भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 369

३१८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) श्वित्र में चौथाई भाग हरताल के साथ गोमूत्र में पीस कर इसका लेप लाभदायक होता है। खैर एवं आँवले के क्वाथ के साथ इसके चूर्ण का सेवन भी लाभदायक है। सालभर तक यदि बाकुची एवं काले तिल का सेवन करें तो सभी प्रकार के कुष्ठ अच्छे होकर शरीर की कान्ति बढ़ती है। इसको जल के साथ पीस कर भी लेप किया जा सकता है। नवीन तथा युवावस्था के श्वेत कुष्ठ रोग में शीघ्र लाभ होता है किन्तु अधिक दिन तक लगाना पड़ता है। इससे दाग लाल हो जाते हैं। (२) बाकुची में रहने वाला तैल ही प्रधान कार्यकारी भाग है। यह तैल चर्म के ऊपर रहने वाले मालागोलाणुओं (Streptococi) के लिये घातक है। अंतस्त्वचीय धमनिकाओं के ऊपर इसका निश्चित प्रभाव पड़ता है जिससे इनका विस्फार होकर वहाँ रक्तरस (Plasma-प्लाज्मा) का प्रवाह बढ़ जाता है। इससे चर्म लाल हो जाता है तथा रञ्जक कोषों (मेलॅनोब्लास्ट्स्-Melanoblasts) को उत्तेजना मिलकर रञ्जक का निर्माण होता है। यह रञ्जक, सफेद दागों में फैलकर उसका वर्ण परिवर्तन कर देता है। अधिकांश लोगों में इससे सफेद दाग लाल हो जाते हैं लेकिन कुछ (५%) लोगों में इससे छाले पड़ जाते हैं इसलिए इसको अन्य चीजों के साथ आवश्यक प्रमाण में मिश्रण कर लेना चाहिये जिससे दागों में केवल लाली आ जाय। श्वित्र के साथ-साथ यदि अन्य आंत्रिक विकार जैसे आमातिसार आदि हों तो उनकी भी चिकित्सा साथ-साथ करनी चाहिये। (३) फिरंगोत्तर श्वित्र में बाकुची के तैलीय राल सदृश सत्व (Oleo-resinous extract) का लेप लाभदायक होता है। इस सत्व में सोरॅलेन् तथा आइसो-सोरॅलेन् दोनों ही रहते हैं। इसको चॉलमोगरा के तेल के साथ मिलाकर लगाया जाता है तथा आन्तरिक प्रयोग भी करते हैं जिससे श्वित्र, सिध्म तथा सोरियासिस् में लाभ होता है। लगाने के लिये इसके साथ-साथ भाग चॉलमोगरा का तेल तथा २ भाग लॅनोलिन् मिलाकर मलहम बनाकर दिन में एक, दो बार दागों पर मलना चाहिये। करीब ३ महीने में लाभ होता है। मात्रा-बीज चूर्ण १-३ माशां। अथ चक्रमर्दः (चकवड़)। तस्य नामानि तत्फलस्य च गुणांश्चाह चक्रमर्दः प्रपुन्नाटो दद्रुघ्नो मेषलोचनः। पद्माटः स्यादेड जश्चक्री पुन्नाट इत्यपि ।। २१० ।। चक्रमर्दो लघुः स्वादू रूक्षः पित्तानिलापहः। हृद्यो हिमः कफश्वासकुष्ठदद्रुकृमीन्हरेत् ।। २११ ।। हन्त्युष्णं तत्फलं कुष्ठकण्डूदद्रुविषानिलान्। गुल्मकासकृमिश्वासनाशनं कटुकं स्मृतम् ।। २१२ ।। चकवड़ के नाम और उसके फल के गुण-चक्रमर्द, प्रपुन्नाट, दद्रुघ्न, मेषलोचन, पद्माट, एडगज, चक्री और पुन्नाट ये सब चकवड़ के नामान्तर हैं। चकवड़-लघु, स्वादिष्ट, रूक्ष, पित्तवात (वातपित्त) नाशक, हृदय के लिए हितकर, शीतवीर्य, कफ, श्वास, कुष्ठ, दद्रु (दाद) और कृमि को नष्ट करने वाला होता है। चकवड़ का फल- उष्णवीर्य और कटु रस युक्त होता है एवम् कुष्ठ, खुजली, दाद, विष, वायु, गुल्म, कास, कृमि और श्वास इन सब रोगों को दूर करने वाला होता है। [२१०-२१२] ७३. चकवड़ हिं०-चकवड़, पवाँड, पवाँर। बं०-चकुन्दा, पनेवार। म०-तरोटा, टाकली। गु०-कुँवाडीयो। क०- तगचे। ते०-तगरिस। ता०-उशिट्टुगरै। पं०-पँवार, चकुन्दा। फा०-संगेसतूया। अ०-कुल्ब। अं०-Fetid cassia (फीटिड कॅशिया)। ले०-Cassia tora Linn. (कॅशिया टोरा, लिन.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA