भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
हरीतक्यादिवर्गः ३०९
नाशक, शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली एवम् चर्मदोष, प्रमेह, रक्तविकार, शोथ, पाण्डु तथा व्रण को दूर करने वाली होती है । [१९६-१९७]
६७. हल्दी
हिं० - हल्दी, हरदी, हर्दी, हल्दी । बं० - हलुद । म० - हलद । गु० - हलदर । क० - अरसिन, अरिसिन । ते० - पसुपु । पं० - हल्दी, हलदर, हलज । ता० - मंजल । मला० - मञ्जल । फा० - जर्द चोब । अ० - उरुकुस्सफ । अं० - Turmeric (टर्मेरिक) । ले० - Curcuma longa, Linn. (कर्क्युमा लाँगा, लिन) । Fam. Zingiberaceae (झिंज़िबेरॅसी) । हल्दी-एक बहुत प्रसिद्ध प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली वस्तु प्रायः सब प्रान्तों के खेत में रोपण की जाती है लेकिन बंबई, मद्रास तथा बंगाल में इसकी विशेष रूप से उपज की जाती है । चीन एवं जावा आदि देशों में भी इसकी उपज होती है । इसका क्षुप - २-३ फीट ऊँचा होता है । पत्ते-केले के नवीन पौधे से निकले हुए पत्ते के समान १- १।। फुट लम्बे तथा ६-७ इञ्च चौड़े उतने ही लम्बे पर्णवृन्त से युक्त, आयताकार-भालाकार एवं पर्णतल की तरफ कुछ नुकीले होते हैं । पत्तों में आम के समान गन्ध आती है । फूल-अवृन्त काण्डज क्रम में निकले हुवे, पीतवर्ण के, संख्या में अल्प तथा करीब १ १/२ इञ्च लम्बे; पुष्पकाण्ड-६ इञ्च या अधिक लम्बा तथा पत्रनाल द्वारा आवृत्त; पुष्पकाण्ड की पत्तियाँ हलके हरे रंग की होती हैं । इसी कन्द को हल्दी कहते हैं । ये कन्द विभिन्न आकार के, मूल एवं पर्णवृन्तों के चिन्हों से युक्त होते हैं । अन्दर का भाग पीला या नारंगपीत । भग्न - शृङ्गवत् । गन्ध - मधुर । स्वाद - कड़वा । चूसने पर लालास्राव का वर्ण भी पीत हो जाता है । रँगने के काम में बिना उबाली हल्दी का व्यवहार किया जाता है और खाने के काम में हल्दी को उबाल कर सुखाकर प्रयुक्त करते हैं । उबालने से उष्णवीर्य हल्दी की तीव्रता कम हो जाती है । प्रमेह आदि कफ प्रधान व्यक्तियों में कच्ची हल्दी का रस सहपान या अनुपान के रूप में प्रयुक्त करते हैं । हल्दी को एक विशेष विधि से तैयार कर बाजार में बेची जाती है । पहले कन्दों को अलग करके साफ करते हैं । फिर मुलायम होने तक जल में उबालते हैं । स्थान भेद के अनुसार ३० मिनट से ६ घंटे तक उबाला जाता है । उबालते समय इसी के कुछ पत्तों को भी जल में डालते हैं । थोड़ा गोबर मिलाने से इसका रंग अच्छा हो जाता है । फिर इन्हें खुली हवा में फैलाकर बार-बार पलट कर धीरे-धीरे सुखाते हैं । सूखने पर रगड़कर साफ करके उपयोग में लाते हैं । रासायनिक संगठन-इसमें करक्यूमिन् (Curcumin, C₁₂H₂₀O₆) नामक एक पीला एवं रवेदार रंजक पदार्थ होता है जो मद्यसार में पूर्णतया घुल जाता है जिससे गहरे पीले रंग का घोल बनता है । इस घोल में क्षार मिलाने से घोल रक्ताभ बादामी वर्ण का हो जाता है । इसके अतिरिक्त हल्दी में ५-६% उड़नशील तैल होता है जिसमें कर्पूरवत् गन्ध आती है तथा इस तैल में करक्यूमेन (Curcumen) नामक एक टरपेन (Terpene) होता है जो स्नेहद्रव्य कोलेस्टेरॉल (Cholesterol) को घुलाने के लिए बहुत अच्छा द्रव्य है । हल्दी में उपर्युक्त पदार्थों के अतिरिक्त स्टार्च (Starch) २४% तथा अॅल्ब्युमिनाइड्स (Albuminoids) ३०% होते हैं । गुण और प्रयोग-हल्दी उष्ण, उत्तेजक, सुगन्धित, रक्तशोधक, त्वग्दोषहर, शोथहर, दीपन, ग्राही, कफघ्न, वातहर, विषघ्न एवं व्रण के लिए लाभदायक है । मसाले के रूप में इसका नित्य व्यवहार होते हुए भी यह एक बहुत अच्छी औषध है । इसका उपयोग प्रतिश्याय, कफविकार, चर्मरोग, रक्तविकार, प्रमेह, कामला, यकृत् विकार, पर्यायिक ज्वर, अतिसार, संग्रहणी, व्रण एवं नेत्राभिष्यन्द में किया जाता है ।
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३१० भावप्रकाशनिघण्टुः (१) प्रतिश्याय, खाँसी, प्रमेह, प्रदर एवं नेत्राभिष्यन्द आदि रोगों में जिनमें श्लेष्मा का अत्यधिक स्राव होता है, इसको दूध में उबालकर गुड़ मिलाकर पिलाते हैं। प्रतिश्याय की प्रारंभिक अवस्था में रात के समय इसके धूएँ को नाक से सुँघाते हैं तथा उसके बाद कुछ देर तक जल नहीं पीने देते। इससे बहुत जल्दी लाभ होता है। खाँसी में इसको भूनकर १-२ माशा मधु अथवा घृत के साथ चटाने से लाभ होता है। (२) आँवले का रस, हल्दी तथा मधु इसके प्रयोग से सभी प्रकार के प्रमेहों में अच्छा लाभ होता है। प्रदर में इसके साथ गुग्गुलु या रसांजन का प्रयोग करते हैं। (३) खुजली, पामा, दाद, शीतपित्त, उदर्द, फोड़े एवं विचर्चिका आदि रक्तविकार एवं चर्म रोगों में यह बहुत लाभदायक है। इसके लिए हल्दी का चूर्ण गोमूत्र के साथ खिलाया जाता है एवं मक्खन के साथ स्थानीय लेप भी करते हैं। इसके विशेष योग हरिद्राखंड का १ तो० की मात्रा में नित्य कुछ समय तक लेने से उपर्युक्त विकारों में पर्याप्त लाभ होता है। (४) चूना या सज्जी खार हल्दी के साथ मिलाकर मोच, ऐंठन, चोट, पिच्चित व्रण एवं पुराने घावों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ हल्दी तथा मिश्री को खिलाते भी हैं। बिच्छू एवं सर्प आदि के काटने पर वेदना शान्ति के लिए इसका धूआँ देते हैं। हल्दी एवं फिटकिरी (१ में २०) के सूक्ष्म चूर्ण का कर्णस्राव में कान में प्रधमन करते हैं। (५) सभी प्रकार के नेत्राभिष्यन्द के लिए यह बहुत लाभदायक है। एक भाग हल्दी २० भाग जल में उबाल कर छानकर उसे आँख में बार-बार डालते हैं जिससे आँख की वेदना कम होती है तथा कीचड़ आना भी कम होता है। इसके क्वाथ से रँगे हुए कपड़े का व्यवहार नेत्राच्छादन के लिए किया जाता है। (६) शलीपद में इसको गुड़ एवं गोमूत्र के साथ प्रयोग कराया जाता है। (७) शिरःशूल एवं जोंक के काटने पर रक्तप्रवाह को रोकने के लिए इसका लेप लाभदायक है। चक्कर आता हो तो ताजी हल्दी का सिरपर लेप करने से लाभ होता है। घृतकुमारी के गूदे में इसको घिसकर शोथयुक्त अर्श पर लगाते हैं। (८) भूतोन्माद एवं योषापस्मार आदि में इसका धूआँ दिया जाता है। (९) हल्दी के ताजे पत्तों का उपयोग मछली भूनने में एवं घृत की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए उपयोग में लाते हैं। ताजी हल्दी का आचार भी बनाया जाता है। मात्रा- चूर्ण २-४ माशा। अथ कर्पूरहरिद्राया नामानि गुणाँश्चाह दार्बीभेदा१ऽऽम्रगन्धा च सुरभीदारुदारु च। कर्पूरा पद्मपत्रा स्यात्सूरीम२त्सुरतारका ।।१९८।। आम्रगन्धिर्हरिद्रा या सा शीता वातला मता। पित्तहृन्मधुरा तिक्ता सर्वकण्डूविनाशिनी ।।१९९।। कर्पूरहल्दी या आमाहरदी के नाम तथा गुण- दार्बीभेदा (यह दारुहल्दी के भेद में है अतः दार्बीभेदा भी नाम है), आम्रगन्धा (आम के फल के समान गन्ध होने से आम्रगन्धा भी कहते है), सुरभीदारु, दारु, कर्पूरा, पद्मपत्रा सूरीमत् और सुरतारका (पाठान्तर में सुरभी और सुरनायिका) ये सब आमाहरदी के पर्यायवाचक शब्द हैं। जो हल्दी आम के फल के समान गन्ध वाली होती है वह शीतल, वातकारक, पित्त को दूर करने वाली, मधुर तथा तिक्त रसयुक्त एवं सब प्रकार की खुजली का नाश करनेवाली होती है। [१९८-१९९] १. 'दार्बीभेदे'ति पाठान्तरमसङ्गतम्। २. 'सुरभी सुरनायिके'ति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३११ ६८. आमाहल्दी हिं० - अमिया हलदी, आमाहल (र) द, आमाहलदी। बं० - आम आदा। म० - अम्बे हलद, अम्बा हलद। गु० - आम्बा हलदर। क० - हुली आरसीन। ते० - कारुपुसुपु। ता० - पशु मंजल। मा० - आंबा हलदी। पं० - अंबिया हलदी। फा० - दारचोबबह। अ० - दारहल्द। अं० - Mango ginger (मँगो जिंजर)। ले० - Curcuma amada Roxb. (कर्क्यूमा अमाडा)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेंसी)। आमाहलदी के क्षुप प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाये जाते हैं। बंगाल और कोंकण में इसकी खेती की जाती है। इसका डंठल मोटा होता है। कन्द-हल्दी की गाँठों से बड़े-बड़े, आर्द्रक के समान, हल्के पीले रंग के एवं आम्र की तरह गन्धयुक्त होते हैं। क्षुप-२-३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-१-१॥ फुट लम्बे, ५-६ इञ्च चौड़े, आयताकार दीर्घवृत्ताकार और नुकीले होते हैं। फूल-फीके पीले रंग के आते हैं। गाँठों को छोटे-छोटे टुकड़े कर सुखा लेते हैं। डॉ० देसाई लिखते हैं कि बम्बई में आमाहलदी नाम से जो गाँठें बिकती हैं वे वनहरिद्रा की होती हैं। कुछ विद्वानों ने आमाहलदी का ले० नाम वनहरिद्रा वाला लिखा है। आमाहलदी का बंगाल में अधिक प्रयोग होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल, राल, शर्करा, गोंद, स्टार्च, ॲल्ब्यूमिनॉइड्स, ऑर्गैनिक अम्ल तथा राख आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं। गुण और प्रयोग-यह वातानुलोमक, शीतल, सुगन्धित, दीपन, पाचन एवं ग्राही है। इसके गुण आर्द्रक के समान दीपन एवं वातानुलोमक हैं लेकिन आर्द्रक उष्ण है और यह शीतल है। इसका उपयोग हल्दी के स्थान पर किया जाता है। सुगन्धित होने के कारण इसे चटनी आदि में उपयोग में लाते हैं। मिठाइयों में आम की गन्ध लाने के लिये इसके फांट का व्यवहार करते हैं। चोट एवं खुजली आदि में इसका लेप किया जाता है। लताकरञ्ज के पत्र रस के साथ कृमि रोग में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २-४ माशा। अथ वनहरिद्राया नामगुणानाह अरण्यहलदीकन्दः कुष्ठवातास्रनाशनः ।। २०० ।। वनहरदी के गुण-वनहलदी का कन्द-कुष्ठ तथा वातरक्त का नाशक होता है। [२००] हिं० - बनहरदी, बनहलदी, जंगली हलदी। बं० - बनहलुद, बनहलद। म० - वेडीहलद, रानहलद। क० - काडरसन। ते० - अड़वि पसुपु, कस्तुरि पसुपु। ता० - कस्तुरि मंजल। गु० - बनहलदर, कपूरकाचली। पं०, मा० - जंगली हलदी। मला० - कट्टुमञ्जल। अं० - Wild turmeric (वाइल्ड टर्मेरिक); Yellow zedoary (यलो झिडोरी); Cochin turmeric (कोचीन टर्मेरिक)। ले० - Curcuma aromatica Salisb. (कर्क्यूमा ॲरोमॅटिका)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेंसी)। वनहलदी-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाई जाती है। विशेषकर बंगाल एवं दक्षिण के कोचीन, मैसूर, अल्वारा आदि स्थानों में अधिक देखने में आती है। इसका क्षुप वर्षजीवी होता है। गरमी में इसका क्षुप सूख जाता है किन्तु भूमि के भीतर इसकी गाँठे जीवित रहती हैं और वर्षा ऋतु में वे अंकुरित हो पौधे के रूप में परिणत होती हैं। पत्ते जब कोमल अवस्था के होते हैं तब उनके बीच का भाग जामुनी रंग का होता है। जब यह अंकुरित होता है तभी इसमें फूल आते हैं। जड़ के नीचे काला सा पीले रंग का कन्द होता है। अच्छी खाद आदि होने से ये कन्द काफी बड़े होते हैं। साधारणतः बीच की गाठें अण्डे के समान, २ इञ्च से बड़ी, काली सी चक्राकार कड़ों से युक्त तथा अनेक मोटी उपमूलों से युक्त होती हैं। उपमूलों के अंतिम भाग में बदाम के बराबर नारंगपीत गाँठे होती हैं। बीच की गाँठों के
३१२ भावप्रकाशनिघण्टुः बगलवाली गाँठें अंगुली सदृश मोटी होती हैं तथा उनसे थोड़े से मांसल मूल निकले रहते हैं । जंगली हरदी का अन्दर का भाग गाढ़े नारंगी रंग का; गन्ध हरदी से तेज तथा कर्पूर मिश्रित सोंठ के समान; स्वाद कर्पूर के समान एवं हल्लासकारक होता है । हरदी के स्थान में रंगने के काम में यह आती हैं । त्रावणकोर में इससे तिखुर निकालते हैं। रासायनिक संगठन-हरिद्रा के समान । गुण और प्रयोग-इसके गुण हलदी की ही तरह होते हैं । रक्तविकार एवं चर्मरोगों में अन्य औषधियों के साथ इसका व्यवहार किया जाता है । (१) सर्पविष में जंगली हलदी, कुष्ठ, अजवायन तथा मैनसिल का धूम दिया जाता है । (२) विस्फोटज ज्वरों में दानों को बाहर निकालने के लिये इसे २-४ रत्ती खिलाते हैं तथा इसका बाह्यलेप भी करते हैं । (३) खुजली, चोट, सूजन एवं मोच आदि में इसका लेप अथवा इससे सिद्ध तैल का व्यवहार किया जाता है। (४) शिरःशूल में लोहवान के साथ इसे घिसकर लेप करते हैं । मात्रा-१-२ मा० । नोट-उपर्युक्त हरिद्राओं के अतिरिक्त बंगाल में एक कालीहलदी (नरकचूर, नीलकण्ठ) होती है जिसे कर्च्यूमा केसिआ (Curcuma caesia Roxb.) कहते हैं । इसकी गाँठें काली सी धूसरित वर्ण की एवं चक्राकार कड़ों से युक्त होती हैं । अन्दर का भाग धूसर नील वर्ण का, अत्यन्त कड़ा एवं शृङ्ग के समान होता है । इनका स्वाद एवं गन्ध कर्पूर के समान होता है । गुण और प्रयोग-इसके गुण कचूर की तरह होते हैं । सौन्दर्य प्रसाधनों (Cosmetics-कॉसमेटिक्स) में इसका उपयोग किया जाता है । इसका उबटन पसीना लाने के लिए व्यवहार में लाया जाता है। बंगाल में इसकी ताजी गाँठों का उपयोग हलदी की तरह किया जाता है । अथ दारुहरिद्राया नामानि गुणाँश्चाह दार्वी दारुहरिद्रा च पर्जन्या पर्जनीति च । कटङ्कटेरी पीता च भवेत्सैव पचम्पचा ।। सैव कालीयकः प्रोक्तस्तथा कालेयकोऽपि च ।।२०१।। पीतद्रुश्च हरिद्रुश्चपीतदारु१ च पीतकम् । दार्वी निशागुणा किन्तु नेत्र कर्णास्यरोगनुत् ।।२०२।। दारुहरदी के नाम तथा गुण-दार्वी, दारुहरिद्रा, पर्जन्या, पर्जनी, कटङ्कटेरी, पीता, पचम्पचा, कालीयक, कालेयक, पीतद्रु, हरिद्रु, पीतदारु और पीतक ये सब दारुहलदी के पर्यायवाची शब्द हैं । दारुहलदी-के गुण यद्यपि हलदी के समान ही होते हैं तथापि यह विशेषतः नेत्र, कर्ण तथा मुखसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है । [२०१-२०२] ७०. दारुहलदी हिं०-दारुहलदी, दारुहलदी, दारहलद । बं०-दारुहरिद्रा । म०-दारुहलद, जरकि हलद । गु०-दारुहलदर । मा०-दारुहलदी । क०-दोद्दा मरद रिसिन । ते०-मनिपसुपु । ता०-मर मञ्जिल । कुमा०-चित्रा, कीलमॊरा । पं०- सुमलु । ने०-चित्रा । फा०-दार चोबह, फिलझरह । अ०-दार हलक । अं०-Indian berberry (इण्डियन बरबेरी) । ले०-Berberis species (बर्बेरिस् की विभिन्न जातियाँ) । Fam. Berberidaceae (बर्बेरिडेंसी) । १. 'कपीतकमिति पाठान्तरं चिन्त्यम् ।
हरीतक्यादिवर्गः ३१३ दारुहलदी की १२-१३ जाति की कंटकित झाड़ियाँ अधिकतर हिमालय के पहाड़ों पर तथा आसाम में पाई जाती हैं। इनमें से चार जातियाँ मध्य तथा दक्षिण भारत (निलगिरी पर्वत) में पाई जाती है। छोटा नागपुर के पारसनाथ की पहाड़ी पर भी एक भेद पाया जाता है। इनमें से विशेष रूप से ब० ॲरिस्टेटा एवं ३, ४ अन्य पौधों का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है जिनका वर्णन आगे दिया जा रहा है। गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने से सभी के गुण और प्रयोग एक साथ दिये गये हैं। गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने से सभी के गुण और प्रयोग एक साथ दिये गये हैं। दारुहलदी के मूल, काष्ठ, कांड, फल (जिसे झरिक्क कहते हैं) एवं सत्व (रसौंत) का व्यवहार किया जाता है। रसौंत का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। झरिक्क—ये कालाई लिये लाल तथा सूखने पर काले अंगूर की तरह दिखलाई देते हैं। ये काले अंगूर से छोटे तथा अधिकांश में बीजहीन होते हैं। इनका स्वाद खट्टा या रुचिकर खटमिठ्ठा होता है। (क) Berberis aristata, DC. (बर्बेरिस् ॲरिस्टॅटा, डीसी०)। जौन०—काशमोई। गढ०—किंगोरा। इसके क्षुप हिमालय पर्वत पर ६००० से १०५०० फीट की ऊँचाई पर एवं निलगिरी के पहाड़ों पर पाये जाते हैं। इसका क्षुप—बड़ा, पतनशील (Deciduous-डेसिड्यूअस्), कँटीला एवं साधारणतः ६ से १२ फीट तक ऊँचा लेकिन कभी-कभी १५ फीट तक ऊँचा एवं ८ इञ्च व्यास के कांड से युक्त होता है। शाखाएँ—श्वेताभ या हलके पीताभ धूसर वर्ण की होती हैं। पत्ते-१.५-४ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च चौड़े, अभिलटवाकार, चर्मवत्, सूक्ष्म शिराओं से युक्त, सरल धार वाले या दूर-दूर पर तीक्ष्ण काँटों से युक्त एवं उनका अधीपृष्ठ हलके हरे रङ्ग का होता है। फूल-स्वर्ण- पीत पुष्प २-३ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल-बीजिमांसल फल (Berry-बेरी), अण्डाकार, नीले बैंगनी रङ्ग के चमकीले एवं रजावृत होते हैं। मूल-पीताभ बादामी, नलिकाकार, कुछ गाँठदार, कड़े, मजबूत लेकिन लचीले, साधारणतः कटे हुवे टुकड़ों के रूप में एवं थोड़े सी शाखाओं से युक्त होते हैं। छाल-अंदर से गहरे बादामी रङ्ग की, मुलायम एवं तोड़ने पर चूर्ण रूप में हो जाती है। काष्ठ-नींबू के समान पीतवर्ण का, स्पष्ट एवं संकरी मज्जक किरणों से युक्त, जिसमें मज्जक प्रायः नहीं होता और यदि हो तो चमकीले पीतवर्ण का होता है। इसके काष्ठ में ताजी अवस्था में हलकी गन्ध एवं इसका स्वाद कड़वा होता है। इसको कितना भी उबालें तो भी यह पीला ही रहता है। (ख) B. asiatica, Roxb. ex DC. (ब० एशियाटिका, राक्सव, एक्स डीसी०)। हिं०-किलमोरा, किंगोरा। ने०-माटे किस्सी, चित्रा। इसके क्षुप प्रायः २-८ हजार फीट के बीच या कभी-कभी नीचे भी हिमालय की घाटियों में भूटान, गढ़वाल, बिहार, पारसनाथ की पहाड़ी तथा अफगानिस्तान आदि स्थानों पर पाये जाते हैं। इसका क्षुप-करीब ८ फीट ऊँचा होता है। शाखाएँ-धूसर वर्ण की होती हैं। इसकी पत्तियां-अण्डाकार या लट्वाकार, आयताकार, १-२ १/२ इञ्च लम्बी एवं चर्मवत् होती हैं। पत्तियों का शिराजाल ऊपरी पृष्ठ पर घना तथा दृढ़ होता है। पुष्प-मञ्जरियों में निकलते हैं। इसके फल-कृष्ण नील होते हैं। (ग) B. lycium, Royle (ब० लाइसियम्, रायलि०)। हि०-चतरोई, काशमल, दारुहरिद्रा। इसके क्षुप ३-७ हजार फीट की ऊँचाई पर पश्चिमी हिमालय में गढ़वाल से हजारा तक एवं चकरौता तथा मसूरी के नीचे विशेष रूप में प्राप्त होते हैं। ये छोटे एवं समूहबद्ध होकर आते हैं। इसके पत्ते-प्रायः पतले तथा लम्बे होते हैं एवं शिराजाल घना नहीं होता। इसके फल विशेष मांसल नहीं होते। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
३१४ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन— बर्बेरिस् की विभिन्न उपजातियों में कम-से-कम आठ प्रकार के विभिन्न क्षाराभ पाये गये हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं— बर्बेरिन् (Berberine), ऑक्सिअँकॅन्याइन् (Cxyacanthine), बबेमाइन् (Berbamine), पार्मेटाइन (Palmatine), जँट्रोहीझाइन् (Jatrorrhizine), कोलंर्बमाइन् (Columbamine), बर्बेरूबाइन् (Berberrubine) एवं हाइड्रैस्टाइन् (Hydrastine)। इनमें से प्रथम तीन विशेष महत्त्व के हैं तथा शेष विभिन्न अन्य वनस्पतियों के विशिष्ट क्षाराभ हैं। बर्बेरिन् (Berberine, C₂₀ H₁₉ NO₅), शीत जल में घुलनशील, मद्यसार में कम घुलनशील, पीतवर्ण का एवं सूइयों के आकार का क्षाराभ है। यह काष्ठ एवं छाल की अपेक्षा मूल में अधिक होता है। यह क्षाराभ और भी कई वनस्पतियों में पाया जाता है। इसके लवण भी बनाये गये हैं। इसके अतिरिक्त इसमें कषाय द्रव्य, गोंद, स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। इसके फल में मॅलिक् (Malic), टार्ट्रिक् (Tartric) एवं साइट्रिक् (Citric) अम्ल पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— दारुहलदी के मूल एवं काष्ठ बल्य, तिक्त पौष्टिक, दीपन, पाचन, ग्राही, पित्तविरेचक, ज्वरहर, पर्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, श्लेष्मघ्न, रसायन एवं त्वक् दोष-हर हैं। इसका उपयोग मलेरिया आदि विषम ज्वर, कुपचन, फिरङ्ग, गण्डमाला, अपची, त्वकदोष, भगंदर, प्रदर, अत्यार्तव, व्रण, गर्भिणीवमन, यकृत्प्लीहावृद्धि, कामला एवं सर्पदंश आदि में किया जाता है। (१) मलेरिया तथा अन्य विषमज्वरों में इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। ज्वर के साथ हल्लास, वमन, विरेचन, शिरःशूल एवं थकावट अधिक होती है तब इसके क्वाथ का उपयोग, रसौत की अपेक्षा अच्छा होता है। ज्वर में इसके पूर्व विरेचन देना चाहिये। इससे पसीना होकर ज्वर उतर जाता है। क्विनीन की तरह हृदयावसाद एवं बाधिर्य आदि इससे नहीं होते तथा प्लीहा की वृद्धि कम हो जाती है। ज्वर अच्छा होने के पश्चात् इसके उपयोग से भूख आदि बढ़ती हैं। यद्यपि उपर्युक्त गुणों के लिये इसका उपयोग किया जाता रहा लेकिन नवीन प्रयोगों से देखा गया कि इसके क्षाराभ बर्बेरिन् सल्फेट् (Berberine Sulphate) को १ १/२-२ १/२ की मात्रा में दिन में ३ बार ३ दिन तक देने पर भी किसी प्रकार का लाभ नहीं हुआ। मलेरिया में इससे एक लाभ अवश्य होता है कि इसके देने से प्लीहा आदि धातुओं में छिपे हुवे मलेरिया के कीटाणु रक्त में आ जाते हैं जिससे रक्त परीक्षा में दिखलाई देने से निदान में आसानी होती है। क्विनीन के साथ ज्वर की चिकित्सा में इसका उपयोग लाभदायक है। (२) बर्बेरिन् (Berberine)—यह क्षाराभ अत्यंत विषैला नहीं है लेकिन अधिक मात्रा में देने से अवश्य विषैला है एवं मृत्यु भी हो सकती है। इसका प्रचूषण आन्त्र एवं सूचिकाभरण द्वारा हो सकता है। बिल्ली एवं कुत्तों को उनके वजन के प्रति किलोग्राम के लिये २ मिलीग्राम की मात्रा में देने से हृदय पर अवसादक प्रभाव पड़ता है तथा रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है। यह क्रिया उन्हीं अंगों के ऊपर प्रत्यक्ष प्रभाव से एवं प्राणदा (Vagus = व्हागस्) नाड़ी की उत्तेजना से होती है। प्राणियों में मृत्युत्तर परीक्षण द्वारा देखा गया कि इससे फुफ्फुसों में अत्यन्त रक्ताधिक्य एवं हृदय के अलिन्दों (Auricle = ऑरिकल) का विस्फार होकर मृत्यु होती है। इससे वृक्कों में शोथ एवं रक्तस्राव होता है तथा इससे केन्द्रीय वातनाडीसंस्थान के कन्दों की कोशाओं को नुकसान पहुँचता है। यह श्वसन के लिये भी अवसादक है लेकिन १-१० मिलीग्राम की मात्रा में यह आन्त्र, गर्भाशय एवं श्वसनिका की अनैच्छिक मांसपेशियों को उत्तेजित करता है जिससे श्वसनका में संकोच उत्पन्न होता है। साधारण मात्रा में हृदय पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है जिससे हृदय की पोषक रक्तवाहिनियों में रक्तप्रवाह की वृद्धि होती है लेकिन अधिक मात्रा में देने पर यह अवसादक है। इससे श्वेतकणों की वृद्धि होती है। मलेरिया में निदान की दृष्टि से प्रदीपक रूप में (Provocative dose-प्रोव्होकेटिव्ह डोस) इसका उपयोग लाभदायक है जिससे छिपे हुये कीटाणु रक्त में आ जाते हैं तथा रक्तपरीक्षण में दिखलाई देने लगते हैं। यह चर्म के नीचे की धातुओं एवं
श्लैष्मिक कला के लिये स्थानिक रूप से सौम्य स्वापजनक होने के कारण वेदनास्थापन के लिए प्रयुक्त होता है । क्विनीन जो कि कोशाओं के जीवरस (प्रोटोप्लाजम्-Protoplasm) के लिये विषैला होता है उसकी अपेक्षा ८० गुना कम शक्ति का इसका घोल (८०,००० में १) लोशर्मेनिया ट्रॉपिका (Leishmania tropica) नामक प्राच्यव्रण उत्पन्न करने वाले कीटाणु के संबर्ध की वृद्धि रोकने में समर्थ होता है। यह प्राच्यव्रण (Oriental sore-ओरियण्टल् सोर) की चिकित्सा के लिये सफल औषधि है । बर्बेरिन् ॲसिड सल्फेट .५-१% घोल की १-२ सी० सी० मात्रा व्रण के किनारों पर अत्यन्त महीन सूचिका द्वारा, ४, ५ जगह दी जाती है। सूचिकाभरण हफ्ते में एक बार किया जाता है साधारणत ३ हफ्तों में व्रण अच्छा हो जाता है लेकिन द्वितीयक उपसर्ग की तीव्रता के अनुसार २-१२ हफ्ते भी अच्छा होने में लग सकते हैं । यदि एक से अधिक व्रण हों तो एक दिन में २ व्रणों से अधिक एवं हफ्ते में ४ व्रणों से अधिक (विशेष कर जब व्रण बड़े हों) में सूचिकाभरण नहीं करना चाहिये । चिकित्साकाल में व्रण का बन्धन उचित रूप में करना चाहिये । इस औषधि का तयार घोल ओरिसॉल (Orisol) नाम से बिकता है । (३) दारुहलदी पित्त एवं मूत्रमार्ग की विकृति में लाभदायक है। पित्त एवं मूत्राश्मरी, तृष्णा, दाह एवं हलास आदि के लिये इसका उपयोग किया जाता है । बस्तिशोथ एवं प्रमेह आदि में आँवले के रस एवं मधु के साथ इसको देते हैं । गर्भाशय शैथिल्य के कारण उत्पन्न रक्तप्रदर में तथा श्वेतप्रदर में मधु के साथ इसके क्वाथ का सेवन करने से लाभ होता है । कामला में मधु के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। मूलत्वक् का क्वाथ तृणाणुनाशक (Bactericidal- बॅक्टेरिसाइड्ल्) है तथा जीर्ण व्रणों में व्रण प्रक्षालन के लिये लाभदायक है । (४) दारुहलदी के फल सौम्य विरेचक, शीतल एवं रोचक होते हैं । प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण-उत्तर भारत में इसमें विशेष मिलावट नहीं होती लेकिन बंबई की तरफ इसमें कई प्रकार की वनस्पतियों के काष्ठ को हल्दी में उबालकर बेचते हैं। झाडकी हल्दी (Coscinium fenestratum Gaertn.) Colebr. (कॉसिनिअम् फेनेस्ट्रेट्म्) के कांड को भी इसके स्थान पर देते हैं। मात्रा-चूर्ण २-३ माशा, टिंक्चर १/२-२ ड्रा०, बर्बेरिन के लवण १-५ ग्रेन । अथ दार्वीक्वाथजातं रसाञ्जनम् । तस्य निर्माणविधि नामानि गुणांश्चाह दार्वीक्वाथसमं क्षीरं पादं पाक्त्वा यदा घनम् । तदा रसाञ्जनाख्यं तन्नेत्रयोः परमं हितम् ।।२०३।। रसाञ्जनं तार्क्ष्यशैलं रसगर्भञ्च तार्क्ष्यजम् । रसाञ्जनं कटु श्लेष्मविषनेत्रविकारनुत् ।।२०४।। उष्णं रसायनं तिक्तं छेदनं व्रणदोषहृत् ।।२०५।। दारुहलदी के क्वाथ से तैयार होने वाले रसोत के बनाने की विधि, नाम तथा गुण-दारुहलदी का काढ़ा बनाकर उसी के बराबर उसमें दूध डालकर औटावें । बाद को जब चौथाई भाग शेष रह जाय तब उतार लें और उसमें से जो गाढ़ा भाग हो उसे अलग कर लें। उसी को रसोत कहते हैं। वह नेत्रों के लिये परम हितकर होता है । रसाञ्जन, तार्क्ष्यशैल, रसगर्भ और तार्क्ष्यज ये रसोत के नाम हैं। रसोत-कटु तथा तिक्त रस युक्त, कफ, विष तथा नेत्र सम्बन्धी विकारों को दूर करने वाला, उष्ण वीर्य, रसायन, छेदक (पिण्डी भाव को प्राप्त हुये कफादिकों को काट-काट कर अलग करने वाला), एवम् व्रणसम्बन्धी दोषों को नष्ट करने वाला होता है । [२०३-२०५] ७१. रसौत हिं०-रसोत, रसौत, रसवत्त । बं०-रसांजन । म०-रसवत, रसांजन । गु०-रसवंती । क०-रसांजन । ते०- रसांजनमु । मा०-रसोत । पं०-रसौत । फा०-फिलजहरः । अ०-हुलुजेंहिंदी । अं०-Extract of Indian Berberis (एक्स्ट्रॅक्ट ऑफ इण्डियन् बर्बेरिस्) । ले०-Extractum Berberis (एक्स्ट्रॅक्टम् बर्बेरिस्) ।
३१६ भावप्रकाशनिघण्टुः रसोत—कालापन लिये भूरे रङ्ग की, गोंद के समान मुलायम तथा पानी और मदिरा में घुलने वाली दारुहलदी के क्वाथ और बकरी के दूध से बनी हुई औषधि है। इसका स्वाद कड़वा तथा कसैला होता है। इसको बनाने के लिये वर्षा के आखिर में इसके क्षुप को काट कर उसके पंचांग का क्वाथ बनाकर बाद में उसे गाढ़ा बनाते हैं। कुछ लोग क्वाथ में बराबर मात्रा में बकरी का दूध मिलाकर फिर गाढ़ा करते हैं। इस बात में मतभेद है कि रसौत केवल ब० लाइसियम् के मूल एवं काष्ठ से बनता है या ब० एशियाटिका से या दोनों से। बाजार में बिकने वाला रसौत प्रायः दोनों के मिश्रण से बनाया जाता है। इसमें लकड़ी, मिट्टी आदि पदार्थ मिले रहते हैं। इसलिये इसे १० गुने गरम जल में मिलाकर छान कर सुखाते हैं एवं बचे हुये भाग में मद्यसार मिलाकर छानकर उस मद्यसार को ऊर्ध्वपातन यन्त्र द्वारा अलग कर गाढ़े भाग को उपर्युक्त जल से सुखाये गाढ़े भाग में मिलाकर बन्द शीशी में रखकर काम में लाते हैं। गुण और प्रयोग—यह कड़वा पौष्टिक, ज्वरहर, पार्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, अर्शोघ्न, शोथघ्न, रक्तशोधक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक एवं नेत्रविकारहर है। इसका आन्तरिक उपयोग ज्वर, यकृत् प्लीहा वृद्धि, कामला, अर्श एवं आमाशय तथा पक्वाशय के व्रण (Gastric & duodenal ulcer-गैस्ट्रिक, अँड ड्युओडेनल अल्सर) में लाभदायक है। इसका बाह्य प्रयोग अर्श, प्राच्यव्रण, कटे हुये भाग, फोड़े फुन्सियाँ एवं पुराने व्रण आदि में किया जाता है। (१) विषमज्वर के सभी प्रकारों में इसको १५ रत्ती दिन में ३ बार जल के साथ देते हैं। क्वाथ की अपेक्षा यह ज्यादा अच्छा होता है। इससे ज्वर का शमन होकर प्लीहा वृद्धि भी कम होती है। इसके प्रयोग में पहले विरेचन देना चाहिये तथा इसकी पूर्ण मात्रा खाली पेट पर देनी चाहिये। औषधि लेने के पश्चात् रोगी को कपड़ा ओढ़ा कर सुलाना चाहिये। थोड़ी देर में रोगी को प्यास मालूम पड़ती है तथा जी घबड़ाने लगता है लेकिन उसको जल पीने न दें। एक घण्टे में पसीना निकलने लगता है तथा कमजोरी मालूम होती है। उसके बाद शरीर पोंछ कर लाजमण्ड या चावल का मांड और दूध पीने को दें। इसके बाद रोगी प्रायः सो जाता है तथा उस दिन ज्वर की पारी नहीं आती। इस प्रयोग में एक दोष यह है कि रोगी को कभी पहले रक्तातिसार हुआ हो तो वह फिर उभड़ जाता है। (२) नये एवं पुराने नेत्राभिष्यन्द में इसको पलकों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ इसमें अफीम, सैन्धव एवं फिटकिरी मिलाई जा सकती है। (३) रक्तार्श में इसको २ से ८ रत्ती मक्खन के साथ खिलाया जाता है एवं इसके घोल (३२ से १) से अर्श को धोते हैं। (४) कपूर एवं मक्खन के साथ बना इसका मलहम फोड़े, फुन्सियाँ, कटे हुये भाग एवं पुराने घावों पर लाभदायक है। मधु के साथ मिलाकर मुख के अन्दर के व्रणों पर एवं अन्य व्रणों पर लगाते हैं। शोथ पर इसके लेप से लाभ होता है। मुखरोग में इसके घोल से गण्डूष कराते हैं। प्राच्यव्रण के लिये भी यह लाभदायक है क्योंकि इसमें क्षाराम की पर्याप्त मात्रा रहती है। मात्रा—१/२-२ माशा। अथ बाकुची। तस्या नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह अवल्गुजो बाकुची स्यात्सोमराजी सुपर्णिका। शशिलेखा कृष्णफला सोमा पूतिफलीति च ॥२०६॥ सोमवल्ली कालमेषी कुष्ठघ्नी च प्रकीर्त्तिता। बाकुची मधुरा तिक्ता कटुपाका रसायनी ॥२०७॥ विष्टम्भहृद्धिमा रुच्या सरा श्लेष्मास्रपित्तनुत्। रूक्षा हृद्या श्वासकुष्ठमेहज्वरकृमिप्रणुत् ॥२०८॥ तत्फलं पित्तलं कुष्ठकफानिलहरं कटु। केश्यं त्वच्यकृ¹मिश्र्वासकासशोथामपाण्डुनुत् ॥२०९॥ १. पाठा० वमिश्र्वास। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३१७ बाकुची के नाम और उसके फल के गुण-अवल्गुज, बाकुची, सोमराजी, सुपर्णिका, शशिलेखा, कृष्णफला, सोमा, पूतिफली, सोमवल्ली, कालमेशी और कुष्ठघ्नी ये सब बाकुची के नामान्तर हैं। बाकुची-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, रसायन, विष्टम्भ को दूर करने वाली, शीतवीर्य, रुचिजनक, सारक (दस्तावर), कफ तथा रक्तपित्त को दूर करने वाली होती है तथा यह रूक्ष, हृदय के लिए हितकर तथा श्वास, कुष्ठ, प्रमेह, ज्वर और कृमि को नष्ट करने वाली होती है। इसका फल-पित्तकारक, कुष्ठ, कफ और वात को दूर करने वाला, कटु रस युक्त, केश तथा त्वचा के लिए हितकारी होता है तथा कृमि, श्वास, कास, शोथ आम और पाण्डु इन सब रोगों को नष्ट करने वाला होता है। [२०६-२०९] ७२. बाकुची हिं०-बाकुची, बकुची, बाबची, बावची, सोमराजी। बं०-लताकस्तूरी, हाकुच। म०-बावची। गु०-बाबची, बावची। क०-बाउचिगे। ते०-भवचि, कालाजिउजा। ता०-कर्पोंकरशि। फा०-बावकुचि अं०-Psoralea seed (सोरॅलिया सीड); Malaya tea (मलाया टी)। ले०-Psoralea corylifolia, Linn. (सोरॅलिया कोरिली- फोलिया, लिन.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। बाकुची-प्रायः सब प्रान्तों के जंगली झाड़ियों में तथा खादर अथवा कंकरीली भूमि में उत्पन्न होती है एवं सिलोन में भी प्राप्त होती है। अमेरिका में भी इसकी कई उपजातियाँ होती हैं जिनके गुण भी इसी के समान हैं। इसका क्षुप-१-४ फीट तक ऊँचा, वर्षायु एवं स्वावलम्बी होता है। पत्ते-१-३ इञ्च के घेरे में छोटी अरणी के पत्तों के समान गोलाकार होते हैं। ये नालयुक्त, कड़े, चिकने, लहरदार दन्तुर एवं इनके दोनों पृष्ठों पर काले लम्बे होते हैं। इन ग्रन्थियों के चिह्न शाखाओं पर भी होते हैं। १०-३० छोटे, नीले बैंगनी रंग के पुष्प-१ से २ इञ्च लम्बे पुष्पदण्ड पर आते हैं। फली-छोटी, गोल, काली, चिकनी, एक बीज युक्त, अस्फोटी एवं फलभित्ति बीज से चिपकी होती है। बीज-बाकुची वास्तव में फल ही है जिसकी फलभित्ति बीजावरण से चिपकी रहती है। यह अण्डाकार, आयताकार, कुछ चिपटे, चिकने, अग्र की तरफ नुकीले, काले रंग के एवं महीन गढ्ढों से युक्त होते हैं तथा ताल द्वारा बड़ा करके देखने पर नहाने के स्पञ्ज की तरह दिखलाई देते हैं। इसको चबाने पर एक तीव्र गन्ध आती है तथा इनका स्वाद कड़वा, तीता एवं दाहजनक होता है। औषधि कार्य में इनका तथा इनसे निकले तैल का व्यवहार किया जाता है। नोट-कुछ विद्वानों ने सोमराजी नाम से ले० व्हर्नोनिया अॅन्थेल्मिंटिका (Vernonia anthelmintica Willd.) का ग्रहण किया है लेकिन वह नाम तो अरण्यजीरक का है जिसका वर्णन परिशिष्ट में किया गया है। रासायनिक संगठन-बाकुची के फलों में राल, उड़नशील तैल, तारपीन की तरह तैल, स्थिर तैल एवं सोरॅलेन् (Psoralen) तथा आइसो-सोरॅलेन् (Iso-psoralen) नामक दो रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं। बाकुची के कृमिघ्न तथा त्वच्य गुण इन्हीं रवेदार पदार्थों के मिश्रण से हैं। यह तैल में घुलने वाले (फ्युरोकाउमरिन्स-Furocoumarins) हैं। प्रथम सोरॅलेन अंजीर से प्राप्त होने वाले फिक्युसिन् (Ficusin) के समान होता है। प्रथम फलभित्ति (Pericarp पेरीकार्प) से सोरॅलिडिन् (Psoralidin) नामक एक अन्य रवेदार पदार्थ भी प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग-यह सौम्य उत्तेजक, वातनाड़ियों के लिए बल्य, कृमिघ्न, त्वक् दोषहर, व्रण शोधक, व्रणरोपक, मृदुविरेचक, मूत्रक, स्वेदल एवं वृष्य है। इसका अन्तः बाह्य प्रयोग श्वित्र, कुष्ठ, पामा, कण्डू, गजचर्म (सोरियासिस्-Psoriasis) एवं चर्म के अन्य शोथयुक्त विकारों में किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
३१८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) श्वित्र में चौथाई भाग हरताल के साथ गोमूत्र में पीस कर इसका लेप लाभदायक होता है। खैर एवं आँवले के क्वाथ के साथ इसके चूर्ण का सेवन भी लाभदायक है। सालभर तक यदि बाकुची एवं काले तिल का सेवन करें तो सभी प्रकार के कुष्ठ अच्छे होकर शरीर की कान्ति बढ़ती है। इसको जल के साथ पीस कर भी लेप किया जा सकता है। नवीन तथा युवावस्था के श्वेत कुष्ठ रोग में शीघ्र लाभ होता है किन्तु अधिक दिन तक लगाना पड़ता है। इससे दाग लाल हो जाते हैं। (२) बाकुची में रहने वाला तैल ही प्रधान कार्यकारी भाग है। यह तैल चर्म के ऊपर रहने वाले मालागोलाणुओं (Streptococi) के लिये घातक है। अंतस्त्वचीय धमनिकाओं के ऊपर इसका निश्चित प्रभाव पड़ता है जिससे इनका विस्फार होकर वहाँ रक्तरस (Plasma-प्लाज्मा) का प्रवाह बढ़ जाता है। इससे चर्म लाल हो जाता है तथा रञ्जक कोषों (मेलॅनोब्लास्ट्स्-Melanoblasts) को उत्तेजना मिलकर रञ्जक का निर्माण होता है। यह रञ्जक, सफेद दागों में फैलकर उसका वर्ण परिवर्तन कर देता है। अधिकांश लोगों में इससे सफेद दाग लाल हो जाते हैं लेकिन कुछ (५%) लोगों में इससे छाले पड़ जाते हैं इसलिए इसको अन्य चीजों के साथ आवश्यक प्रमाण में मिश्रण कर लेना चाहिये जिससे दागों में केवल लाली आ जाय। श्वित्र के साथ-साथ यदि अन्य आंत्रिक विकार जैसे आमातिसार आदि हों तो उनकी भी चिकित्सा साथ-साथ करनी चाहिये। (३) फिरंगोत्तर श्वित्र में बाकुची के तैलीय राल सदृश सत्व (Oleo-resinous extract) का लेप लाभदायक होता है। इस सत्व में सोरॅलेन् तथा आइसो-सोरॅलेन् दोनों ही रहते हैं। इसको चॉलमोगरा