भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 363

३१२ भावप्रकाशनिघण्टुः बगलवाली गाँठें अंगुली सदृश मोटी होती हैं तथा उनसे थोड़े से मांसल मूल निकले रहते हैं । जंगली हरदी का अन्दर का भाग गाढ़े नारंगी रंग का; गन्ध हरदी से तेज तथा कर्पूर मिश्रित सोंठ के समान; स्वाद कर्पूर के समान एवं हल्लासकारक होता है । हरदी के स्थान में रंगने के काम में यह आती हैं । त्रावणकोर में इससे तिखुर निकालते हैं। रासायनिक संगठन-हरिद्रा के समान । गुण और प्रयोग-इसके गुण हलदी की ही तरह होते हैं । रक्तविकार एवं चर्मरोगों में अन्य औषधियों के साथ इसका व्यवहार किया जाता है । (१) सर्पविष में जंगली हलदी, कुष्ठ, अजवायन तथा मैनसिल का धूम दिया जाता है । (२) विस्फोटज ज्वरों में दानों को बाहर निकालने के लिये इसे २-४ रत्ती खिलाते हैं तथा इसका बाह्यलेप भी करते हैं । (३) खुजली, चोट, सूजन एवं मोच आदि में इसका लेप अथवा इससे सिद्ध तैल का व्यवहार किया जाता है। (४) शिरःशूल में लोहवान के साथ इसे घिसकर लेप करते हैं । मात्रा-१-२ मा० । नोट-उपर्युक्त हरिद्राओं के अतिरिक्त बंगाल में एक कालीहलदी (नरकचूर, नीलकण्ठ) होती है जिसे कर्च्यूमा केसिआ (Curcuma caesia Roxb.) कहते हैं । इसकी गाँठें काली सी धूसरित वर्ण की एवं चक्राकार कड़ों से युक्त होती हैं । अन्दर का भाग धूसर नील वर्ण का, अत्यन्त कड़ा एवं शृङ्ग के समान होता है । इनका स्वाद एवं गन्ध कर्पूर के समान होता है । गुण और प्रयोग-इसके गुण कचूर की तरह होते हैं । सौन्दर्य प्रसाधनों (Cosmetics-कॉसमेटिक्स) में इसका उपयोग किया जाता है । इसका उबटन पसीना लाने के लिए व्यवहार में लाया जाता है। बंगाल में इसकी ताजी गाँठों का उपयोग हलदी की तरह किया जाता है । अथ दारुहरिद्राया नामानि गुणाँश्चाह दार्वी दारुहरिद्रा च पर्जन्या पर्जनीति च । कटङ्कटेरी पीता च भवेत्सैव पचम्पचा ।। सैव कालीयकः प्रोक्तस्तथा कालेयकोऽपि च ।।२०१।। पीतद्रुश्च हरिद्रुश्चपीतदारु१ च पीतकम् । दार्वी निशागुणा किन्तु नेत्र कर्णास्यरोगनुत् ।।२०२।। दारुहरदी के नाम तथा गुण-दार्वी, दारुहरिद्रा, पर्जन्या, पर्जनी, कटङ्कटेरी, पीता, पचम्पचा, कालीयक, कालेयक, पीतद्रु, हरिद्रु, पीतदारु और पीतक ये सब दारुहलदी के पर्यायवाची शब्द हैं । दारुहलदी-के गुण यद्यपि हलदी के समान ही होते हैं तथापि यह विशेषतः नेत्र, कर्ण तथा मुखसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है । [२०१-२०२] ७०. दारुहलदी हिं०-दारुहलदी, दारुहलदी, दारहलद । बं०-दारुहरिद्रा । म०-दारुहलद, जरकि हलद । गु०-दारुहलदर । मा०-दारुहलदी । क०-दोद्दा मरद रिसिन । ते०-मनिपसुपु । ता०-मर मञ्जिल । कुमा०-चित्रा, कीलमॊरा । पं०- सुमलु । ने०-चित्रा । फा०-दार चोबह, फिलझरह । अ०-दार हलक । अं०-Indian berberry (इण्डियन बरबेरी) । ले०-Berberis species (बर्बेरिस् की विभिन्न जातियाँ) । Fam. Berberidaceae (बर्बेरिडेंसी) । १. 'कपीतकमिति पाठान्तरं चिन्त्यम् ।