भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३०९
नाशक, शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली एवम् चर्मदोष, प्रमेह, रक्तविकार, शोथ, पाण्डु तथा व्रण को दूर करने वाली होती है । [१९६-१९७]
६७. हल्दी
हिं० - हल्दी, हरदी, हर्दी, हल्दी । बं० - हलुद । म० - हलद । गु० - हलदर । क० - अरसिन, अरिसिन । ते० - पसुपु । पं० - हल्दी, हलदर, हलज । ता० - मंजल । मला० - मञ्जल । फा० - जर्द चोब । अ० - उरुकुस्सफ । अं० - Turmeric (टर्मेरिक) । ले० - Curcuma longa, Linn. (कर्क्युमा लाँगा, लिन) । Fam. Zingiberaceae (झिंज़िबेरॅसी) । हल्दी-एक बहुत प्रसिद्ध प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली वस्तु प्रायः सब प्रान्तों के खेत में रोपण की जाती है लेकिन बंबई, मद्रास तथा बंगाल में इसकी विशेष रूप से उपज की जाती है । चीन एवं जावा आदि देशों में भी इसकी उपज होती है । इसका क्षुप - २-३ फीट ऊँचा होता है । पत्ते-केले के नवीन पौधे से निकले हुए पत्ते के समान १- १।। फुट लम्बे तथा ६-७ इञ्च चौड़े उतने ही लम्बे पर्णवृन्त से युक्त, आयताकार-भालाकार एवं पर्णतल की तरफ कुछ नुकीले होते हैं । पत्तों में आम के समान गन्ध आती है । फूल-अवृन्त काण्डज क्रम में निकले हुवे, पीतवर्ण के, संख्या में अल्प तथा करीब १ १/२ इञ्च लम्बे; पुष्पकाण्ड-६ इञ्च या अधिक लम्बा तथा पत्रनाल द्वारा आवृत्त; पुष्पकाण्ड की पत्तियाँ हलके हरे रंग की होती हैं । इसी कन्द को हल्दी कहते हैं । ये कन्द विभिन्न आकार के, मूल एवं पर्णवृन्तों के चिन्हों से युक्त होते हैं । अन्दर का भाग पीला या नारंगपीत । भग्न - शृङ्गवत् । गन्ध - मधुर । स्वाद - कड़वा । चूसने पर लालास्राव का वर्ण भी पीत हो जाता है । रँगने के काम में बिना उबाली हल्दी का व्यवहार किया जाता है और खाने के काम में हल्दी को उबाल कर सुखाकर प्रयुक्त करते हैं । उबालने से उष्णवीर्य हल्दी की तीव्रता कम हो जाती है । प्रमेह आदि कफ प्रधान व्यक्तियों में कच्ची हल्दी का रस सहपान या अनुपान के रूप में प्रयुक्त करते हैं । हल्दी को एक विशेष विधि से तैयार कर बाजार में बेची जाती है । पहले कन्दों को अलग करके साफ करते हैं । फिर मुलायम होने तक जल में उबालते हैं । स्थान भेद के अनुसार ३० मिनट से ६ घंटे तक उबाला जाता है । उबालते समय इसी के कुछ पत्तों को भी जल में डालते हैं । थोड़ा गोबर मिलाने से इसका रंग अच्छा हो जाता है । फिर इन्हें खुली हवा में फैलाकर बार-बार पलट कर धीरे-धीरे सुखाते हैं । सूखने पर रगड़कर साफ करके उपयोग में लाते हैं । रासायनिक संगठन-इसमें करक्यूमिन् (Curcumin, C₁₂H₂₀O₆) नामक एक पीला एवं रवेदार रंजक पदार्थ होता है जो मद्यसार में पूर्णतया घुल जाता है जिससे गहरे पीले रंग का घोल बनता है । इस घोल में क्षार मिलाने से घोल रक्ताभ बादामी वर्ण का हो जाता है । इसके अतिरिक्त हल्दी में ५-६% उड़नशील तैल होता है जिसमें कर्पूरवत् गन्ध आती है तथा इस तैल में करक्यूमेन (Curcumen) नामक एक टरपेन (Terpene) होता है जो स्नेहद्रव्य कोलेस्टेरॉल (Cholesterol) को घुलाने के लिए बहुत अच्छा द्रव्य है । हल्दी में उपर्युक्त पदार्थों के अतिरिक्त स्टार्च (Starch) २४% तथा अॅल्ब्युमिनाइड्स (Albuminoids) ३०% होते हैं । गुण और प्रयोग-हल्दी उष्ण, उत्तेजक, सुगन्धित, रक्तशोधक, त्वग्दोषहर, शोथहर, दीपन, ग्राही, कफघ्न, वातहर, विषघ्न एवं व्रण के लिए लाभदायक है । मसाले के रूप में इसका नित्य व्यवहार होते हुए भी यह एक बहुत अच्छी औषध है । इसका उपयोग प्रतिश्याय, कफविकार, चर्मरोग, रक्तविकार, प्रमेह, कामला, यकृत् विकार, पर्यायिक ज्वर, अतिसार, संग्रहणी, व्रण एवं नेत्राभिष्यन्द में किया जाता है ।
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