के तेल के साथ मिलाकर लगाया जाता है तथा आन्तरिक प्रयोग भी करते हैं जिससे श्वित्र, सिध्म तथा सोरियासिस् में लाभ होता है। लगाने के लिये इसके साथ-साथ भाग चॉलमोगरा का तेल तथा २ भाग लॅनोलिन् मिलाकर मलहम बनाकर दिन में एक, दो बार दागों पर मलना चाहिये। करीब ३ महीने में लाभ होता है। मात्रा-बीज चूर्ण १-३ माशां। अथ चक्रमर्दः (चकवड़)। तस्य नामानि तत्फलस्य च गुणांश्चाह चक्रमर्दः प्रपुन्नाटो दद्रुघ्नो मेषलोचनः। पद्माटः स्यादेड जश्चक्री पुन्नाट इत्यपि ।। २१० ।। चक्रमर्दो लघुः स्वादू रूक्षः पित्तानिलापहः। हृद्यो हिमः कफश्वासकुष्ठदद्रुकृमीन्हरेत् ।। २११ ।। हन्त्युष्णं तत्फलं कुष्ठकण्डूदद्रुविषानिलान्। गुल्मकासकृमिश्वासनाशनं कटुकं स्मृतम् ।। २१२ ।। चकवड़ के नाम और उसके फल के गुण-चक्रमर्द, प्रपुन्नाट, दद्रुघ्न, मेषलोचन, पद्माट, एडगज, चक्री और पुन्नाट ये सब चकवड़ के नामान्तर हैं। चकवड़-लघु, स्वादिष्ट, रूक्ष, पित्तवात (वातपित्त) नाशक, हृदय के लिए हितकर, शीतवीर्य, कफ, श्वास, कुष्ठ, दद्रु (दाद) और कृमि को नष्ट करने वाला होता है। चकवड़ का फल- उष्णवीर्य और कटु रस युक्त होता है एवम् कुष्ठ, खुजली, दाद, विष, वायु, गुल्म, कास, कृमि और श्वास इन सब रोगों को दूर करने वाला होता है। [२१०-२१२] ७३. चकवड़ हिं०-चकवड़, पवाँड, पवाँर। बं०-चकुन्दा, पनेवार। म०-तरोटा, टाकली। गु०-कुँवाडीयो। क०- तगचे। ते०-तगरिस। ता०-उशिट्टुगरै। पं०-पँवार, चकुन्दा। फा०-संगेसतूया। अ०-कुल्ब। अं०-Fetid cassia (फीटिड कॅशिया)। ले०-Cassia tora Linn. (कॅशिया टोरा, लिन.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३१९ यह प्रायः सब प्रान्तों के जङ्गल, झाड़ी, खेत, मैदान, कूड़ा करकट, सड़क के किनारे एवं गन्दे स्थानों में आप ही आप उत्पन्न होता है । इसका २-५ फीट तक ऊँचा एकवर्षायु क्षुप वर्षा ऋतु में बहुतायत से उत्पन्न होता है। पत्र-संयुक्त पक्षकार और पत्रक-तीन जोड़े, अभिलट्वाकार, १-२ इञ्च लम्बे, चिकने, चमकीले, दुर्गन्धयुक्त एवं स्पष्ट शिराजाल से युक्त होते हैं। इसके निचले पत्रकों के बीच में एक ग्रन्थि होती है। पुष्प-छोटे पीले रंग के अक्षकोणीय एवं दो-दो के जोड़े में आते हैं। फलियाँ-४-८ इञ्च लम्बी, पतली, चौकोनी, कुछ मुड़ी हुई तथा इनका अग्र नुकीला होता है। बीज-बहुत, कड़े एवं मेथी के समान होते हैं। इसके कोमल पत्तों का साग बनाया जाता है तथा औषधि में पञ्चाङ्ग का व्यवहार किया जाता है। इसी का एक दूसरा भेद है जिसे कॅशिया ऑव्ट्यूसिफोलिया (Cassia obtusifolia) कहते हैं। इसका क्षुप भी ऊपर के क्षुप के समान ही होता हैं लेकिन इसमें दुर्गन्ध नहीं होती तथा इसके आधारीय पत्रकाद्वय के बीच में एक ग्रन्थि होती है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में एमोडिन (Emodin) नामक एक ग्लूकोसाइड पाया जाता है जो क्राइसोफेनिक् एसिड (Chrysophanic acid) की तरह होता है। इसके पत्तों में कॅथार्टिन (Cathartin) नामक एक विरेचक द्रव्य तथा लाल रंग होता है। गुण और प्रयोग-इसके बीज बल्य, दीपन, पाचन एवं त्वक् दोषहर होते हैं तथा पत्र विरेचक, कृमिघ्न एवं पार्यायिक ज्वरहर होते हैं। (१) इसके बीज की क्रिया त्वचा पर होती है। दाद, खुजली, कुष्ठ, सिध्म, पामा एवं छाजन (एक्झिमा) आदि में यह बहुत लाभदायक है। जिन रोगों में त्वचा मोटी हो जाती है उनमें इससे विशेष लाभ होता है। दाद में मूली के पत्ते के साथ या नींबू के रस के साथ या करञ्ज के तेल के साथ पीस कर इसे लगाया जाता है। छाजन में मट्ठे के साथ पीस कर लगाते हैं। सिध्म के लिये कांजी में पीसकर लगाना चाहिये। व्रणवस्तु के स्थान पर उत्पन्न होनेवाली तन्तु युक्त गाँठों (कीलॉइड-Cheloid) के लिये इसके बीजों को सेहुँड के दूध में भिगोकर फिर गोमूत्र में पीस कर लेप करने से लाभ होता है। अर्धविभेदक आदि शिरोरोग में कांजी के साथ इसका लेप उपयोगी है। इसका सेवन कॉफी के रूप में भी किया जाता है। (२) इसके पत्तों का क्वाथ बच्चों के विकारों में विशेषकर दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर मृदु विरेचक के रूप में दिया जाता है। इसका रस भिलावे से उत्पन्न दाह पर लगाया जाता है। इसका पोल्टिस बनाकर फोड़ों पर बाँधने से फोड़े जल्दी पक जाते हैं एवं वातरक्त, गृध्रसी तथा संधिवात में भी इनके बाँधने से वेदना कम होती है। इसके पत्तों को एरण्ड तैल में भूनकर दुर्गंध युक्त व्रणों में पुल्टिस के रूप में प्रयोग से लाभ होता है। मात्रा-बीज चूर्ण १-२ माशा। अथातिविषा (अतीस) । तस्या नामगुणानाह- विषा त्वतिविषा विश्वा शृङ्गी प्रतिविषाऽरुणा। शुक्लकन्दा चोपविषा भङ्गुरा घुणवल्लभा ।।२१३।। विषा सोष्णा कटुस्तिक्ता पाचनी दीपनी हरेत्। कफपित्तातिसारामविषकासवमिकृमीन् ।।२१४।। अतीस के नाम तथा गुण-विषा, अतिविषा, विश्वा, शृङ्गी, प्रतिविषा, अरुणा, शुक्लकन्दा, उपविषा, भङ्गुरा और घुणबल्लभा ये सब अतीस के नाम हैं। अतीस-उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्तरस युक्त, पाचक तथा अग्निदीपक होती है एवम् कफ, पित्त, अतिसार, आम, विष, कास, वमन और कृमि इन सब रोगों को दूर करनेवाली होती है। [२१३-२१४]
३२० भावप्रकाशनिघण्टुः ७४. अतीस हिं०-अतीस । बं०-आतइच । म०-अतिविष । पं०-अतीस । ते०-अतिवव । क०-अतिविषा । गु०- अतिवखनी कली । ता०-अतिवदयम । भोटि०-अइस । अं०-Indian Atees (इण्डियन् अतीस) । ले०- Aconitum heterophyllum, Wall. (एकोनाइटम् हेटरोफाइलम्, वाल.); Fam. Ranunculaceae (रॅनन्क्युलेंसी) । यह हिमालय पहाड़ में कुमाऊँ से हसोरा तक शिमला और इसके आस-पास में तथा चम्बा प्रान्त में ६ से १५ हजार फुट ऊँची चोटियों पर पाया जाता है । इसका क्षुप-२ से ४ फीट ऊँचा होता है । काण्ड-गोल, सीधा तथा विभिन्न आकार वाली पत्तियों से घिरा होता है । पत्र-नीचे के पत्तों के फलक प्रायः पाँच विच्छेदों से युक्त एवं गोलाई लिये हुये ताम्बूलाकार या लट्त्वाकार- ताम्बूलाकार होते हैं । ऊपर के पत्ते छोटे तथा धार पर दन्तुर होते हैं । पुष्प-नील अथवा हरितनील, १ से १।। इञ्च लम्बे एवं चमकीले होते हैं । आभ्यंतर पुट का एक दल सबसे बड़ा और फणाकार होता है । मूल-मूल में दो कन्द होते हैं जिनमें एक पिछले वर्ष का और दूसरा नये वर्ष का होता है । नवीन कन्द लम्बगोल या शंक्वाकार, हाथी की सूँड़ की तरह, १ इञ्च लम्बा तथा १/४ से १/२ इञ्च मोटा होता है । कन्दत्वक्-पतली तथा श्वेताभ, फीके राख के रङ्ग की तरह होती है । कन्द-स्वाद में अत्यन्त कडुवा, आसानी से टूट जाने वाला और भीतर से श्वेत तथा पिष्टमय पदार्थ से युक्त रहता है । इसे तोड़ने पर श्वेत मध्य भाग के चारों तरफ ४ काले धब्बे दिखलाई देते हैं । इनमें गन्ध नहीं रहती । इसमें कीड़े बहुत जल्दी लग जाते हैं तथा कीड़े लगने पर यह निःसत्व हो जाता है इसलिये औषधि में बिना कीड़े लगे हुवे अच्छे मूलकन्द का ही व्यवहार करना चाहिये । अन्य निघण्टुकारों ने वर्ण भेद से इसके ३, ४ भेद लिखे हैं लेकिन आजकल केवल एक ही भेद और मिलता है । जिसका वर्णन नीचे दिया गया है । (क) Aconitum palmatum D. Don (एकोनाइटम् पार्मेटम्) हिं०-बखमा । सं०-प्रतिविषा । इसके क्षुप पूर्वी हिमालय में सिकिम, गुर्बाल तथा मिश्री पर्वतों में पाये जाते हैं । इसके मूल अतीस की अपेक्षा अधिक लम्बे, कम मोटे, तोड़ने में सख्त, अधिक काले रङ्ग के तथा वजन में बहुत भारी होते हैं । इन पर गाँठें होती हैं । गुण आदि में यह अतीस के समान ही है । रासायनिक संगठन-वत्सनाभ वर्ग की औषधि होने पर भी यह विषैली नहीं है । इसमें एक अत्यन्त कड़वा बिना रवेदार क्षाराभ अतीसिन (Atisine) होता है जो विषैला नहीं है । इसके अतिरिक्त इसमें एकोनाइटिक् एसिड (Aconitic acid), टैनिक एसिड, अधिक मात्रा में पिष्टमय पदार्थ, वसा तथा ओलिइक्, पामिटिक् एवं स्टियरिक ग्लिसराइड्स (Oleic, Palmitic and Stearic Glycerides) के मिश्रण तथा गोंद, इक्षु शर्करा एवं राख २% आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-अतीस दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ग्राही, वृष्य, बल्य एवं विषमज्वरहर है । इसके सेवन से शरीर की विनिमय क्रिया सुधरती है । इसको ४-८ माशा देने पर भी विषैला परिणाम नहीं होता । इसका प्रयोग आमातिसार, विषमज्वर, कास, वमन, कुपचन, शूल, नवीन शोथयुक्त विकार एवं बालरोगों में किया जाता है । (१) तिक्तपौष्टिक तथा ग्राही होने के कारण अतिसार एवं संग्रहणी में इससे अच्छा लाभ होता है । बच्चों के वमन, अतिसार, ज्वर एवं खांसी में इससे बहुत लाभ होता है । इससे पाखाना पीला होकर मात्रा कम होती है । बच्चों तथा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३२१ प्रसूता में यदि अतिसार हो तो इसके साथ शृङ्ग भस्म देना चाहिये। अतीस के साथ भांग एवं घोड़वच मिलाकर अतिसार में दिया जाता है। इसके साथ सुगन्धित, कडुवी पौष्टिक तथा ग्राही अन्य औषधियाँ मिलाने से ज्यादा लाभ होता है। (२) इसको अधिक मात्रा में देने पर ही इसका ज्वरघ्न गुण स्पष्ट होता है लेकिन उस मात्रा में ज्वर कम होने के साथ-साथ विबन्ध भी हो जाता है जो विषमज्वर के लिये अहितकारक है। इसलिये विषमज्वर में इसकी अपेक्षा कुटकी ज्यादा लाभदायक होती है। ज्वर पश्चात् दौर्बल्य दूर करने के लिये दीपनीय एवं तिक्त पौष्टिक के रूप में इसका उपयोग अधिक अच्छा है। ज्वरातिसार के लिये यह अत्युत्तम औषधि है। इसमें १५ रत्ती अतीस तथा १५ रत्ती रसाञ्जन जल के साथ देते हैं। इसके साथ सुगन्धित पदार्थ मिलाने से ज्यादा लाभ होता है। बड़ों की अपेक्षा बच्चों के ज्वरातिसार में यह ज्यादा उपयोगी है। (३) मूषिक विष में इसको मधु के साथ सुबह चटाया जाता है। (४) कृमियों को निकालने के लिये इसके साथ विडंग का प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण १/२-२ माशा ज्वरातिसार, अतिसार में। चूर्ण २-४ रत्ती बल्य, तिक्तपौष्टिक । अथ लोध्रः 'शावरलोध्र-पटियालोध' इति लोके प्रसिद्धयोर्नामगुणानाह लोध्रस्तिल्वस्तिरीटश्च शावरो गालवस्तथा । द्वितीयः पट्टिकालोध्रः क्रमुकः स्थूलवल्कलः । जीर्णपत्रो बृहत्पत्रः पट्टी लाक्षाप्रसादनः ।। २१५ ।। लोध्रो ग्राही लघुः शीतश्चक्षुष्यः कफपित्तनुत् । कषायो रक्तपित्तासृग्ज्वरातीसारशोथहृत् ।। २१६ ।। शावरलोध्र और पटियालोध के नाम तथा गुण-लोध्र, तिल्व, तिरीट, शावर, गालव ये नाम लोध्र अर्थात् सावरलोध के हैं और दूसरा जो पटिआलोध (पटानी लोध) है उसके पट्टिकालोध्र, क्रमुक, स्थूलवल्कल, जीर्णपत्र, बृहत्पत्र, पट्टी और लाक्षा प्रसादन ये सब नाम हैं। दोनों प्रकार के लोध्र-ग्राही, लघु, शीतवीर्य, नेत्रों के लिए हितकर, कफपित्तनाशक, कषायरस युक्त, रक्तपित्त, रक्तविकार, ज्वर, अतिसार और शोथनाशक होते हैं। [२१५-२१६] ७५. लोध हिं०-लोध। बं०-म०-क०-लोध, लोध्र। गु०-लोधर। ते०-लोधुगचेट्टु। अ०-मुगाम। अं०- Lodh (लोध); Symplocos Bark (सिम्प्लोकोस् वार्क)। ले०-Symplocos racemosa, Roxb. (सिम्प्लोकॉस् रेसिमोसा, राक्सब) । Fam. Symplo-caceae (सिम्प्लोकेसी)। यह भारत के पूर्वोत्तर प्रान्त नेपाल, कुमाऊँ से आसाम, बंगाल, छोटा नागपुर, वर्मा आदि प्रदेशों के जङ्गल और छोटे पहाड़ों में पाया जाता है। इसका छोटा वृक्ष-२० फुट तक ऊँचा होता है। छाल-खुरदरी और गहरी धूसर (Grey) वर्ण की होती है। काट-(Blaze-ब्लेझ) आधा इञ्च तक मोटा, रेशेदार, हल्का पीला परन्तु हलके नारंगी भूरे रंग की रेखाओं से युक्त होता है। पत्ते-३।। से ७ इञ्च लम्बे, अण्डाकार-आयताकार या अण्डाकार-भालाकार; पत्राग्र-तीक्ष्ण, कुण्ठितलम्ब या कुंठित; पत्र तट-आरावत, अस्पष्ट गोलदन्तुर या क्वचित अखण्ड; पत्र पृष्ठ-कोमल पत्तों का ऊपर का पृष्ठ चिक्कण तथा अधोपृष्ठ मृदु रोमश, तथा अन्य पत्रों के पृष्ठ चिक्कण या मध्यशिरा पर कुछ रोमों से युक्त, चमकीले तथा ऊपर का पृष्ठ गहरे हरे रङ्ग का; शिराएँ-बगल की शिराएँ सूखे हुवे पत्तों में स्पष्ट, ५-९ जोड़ी एवं पत्रवृन्त १/४ से १/२ इञ्च लम्बा होता है। आश्विन से अगहन तक फूल फल आते हैं। फूल-गुच्छों में, पीले और सुगन्धित होते हैं। फल- अष्ठिल, प्रायः आध इञ्च लम्बे, आयताकार, चिक्कण, बैंगनी काले रङ्ग के एवं उनका बाह्यकोष चिपका रहता है। इसकी २४ भाव.I
३२२ भावप्रकाशनिघण्टुः छाल का व्यवहार किया जाता है। इसका बाह्यपृष्ठ चिकना धूसरित हरा (यदि कार्क (Cork) के साथ हो तो) तथा आड़ी धारियों से युक्त, अंदर का पृष्ठ हलका पीला लेकिन रक्ताभ बादामी दिखलाई देता है तथा इसमें लम्बाई में गढ़ेदार धारियाँ होती हैं। भग्न-छोटा, बाह्य भाग में दानेदार लेकिन अन्दर का कुछ तन्तु युक्त। बाह्य भाग (Cortical) रक्ताभ बादामी रङ्ग का। गन्ध-हलकी मधुर लेकिन बन्द डिब्बों में रखने पर तेज हो जाती हैं। स्वाद-मधुर, सुगन्धि तथा कुछ दाहजनक। नोट-एक अन्य प्रकार के पठानी लोध्र का वर्णन आगे किया गया है। लोध्र तथा पठानीलोध्र दोनों ही के गुण करीब-करीब समान ही हैं तथा दोनों ग्राही एवं अतिसारादि में लाभदायक होते हैं। लोध्र का एक पर्याय तिल्वक आया है। चरक के कल्पस्थान में तिल्वक् के मूल की (अन्दर की त्वचा रहित) बाह्य त्वचा का उपयोग विरेचन कराने के लिये किया गया है। इससे भ्रम होता है कि एक ही वस्तु विरेचक तथा ग्राही कैसे हो सकती है। व्यवहार में भी लोध्र की छाल विरेचक नहीं होती। शांवर या पठानी लोध दोनों की मूल त्वक् का प्रयोग किया गया किन्तु उससे विरेचन नहीं हुआ। इसके संबन्ध में एक श्लोक मिलता है। तिल्वकोऽपि तदाकारो बृहत्पत्रो विशेषतः। रक्तत्वचो विरेकी च बृहल्लोध्रेति कथ्यते ।। डल्हण तिल्वक् के सम्बन्ध में लिखते हैं—तिल्वकः रोध्रः, अन्ये तु रोध्राकारो रक्तत्वक्को बृहत्पत्रो वैरेचनिकः। इससे मालूम होता है कि लाल छाल वाला, दीर्घ पत्र वाला एवं विरेचक गुणवाला कोई लोध्र के समान वृक्ष होता है जो तिल्वक है। अभी इसका निर्णय नहीं हो पाया है। कुछ विद्वानों ने तिल्वक् के स्थान पर रेवाचीनी की छाल का उपयोग विरेचन के लिये करने को कहा है। रासायनिक संगठन-लोध की छाल में सम्पूर्ण क्षाराभ की मात्रा करीब ०.३२% होती है जिसमें से एक रवेदार क्षाराभ लोट्युराइन ०.२४%, अन्य चूर्णरूप में क्षाराभ लोट्युरिडाइन ०.०६% एवं एक और रवेदार क्षाराभ कोल्लोट्युराइन ०.०२% होते हैं। इसकी राख में सोडियम् कार्बोनेट रहता है तथा छाल में लाल रंजक पदार्थ बहुत अधि मात्रा में होते हैं। इसमें टैनिन द्रव्य नहीं होते। इसमें का लोट्युराइन क्षाराभ ॲब्राइन एवं हार्मैन के सदृश होता है। इसके सभी क्षाराभ विरल अम्ल घोल में अत्यन्त तेज नील-नीललोहितातीत चमक उत्पन्न करते हैं। गुण और प्रयोग-लोध की छाल ग्राही, शीतल, रक्तस्तंभक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक, शोथघ्न, बल्य एवं चक्षुष्य है। इससे छोटी रक्तवाहिनियों का संकोच होकर रक्तस्राव बन्द होता है। इससे श्लेष्मल त्वचा को शक्ति प्राप्त होकर एवं उसका संकोच होकर श्लेष्मा की उत्पत्ति कम होती है। इसका उपयोग अतिसार, प्रवाहिका, रक्तातिसार, रक्तप्रदर, अत्यार्तव, श्वेतप्रदर, सर्वाङ्गशोथ, यकृद्विकार, ज्वर एवं नेत्ररोगों में किया जाता है। (१) लोध्र अतिसार एवं प्रवाहिका के लिये बहुत अच्छी औषधि है। इसमें इसके प्रवाही सत्त्व को १/२ ड्रा० की मात्रा में देने से इपीकाक से जिनको लाभ नहीं हुआ था उन्हें भी लाभ हुआ। इसमें बेल की गुद्दी, कुचला एवं कुरैया की छाल के साथ इसका प्रयोग करते हैं या इसके साथ मुलेठी, अनार का छिलका एवं कायफल का प्रयोग किया जाता है। (२) रक्तप्रदर में इसके चूर्ण को १० रत्ती की मात्रा में दिन में ३, ४ बार मिश्री के साथ ३, ४ दिन तक देने से बहुत लाभ होता है। इससे गर्भाशय का संकोच होकर उसकी शिथिलता दूर होती है जिससे रक्तप्रदर एवं श्वेतप्रदर आदि में यह उपयोगी है। गर्भिणी में ७वें या ८वें महीने में यदि गर्भ में अधिक चलन हो तो इसे छोटी पीपल एवं मधु के साथ चटाने से गर्भाशय संकोच होकर चलन कम हो जाता है। (३) आँखों में लाली तथा सूजन होने पर इसको पलकों के चारों तरफ लगाते हैं। इसके साथ मुलेठी, रसौंत एवं भुनी फिटकिरी का उपयोग लेप में किया जाता है।
हरीतक्यादिवर्गः ३२३ (४) श्लीपद (Filaria = फाइलेरिया) के कारण उत्पन्न पायसमेह (Chyluria = काइलूरिया) तथा फीलपांव (Elephantiasis = एलिर्फेन्टियासिस) में यह लाभदायक सिद्ध हुआ है। (५) कुष्ठ एवं व्रण आदि में इसका अंतः बाह्य प्रयोग किया जाता है। प्रसूता में योनिक्षत के लिये इसका लेप उपयोगी है। गलशूण्डिका एवं लोध्र का मधु के साथ मसूढ़ों पर लेप करते हैं। सूजन पर लोध्र के लेप से सूजन कम हो जाती है। मात्रा-चूर्ण ५-१० रत्ती। ७६. पठानी लोध हिं०-पठानी लोध। बं०-पटिया लोध। गु०-पठाणी लोधर। पं०-पठानी लोद, लान्दर, लोज, लोश। म०-पट्टी लोध्र। ते०-तेल्ल लुट्टुगु। क०-बिली लोध्र। सिन्ध०-लोदर, पठानी लोध। ले०-Symplocos crataegoides Buch. Ham. (सिम्प्लोकॉस् क्रेटेगॉइडिस्)। Fam. Symplocaceae (सिम्प्लोकेसी)। इसके वृक्ष हिमालय में सिन्ध नदी से आसाम तक, खासिया पहाड़ और मरतवान के पहाड़ों में ३-९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं। यह वृक्ष-३० फुट तक ऊँचा होता है। छाल-हलके सफेद रंग की और कार्क युक्त होती है तथा उस पर खड़ी नालियाँ रहती हैं। काट-आधा इञ्च मोटा, हलका पीला व रेशेदार होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, १-१॥ इञ्च चौड़े, पतले, अण्डाकार या लट्वाकार, लंबाग्र और अग्र की ओर तीक्ष्ण दन्तुर होते हैं तथा सूखने पर पीले रङ्ग के हो जाते हैं। फूल-सफेद, समशिखाकार गुच्छों में तथा सुगन्धित होते हैं। इसके फूलों की सुगन्धि दूर तक जान पड़ती है। फल-चौथाई इञ्च से तिहाई इञ्च तक लम्बे तथा गोल होते हैं। उनसे मुड़ा हुआ गोल बीज निकलता है। इसके गुण और प्रयोग आदि सब उपर्युक्त लोध्र के समान ही है। अथ लशुना, तस्य नामान्याह लशुनस्तु रसोनः स्यादुग्रगन्धो महौषधम्। अरिष्टो म्लेच्छकन्दश्च यवनेष्टो रसोनकः ।।२१७।। अथ लशुनोत्पत्तिमाह यदाऽमृतं वैनतेयो जहार सुरसत्तमात्। तदा ततोऽपतद् बिन्दुः स रसोनोऽभवद् भुवि ।।२१८।। लहसुन की उत्पत्ति-जिस समय गरुड़ने इन्द्र के पास से अमृत हरण किया था उस समय उस अमृत) से जो बिन्दु (अमृत-बिन्दु) पृथ्वी पर गिरा उसी से लहसुन की उत्पत्ति हुई। [२१७-२१८] अथ रसोनशब्दस्य निरुक्तिमाह पञ्चभिश्च रसैर्युक्तो रसेनाम्लेन वर्जितः। तस्माद्रसोन इत्युक्तो द्रव्याणां गुणवेदिभिः ।।२१९।। लहसुन के 'रसोन' नाम की व्युत्पत्ति-लहसुन में ६ प्रकार के रसों में से ५ प्रकार के रस रहते हैं किन्तु केवल एक अम्ल रस नहीं रहता है, अतएव रस अर्थात् केवल अम्ल रस से ऊन अर्थात् शून्य रहने से द्रव्यों के गुणादि जानने वाले विद्वानों ने इसका 'रसोन' नाम रक्खा है। [२१९] अथ लशुने रसस्थानान्याह कटुकश्चापि मूलेषु तिक्तः पत्रेषु संस्थितः। नाले कषाय उद्दिष्टो नालाग्रे लवणः स्मृतः।। बीजे तु मधुरः प्रोक्तो रसस्तद्गुणवेदिभिः ।।२२०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
३२४ भावप्रकाशनिघण्टुः लहसुन में कटु आदि पाँचों रसों के रहने के स्थान—इसके मूलभाग में कटु रस रहता है । पत्तों में तिक्त रस, नाल में कषाय रस, नाल के अग्रभाग में लवण रस तथा बीज में मधुर रस रहता है, ऐसा लहसुन के गुणों के जानने वाले विद्वानों ने कहा है । [२२०] अथ लशुनगुणानाह रसोनों बृंहणो वृष्यः स्निग्धोष्णः पाचनः सरः । रसे पाके च कटुकस्तीक्ष्णो मधुरको मतः ।। २२१ ।। भग्नसन्धानकृत्कण्ठ्यो गुरुः पित्तास्रवृद्धिदः । बलवर्णकरो मेधाहितो नेत्र्यो रसायनः ।। २२२ ।। हृद्रोगजीर्णज्वरकुक्षिशूल-विबन्धगुल्मारुचिकासशोफान् । दुर्नमिकुष्ठानलसादजन्तुसमीरणाश्वासकफांश्च हन्ति ।। २२३ ।। लहसुन के गुण-लहसुन बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, उष्णवीर्य, पाचक तथा सारक होता है । और वह रस तथा पाक में कटु तथा मधुर रस युक्त, तीक्ष्ण, भग्न-सन्धानकारक (टूटी हड्डियों को जोड़ने वाला), कण्ठ को हितकारी, गुरु, पित्त एवं रक्तवर्धक, शरीर में बल तथा वर्ण को उत्पन्न करने वाला, मेधाशक्ति तथा नेत्रों के लिये हितकर और रसायन होता है । एवं हृद्रोग, जीर्णज्वर, कुक्षिशूल, मल तथा वातादिक की विबन्धता, गुल्म, अरुचि, कास, शोथ, बवासीर, कुष्ठ, अग्निमान्द्य, कृमि, वायु, श्वास और कफ को नष्ट करता है । [२२१-२२३] अथ लशुनसेविनां हिताहितपदार्थानाह मद्यं मांसं तथाऽम्लञ्च .हितं लशुनसेविनाम् । व्यायाममातपं रोषमतिनीरं पयो गुडम् ।। २२४ ।। रसोनमश्नन् पुरुषस्त्यजेदेतान् निरन्तरम् ।। २२५ ।। लहसुन सेवन करनेवालों के लिये हितकर तथा अहितकर पदार्थ-मद्य, मांस तथा अम्लरसयुक्त भक्ष्य पदार्थ ये सब लहसुन खाने वालों के लिये हितकर हैं । और व्यायाम, आतप (धूप में फिरना), क्रोध करना, अत्यन्त जल पीना, दूध और गुड़ इन सबों को लहसुन खाने वाले पुरुष सदा छोड़ दें, क्योंकि ये सब अहितकर हैं । [२२४-२२५] ७७. लहसुन हिं०-लहसुन, लशुन । बं०-रसुन । म०-लसून । क०-बेल्लुल्लिल । ते०-वेल्लुल्लिल, तेल्ललिगड्डा । ता०- वल्लपुंडु । गु०-लसण । सिंधी-पोम । आसा०-नहरु । भोटि०-गोक्पस । फा०-सीर । अ०-सूम, फूम । यू०-स्कर्दून् । अ०-Garlic (गार्लिक) । ले०-Allium sativum, Linn. (एलियम् सटाइवम्, लिन०) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में बोया जाता है । विशेषकर पश्चिमोत्तर प्रदेश, गढ़वाल, कुमाऊँ, पंजाब एवं काश्मीर आदि में अधिक उत्पन्न होता है । इसका बहुवर्षायु क्षुप-करीब १ फुट तक ऊँचा होता है । पत्र-चिपटे, लम्बे, १ इञ्च से कम चौड़े एवं इनका अग्र लम्बा होता है । पत्रकोश-३-४ इञ्च लम्बा होता है तथा पुष्प व्यूह को घेरे रहता है । पुष्पव्यूह-सवृन्त मूर्धज, छोटे, घने एवं पतले, शुष्क कोणपुष्पकों से युक्त होते हैं । इसके कन्द को लहसुन कहा जाता है जिसके अन्दर ८- २० जावा होते हैं । इसमें एक विशिष्ट प्रकार की तीव्र गन्ध तथा इसका स्वाद विशिष्ट प्रकार का कटु होता है । रासायनिक संगठन-इसमें एक बादामी पीले रंग का उड़नशील तैल ०.१-०.३% पाया जाता है जिसका वि० गु० १.०४६-१.०५७ होता है । इस तैल में प्रधान रूप से ॲलिल् डाइसल्फाइड् (Allyl disulphide, C₆ H₁₀ S₂) तथा ॲलिल्-प्रॉपिल् डाइसल्फाइड् (Allyl-propyl disulphide) एवं अल्प मात्रा में उच्च श्रेणी के पॉलीसलफाइड्स (Polysulphides) पाये जाते हैं । इसके अतिरिक्त लहसुन के मद्यसारिय सत्त्व से एक ॲल्लीसिन् (Allicin, C₆ H₁₀ S₂ O) नामक प्रतितृणाण्वीय (Antibacterial) तरल द्रव्य प्राप्त किया गया है । इसके साथ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
ही-साथ ॲल्लीसेशन् I तथा ॲल्लीसेशन् II (Allicetion I and Allicetion II) नामक दो अत्यन्त तीव्र प्रतिजैविक ((Antibiotics) पदार्थ भी पाये गये हैं जो ईथर (Ether) में घुलनशील लेकिन जल में न घुलने वाले होते हैं। **गुण और प्रयोग-**लहसुन एक बहुत ही उपयोगी औषधि है। प्राचीन काल से इसका प्रयोग किया जाता रहा है और आधुनिक विद्वानों ने भी इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। राजयक्ष्मा (Tuberculosis) एवं अन्य फुफ्फुसविकार, वातविकार, शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dyspepsia) एवं व्रण आदि के लिये यह बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुआ है। काश्यपसंहिता में लशुनकल्प नामक एक स्वतन्त्र अध्याय में इसका वर्णन किया गया है। धार्मिक ग्रन्थों में इसका सेवन निषिद्ध माना है। लहसुन उष्ण, दीपन, पाचन, वातहर, स्वेदजनन, मूत्रल, उत्तेजक, कफनिःसारक, बल्य, वृष्य, रसायन, दुर्गन्धहर एवं उत्तम प्रतिदूषक (Antiseptic) है। इसमें जो उड़नशील तैल होता है उसका उत्सर्ग, त्वचा, फुफ्फुस एवं वृक्क द्वारा होता है। फुफ्फुस से उत्सर्ग के समय इससे कफ ढीला हो जाता है तथा उसमें के जीवाणुओं का नाश होकर कफ की दुर्गन्ध दूर होती है। वात नाड़ी संस्थान पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से वमन, विरेचन एवं शिरःशूल आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। बच्चों में इसका सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये। अधिक मात्रा में सेवन करने पर कभी-कभी मृत्यु भी हो सकती है। इसका बाह्य प्रयोग त्वग्रागकारक (Rubefacient) एवं प्रतिदूषक औषधि के रूप में किया जाता है। अधिक समय. तक त्वचा के साथ सम्पर्क होने से स्फोट उत्पन्न होते हैं। (१) यक्ष्मा दण्डाणु से उत्पन्न सभी विकृतियों जैसे फुफ्फुसविकार, स्वरयन्त्रशोथ, चर्मविकार, अस्थिव्रण एवं नाड़ीव्रण आदि में यह निश्चित लाभदायक सिद्ध हुआ है। लहसुन के रस को इनमें पिलाया जाता है तथा इसका स्थानिक उपयोग भी किया जाता है। स्वरयंत्र शोथ में इसका टिंक्चर १/२-१ ड्रा० दिन में २, ३ बार देते हैं। पुराने कफविकार जैसे कास, श्वास, स्वरभङ्ग, श्वसनिका शोथ, श्वसनिकाभिस्तीर्णता (Bronchiectasis) एवं श्वासकृच्छ्र आदि में इसका अवलेह बनाकर उपयोग किया जाता है। लहसुन एवं वायविडङ्ग का सेवन भी लाभदायक है। बच्चों के कुकास में इसको ३, ४ घण्टे पर सुँघाया जाता है तथा इसके रस को पिलात भी हैं जिससे कष्ट कम हो जाता है। फुफ्फुसकोथ (Gangrene of lungs) में इसके टिंक्चर (५ में १) का उपयोग बहुत सफल रहा है। प्रारम्भ में इसको कम मात्रा में देना चाहिये तथा बाद में २० बूँद तक दिन में ३ बार देना चाहिये। थोड़े ही समय में ज्वर, कफ की दुर्गन्ध, स्वेदाधिक्य एवं अग्निमांद्य आदि दूर होकर लाभ होता है। इसी प्रकार खण्डीय फुफ्फुसपाक (Lobar pneumonia) में भी इसके टिंक्चर को ३० बूँद हर चार घण्टे पर जल के साथ देने से ४८ घण्टे के अन्दर ही लाभ मालूम होने लगता है तथा ५, ६ दिन में ज्वर कम हो जाता है। इन सभी विकारों में आन्तरिक प्रयोग के साथ-साथ इसको छाती पर लगाते भी हैं। (२) वायविडङ्ग के साथ इसका क्षीरपाक सभी वातविकार में जैसे गृध्रसी, कटिग्रह, अर्दित, पक्षाघात, एकाङ्गघात, उरुस्तम्भ, अपतन्त्रक एवं अपस्मार आदि में लाभदायक है। आन्तरिक प्रयोग के साथ इसंसे सिद्ध तैल की मालिश भी की जाती है। अपस्मार में इसका फांट भोजन के पूर्व एवं पश्चात् देने का विधान है। अपतन्त्रक में इसको सुँघाया जाता है। इसी प्रकार ठण्डक लगने से उत्पन्न पीड़ा, जीर्ण आमवात एवं संधिशोथ तथा शिरःशूल आदि में इसको खिलाया जाता है तथा बाह्य लेप भी किया जाता है। बच्चों के वात विकारों में इसकी मालिश विशेष लाभदायक है। (३) शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dyspepsia), आध्मान उदरशूल, विसूचिका, वमन, गुल्म, उदावर्त, आँव एवं केंचुवों की बीमारी में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। केंचुआ (Round worms) में १०-३० बूँद रस
