुछ गाँठदार, कड़े, मजबूत लेकिन लचीले, साधारणतः कटे हुवे टुकड़ों के रूप में एवं थोड़े सी शाखाओं से युक्त होते हैं। छाल-अंदर से गहरे बादामी रङ्ग की, मुलायम एवं तोड़ने पर चूर्ण रूप में हो जाती है। काष्ठ-नींबू के समान पीतवर्ण का, स्पष्ट एवं संकरी मज्जक किरणों से युक्त, जिसमें मज्जक प्रायः नहीं होता और यदि हो तो चमकीले पीतवर्ण का होता है। इसके काष्ठ में ताजी अवस्था में हलकी गन्ध एवं इसका स्वाद कड़वा होता है। इसको कितना भी उबालें तो भी यह पीला ही रहता है। (ख) B. asiatica, Roxb. ex DC. (ब० एशियाटिका, राक्सव, एक्स डीसी०)। हिं०-किलमोरा, किंगोरा। ने०-माटे किस्सी, चित्रा। इसके क्षुप प्रायः २-८ हजार फीट के बीच या कभी-कभी नीचे भी हिमालय की घाटियों में भूटान, गढ़वाल, बिहार, पारसनाथ की पहाड़ी तथा अफगानिस्तान आदि स्थानों पर पाये जाते हैं। इसका क्षुप-करीब ८ फीट ऊँचा होता है। शाखाएँ-धूसर वर्ण की होती हैं। इसकी पत्तियां-अण्डाकार या लट्वाकार, आयताकार, १-२ १/२ इञ्च लम्बी एवं चर्मवत् होती हैं। पत्तियों का शिराजाल ऊपरी पृष्ठ पर घना तथा दृढ़ होता है। पुष्प-मञ्जरियों में निकलते हैं। इसके फल-कृष्ण नील होते हैं। (ग) B. lycium, Royle (ब० लाइसियम्, रायलि०)। हि०-चतरोई, काशमल, दारुहरिद्रा। इसके क्षुप ३-७ हजार फीट की ऊँचाई पर पश्चिमी हिमालय में गढ़वाल से हजारा तक एवं चकरौता तथा मसूरी के नीचे विशेष रूप में प्राप्त होते हैं। ये छोटे एवं समूहबद्ध होकर आते हैं। इसके पत्ते-प्रायः पतले तथा लम्बे होते हैं एवं शिराजाल घना नहीं होता। इसके फल विशेष मांसल नहीं होते। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA