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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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३१० भावप्रकाशनिघण्टुः (१) प्रतिश्याय, खाँसी, प्रमेह, प्रदर एवं नेत्राभिष्यन्द आदि रोगों में जिनमें श्लेष्मा का अत्यधिक स्राव होता है, इसको दूध में उबालकर गुड़ मिलाकर पिलाते हैं। प्रतिश्याय की प्रारंभिक अवस्था में रात के समय इसके धूएँ को नाक से सुँघाते हैं तथा उसके बाद कुछ देर तक जल नहीं पीने देते। इससे बहुत जल्दी लाभ होता है। खाँसी में इसको भूनकर १-२ माशा मधु अथवा घृत के साथ चटाने से लाभ होता है। (२) आँवले का रस, हल्दी तथा मधु इसके प्रयोग से सभी प्रकार के प्रमेहों में अच्छा लाभ होता है। प्रदर में इसके साथ गुग्गुलु या रसांजन का प्रयोग करते हैं। (३) खुजली, पामा, दाद, शीतपित्त, उदर्द, फोड़े एवं विचर्चिका आदि रक्तविकार एवं चर्म रोगों में यह बहुत लाभदायक है। इसके लिए हल्दी का चूर्ण गोमूत्र के साथ खिलाया जाता है एवं मक्खन के साथ स्थानीय लेप भी करते हैं। इसके विशेष योग हरिद्राखंड का १ तो० की मात्रा में नित्य कुछ समय तक लेने से उपर्युक्त विकारों में पर्याप्त लाभ होता है। (४) चूना या सज्जी खार हल्दी के साथ मिलाकर मोच, ऐंठन, चोट, पिच्चित व्रण एवं पुराने घावों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ हल्दी तथा मिश्री को खिलाते भी हैं। बिच्छू एवं सर्प आदि के काटने पर वेदना शान्ति के लिए इसका धूआँ देते हैं। हल्दी एवं फिटकिरी (१ में २०) के सूक्ष्म चूर्ण का कर्णस्राव में कान में प्रधमन करते हैं। (५) सभी प्रकार के नेत्राभिष्यन्द के लिए यह बहुत लाभदायक है। एक भाग हल्दी २० भाग जल में उबाल कर छानकर उसे आँख में बार-बार डालते हैं जिससे आँख की वेदना कम होती है तथा कीचड़ आना भी कम होता है। इसके क्वाथ से रँगे हुए कपड़े का व्यवहार नेत्राच्छादन के लिए किया जाता है। (६) शलीपद में इसको गुड़ एवं गोमूत्र के साथ प्रयोग कराया जाता है। (७) शिरःशूल एवं जोंक के काटने पर रक्तप्रवाह को रोकने के लिए इसका लेप लाभदायक है। चक्कर आता हो तो ताजी हल्दी का सिरपर लेप करने से लाभ होता है। घृतकुमारी के गूदे में इसको घिसकर शोथयुक्त अर्श पर लगाते हैं। (८) भूतोन्माद एवं योषापस्मार आदि में इसका धूआँ दिया जाता है। (९) हल्दी के ताजे पत्तों का उपयोग मछली भूनने में एवं घृत की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए उपयोग में लाते हैं। ताजी हल्दी का आचार भी बनाया जाता है। मात्रा- चूर्ण २-४ माशा। अथ कर्पूरहरिद्राया नामानि गुणाँश्चाह दार्बीभेदा१ऽऽम्रगन्धा च सुरभीदारुदारु च। कर्पूरा पद्मपत्रा स्यात्सूरीम२त्सुरतारका ।।१९८।। आम्रगन्धिर्हरिद्रा या सा शीता वातला मता। पित्तहृन्मधुरा तिक्ता सर्वकण्डूविनाशिनी ।।१९९।। कर्पूरहल्दी या आमाहरदी के नाम तथा गुण- दार्बीभेदा (यह दारुहल्दी के भेद में है अतः दार्बीभेदा भी नाम है), आम्रगन्धा (आम के फल के समान गन्ध होने से आम्रगन्धा भी कहते है), सुरभीदारु, दारु, कर्पूरा, पद्मपत्रा सूरीमत् और सुरतारका (पाठान्तर में सुरभी और सुरनायिका) ये सब आमाहरदी के पर्यायवाचक शब्द हैं। जो हल्दी आम के फल के समान गन्ध वाली होती है वह शीतल, वातकारक, पित्त को दूर करने वाली, मधुर तथा तिक्त रसयुक्त एवं सब प्रकार की खुजली का नाश करनेवाली होती है। [१९८-१९९] १. 'दार्बीभेदे'ति पाठान्तरमसङ्गतम्। २. 'सुरभी सुरनायिके'ति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA