भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३११ ६८. आमाहल्दी हिं० - अमिया हलदी, आमाहल (र) द, आमाहलदी। बं० - आम आदा। म० - अम्बे हलद, अम्बा हलद। गु० - आम्बा हलदर। क० - हुली आरसीन। ते० - कारुपुसुपु। ता० - पशु मंजल। मा० - आंबा हलदी। पं० - अंबिया हलदी। फा० - दारचोबबह। अ० - दारहल्द। अं० - Mango ginger (मँगो जिंजर)। ले० - Curcuma amada Roxb. (कर्क्यूमा अमाडा)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेंसी)। आमाहलदी के क्षुप प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाये जाते हैं। बंगाल और कोंकण में इसकी खेती की जाती है। इसका डंठल मोटा होता है। कन्द-हल्दी की गाँठों से बड़े-बड़े, आर्द्रक के समान, हल्के पीले रंग के एवं आम्र की तरह गन्धयुक्त होते हैं। क्षुप-२-३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-१-१॥ फुट लम्बे, ५-६ इञ्च चौड़े, आयताकार दीर्घवृत्ताकार और नुकीले होते हैं। फूल-फीके पीले रंग के आते हैं। गाँठों को छोटे-छोटे टुकड़े कर सुखा लेते हैं। डॉ० देसाई लिखते हैं कि बम्बई में आमाहलदी नाम से जो गाँठें बिकती हैं वे वनहरिद्रा की होती हैं। कुछ विद्वानों ने आमाहलदी का ले० नाम वनहरिद्रा वाला लिखा है। आमाहलदी का बंगाल में अधिक प्रयोग होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल, राल, शर्करा, गोंद, स्टार्च, ॲल्ब्यूमिनॉइड्स, ऑर्गैनिक अम्ल तथा राख आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं। गुण और प्रयोग-यह वातानुलोमक, शीतल, सुगन्धित, दीपन, पाचन एवं ग्राही है। इसके गुण आर्द्रक के समान दीपन एवं वातानुलोमक हैं लेकिन आर्द्रक उष्ण है और यह शीतल है। इसका उपयोग हल्दी के स्थान पर किया जाता है। सुगन्धित होने के कारण इसे चटनी आदि में उपयोग में लाते हैं। मिठाइयों में आम की गन्ध लाने के लिये इसके फांट का व्यवहार करते हैं। चोट एवं खुजली आदि में इसका लेप किया जाता है। लताकरञ्ज के पत्र रस के साथ कृमि रोग में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २-४ माशा। अथ वनहरिद्राया नामगुणानाह अरण्यहलदीकन्दः कुष्ठवातास्रनाशनः ।। २०० ।। वनहरदी के गुण-वनहलदी का कन्द-कुष्ठ तथा वातरक्त का नाशक होता है। [२००] हिं० - बनहरदी, बनहलदी, जंगली हलदी। बं० - बनहलुद, बनहलद। म० - वेडीहलद, रानहलद। क० - काडरसन। ते० - अड़वि पसुपु, कस्तुरि पसुपु। ता० - कस्तुरि मंजल। गु० - बनहलदर, कपूरकाचली। पं०, मा० - जंगली हलदी। मला० - कट्टुमञ्जल। अं० - Wild turmeric (वाइल्ड टर्मेरिक); Yellow zedoary (यलो झिडोरी); Cochin turmeric (कोचीन टर्मेरिक)। ले० - Curcuma aromatica Salisb. (कर्क्यूमा ॲरोमॅटिका)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेंसी)। वनहलदी-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाई जाती है। विशेषकर बंगाल एवं दक्षिण के कोचीन, मैसूर, अल्वारा आदि स्थानों में अधिक देखने में आती है। इसका क्षुप वर्षजीवी होता है। गरमी में इसका क्षुप सूख जाता है किन्तु भूमि के भीतर इसकी गाँठे जीवित रहती हैं और वर्षा ऋतु में वे अंकुरित हो पौधे के रूप में परिणत होती हैं। पत्ते जब कोमल अवस्था के होते हैं तब उनके बीच का भाग जामुनी रंग का होता है। जब यह अंकुरित होता है तभी इसमें फूल आते हैं। जड़ के नीचे काला सा पीले रंग का कन्द होता है। अच्छी खाद आदि होने से ये कन्द काफी बड़े होते हैं। साधारणतः बीच की गाठें अण्डे के समान, २ इञ्च से बड़ी, काली सी चक्राकार कड़ों से युक्त तथा अनेक मोटी उपमूलों से युक्त होती हैं। उपमूलों के अंतिम भाग में बदाम के बराबर नारंगपीत गाँठे होती हैं। बीच की गाँठों के