३२६ भावप्रकाशनिघण्टुः दूध में मिलाकर पिलाते हैं। वातगुल्म में इसको पीस कर घृत के साथ खिलाने से लाभ होता है। ग्रहणीव्रण (Duodenal ulcer) में भी इसको लाभदायक माना गया है। (४) विषमज्वर में इसको तैल या घृत के साथ सुबह खिलाने से लाभ होता है। आन्त्रिक एवं तन्द्राभ ज्वर (Typhoid and Typhus) के प्रतिबन्धन के लिये इसका टिंक्चर को १ ड्रा० हर ४ या ६ घण्टे पर शरबत के साथ देते हैं। यदि रोग के प्रारम्भ में ही इसका प्रयोग किया जावेगा तो ज्वर बढ़ने नहीं पावेगा। इसका उपयोग आन्त्रिक प्रतिदूषक (Intestinal antiseptic) औषधि के रूप में किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। बच्चों को ½ ड्रा० की मात्रा में शरबत के साथ पर्याप्त है। (५) हृद्रोग में इसके प्रयोग से आध्मान कम हो कर हृदय के ऊपर का दबाव दूर होता है जिससे हृदय को बल प्राप्त होकर मूत्र अधिक होने लगता है तथा सर्वाङ्गशोथ एवं जलोदर में लाभ होता है। (६) इसके स्वरस को ३, ४ भाग जल में मिला कर क्षत तथा दुर्गन्धित व्रण प्रक्षालन के काम में लाया जाता है जिससे वेदना कम होकर व्रण जल्दी ठीक होता है। कार्बोलिक एसिड (Carbolic acid) की अपेक्षा इससे धातुओं को कम नुकसान होता है। इसी प्रकार शोथ, विद्रधि, बालतोड़ एवं दाद आदि पर इसका लेप लाभदायक है। इससे सिद्ध सर्षप तैल का उपयोग खुजली (पामा) में किया जाता है। रोहिणी (Diphtheria) नामक अत्यन्त उग्र गले के विकार में इसकी एक, एक कली चूसने को दी जाती है। ३, ४ घण्टे में १ छटांक तक लहसुन दिया जाता है। विकृत कला (Membrane) के दूर होने पर दिन भर में १ छटांक तक लहसुन देना चाहिये। शिशुओं के लिये इसके रस को २०-३० बूँद हर चार घण्टे पर शरबत के साथ देना चाहिये। एक रोगी में नाड़ीव्रण (Sinus) के लिये इसके ताजे स्वरस को २ बूँद को मात्रा में हर छठें दिन स्थानिक सूचिकाभरण किया गया जिससे ४ इञ्च गहरा नाड़ीव्रण २ महीने के अन्दर ठीक हो गया। उपजिह्वा शोथ में इसका स्थानिक प्रयोग सिल्वर नाइट्रेट् (Silver nitrate) की अपेक्षा अच्छा होता है। (७) कर्णशूल में इसके गुनगुने रस का या इससे सिद्ध तैल का उपयोग लाभदायक है। इससे वाधिर्य में भी लाभ होता है। (८) आर्तवप्रवर्तक होने के कारण इसका उपयोग अनार्तव एवं कष्टार्तव आदि में किया जाता है। गर्भिणी में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। (९) मवेशियों में अँन्थ्राक्स (Anthrax) नामक रोग के प्रतिबन्धन के लिये एवं सर्पविषादि में बाह्याभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है। हानिनिवारक-कतीरा, धनियाँ एवं बादाम का तेल। मात्रा-स्वरस १०-३० बूँद; कल्क २-३ माशा। ७८. एकपुतिया लहसुन हिं०-लहसुन, एककांदा लहसुन, एककली लहसुन, एकपुती लहसुन, एकपुतिया लाहुसन। बं०-गंधुन। अं०-Shallot (शॅल्लोट), One Clove Garlic (वन क्लोव गार्लिक)। ले०-Allium ascalonicum Linn. (एलियम् ॲस्कॅलोनिकम् लिन) Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। यह अनेक प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसकी जड़ दो वर्ष या इससे कुछ अधिक ही जीवित रह सकती है। इसके साथ कई एक अण्डाकार लम्बे जावे रहते हैं। यह १-१॥ इञ्च तक लम्बा और मध्यमा अङ्गुली के समान मोटा होता CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
हरीतक्यादिवर्गः ३२७ है। पत्ते-उक्त लहसुन के समान लम्बे, पतले, चिकने और पोले से होते हैं। जड़ से ही अनेक पत्ते निकलते हैं और पत्तों के बीच से दण्ड निकलता है जो एक दो फुट लम्बा, नीचे फूला हुआ किन्तु क्रमशः ऊपर संकुचित और गोल होता है। इसके अन्त में लट्टू के समान फूलों का गुच्छा लगता है। प्रत्येक गुच्छे में लगभग २०० तक नन्हें श्वेत वर्ण के फूल रहते हैं। वे प्याज के फूलों के समान दिखाई पड़ते हैं। इसके कन्द में एक ही जावा रहती है तथा यह कोमल प्याज की तरह दिखलाई देता है। गुण और प्रयोग-इसके गुण लहसुन की तरह ही होते हैं लेकिन विशेष कर यह वृष्य है। वाजीकरण के लिये इसको घी में भून कर मधु के साथ सेवन कराया जाता है। कर्णशूल में इसका टुकड़ा कान के अन्दर रखते हैं। इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। नोट-प्याज की तरह लाल रंग का एक और जंगली लहसुन होता है जो ईरान में अधिक होता है। उसे ले० में-एलियम् लेप्टोफाइलम्, वॉल (Allium leptophyllum, Wall.), ईरान में-सीर-इ-पिआझक् एवं अरब में-थूम-एल-बरी कहा जाता है। गुण और प्रयोग-यह स्वेदल होता है। इसका अचार कुपचन में व्यवहार में लाया जाता है। अथ पालाण्डुः (पियाज), तस्य नामगुणानाह पलाण्डुर्यवनेष्टश्च दुर्गन्धो मुखदूषकः। पलाण्डुस्तु बुधैर्ज्ञेयो रसोनेसदृशो गुणैः ।।२२६।। स्वादुः पाके रसेऽनुष्णः कफकृन्नातिपित्तल। हरते केवलं वातं बलवीर्यकरो गुरुः ।।२२७।। पियाज के नाम तथा गुण-पलाण्डु, यवनेष्ट, दुर्गन्ध और मुखदूषक ये सब पियाज के नाम हैं। पियाज को गुणों में लहसुन के समान समझना चाहिये। पियाज-रस तथा पाक में मधुर रस युक्त, अनुष्ण (ईषत् उष्णवीर्य) एवं
३२८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) बच्चों एवं वृद्धों के कफविकारों में विशेषकर जब ज्वर न हो तब यह लाभदायक है। कच्चे प्याज के रस को मिश्री मिलाकर बच्चों को चटाया जाता है तथा वृद्धों में इसको पकाकर देते हैं। क्षुयजकास में इससे कष्ट कम हो जाता है। श्वसनियों के जीर्ण शोथ के लिये लाभदायक औषधियों में यह श्रेष्ठ औषधि है। (२) वाजीकरण के लिये इसके रस को मधु एवं घृत के साथ दिया जाता है। (३) अर्श में इसके रस को १-२ तो० मिश्री के साथ पिलाते हैं या प्याज को पकाकर उसमें मिश्री, घी तथा जीरा मिलाकर खिलाते हैं एवं गरम-गरम मस्सों पर बाँधते हैं। (४) मसूढ़ों की सूजन तथा शूल में इसको नमक के साथ खिलाते हैं। (५) इसका क्वाथ आन्त्रावरोध, अर्श, कामला एवं गुदभ्रंश आदि में लाभदायक है। (६) विसूचिका में इसके रस के साथ चूने का पानी मिलाकर पिलाते हैं। अग्नि वृद्धि के लिये सिरके के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। प्लेग आदि मरक के समय कच्चे प्याज या सिरके के साथ इसका उपयोग किया जाता है। (७) अपतन्त्रक तथा नासिका से रक्तस्राव होने पर इसका नस्य कराया जाता है। चक्कर आता हो तो इसको सुँघाते हैं। (८) कर्णपिटिका में इसका पुटपाक करके साधारण गरम रस कान में डालने से शूल कम हो जाता है। इसके बीच के टुकड़े को भी कान में रखने से लाभ होता है। (९) अंधता तथा धुन्ध आदि विकारों में इसका रस मधु में मिलाकर नेत्र में लगाते हैं तथा रात्र्यंध में नमक के साथ इसका रस डालते हैं। (१०) इसको घी में भूनकर उसका पोल्टिस गाँठ, फोड़े, बद एवं व्रण आदि पर लगाया जाता है। आमवातादि संधिविकार एवं अन्य दाह, कण्डू आदि चर्म रोगों में इसके रस को सरसों के तेल में मिलाकर मलते हैं। (११) बिच्छू तथा अन्य कीड़ों के काटने पर इसके रस को लगाने से दाह एवं वेदना की शांति होती है। (१२) प्याज के बीज बाजीकर होते हैं। इसको पीसकर मधु के साथ खालित्य, व्यंग एवं झाँई आदि पर लगाते हैं। दाद में सिरका में पीसकर इसे लगाते हैं एवं मस्सों पर नमक के साथ इसका उपयोग किया जाता है। ८०. जंगली प्याज उपर्युक्त प्याज के अतिरिक्त इसी वर्ग का एक जंगली प्याज होता है जिसकी दो-तीन किस्में भारतवर्ष में पाई जाती हैं। यह डाक्टरी स्किल (Squill) नामक औषधि अर्जिनीया मॅरिटिमा (Urginea maritima (Linn.) Baker) की श्वेत उपजाति जो भूमध्यसागरीय तट पर होती है उसका अच्छा प्रतिनिधि है। यह अत्यन्त उपयोगी होने के कारण यहाँ उसका वर्णन दिया जा रहा है। लोग इसे रा० नि० एवं नि० र० का कोलकंद मानते हैं। दोनों निघण्टुकार उसे 'वान्तिशमनकृत्' लिखते हैं लेकिन जंगली प्याज 'वान्तिजननः' होता है। (क) ले०- Urginea indica, Kunth. (अर्जिर्निया इण्डिका, कुंथ)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। सं०- कोलकन्द, वनपलांडु। हिं०, बं०- कांदा, जंगली प्याज। गु०- जंगली कांदो, पाण कंदो। म०- नानकांदा, कोलकांदा, कोचिंदा। ता०- नेरि वंगायम्। ते०- अडवितेलु गड्डु। पं०- कफोर, कचवरसल। अ०- उन्मुले हिंदी। फा०- पियाज सहराई। अ०- Indian Squill (इण्डियन स्किल)। यह पश्चिमी हिमालय में ७००० फीट तक, गढ़वाल, कुमाऊँ, बिहार एवं कारोमंडल तट तथा कोंकण के रेतीले किनारों एवं पश्चिमी घाट पर पाया जाता है।