भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 1167 में से

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हरीतक्यादिवर्गः ३१९ यह प्रायः सब प्रान्तों के जङ्गल, झाड़ी, खेत, मैदान, कूड़ा करकट, सड़क के किनारे एवं गन्दे स्थानों में आप ही आप उत्पन्न होता है । इसका २-५ फीट तक ऊँचा एकवर्षायु क्षुप वर्षा ऋतु में बहुतायत से उत्पन्न होता है। पत्र-संयुक्त पक्षकार और पत्रक-तीन जोड़े, अभिलट्वाकार, १-२ इञ्च लम्बे, चिकने, चमकीले, दुर्गन्धयुक्त एवं स्पष्ट शिराजाल से युक्त होते हैं। इसके निचले पत्रकों के बीच में एक ग्रन्थि होती है। पुष्प-छोटे पीले रंग के अक्षकोणीय एवं दो-दो के जोड़े में आते हैं। फलियाँ-४-८ इञ्च लम्बी, पतली, चौकोनी, कुछ मुड़ी हुई तथा इनका अग्र नुकीला होता है। बीज-बहुत, कड़े एवं मेथी के समान होते हैं। इसके कोमल पत्तों का साग बनाया जाता है तथा औषधि में पञ्चाङ्ग का व्यवहार किया जाता है। इसी का एक दूसरा भेद है जिसे कॅशिया ऑव्ट्यूसिफोलिया (Cassia obtusifolia) कहते हैं। इसका क्षुप भी ऊपर के क्षुप के समान ही होता हैं लेकिन इसमें दुर्गन्ध नहीं होती तथा इसके आधारीय पत्रकाद्वय के बीच में एक ग्रन्थि होती है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में एमोडिन (Emodin) नामक एक ग्लूकोसाइड पाया जाता है जो क्राइसोफेनिक् एसिड (Chrysophanic acid) की तरह होता है। इसके पत्तों में कॅथार्टिन (Cathartin) नामक एक विरेचक द्रव्य तथा लाल रंग होता है। गुण और प्रयोग-इसके बीज बल्य, दीपन, पाचन एवं त्वक् दोषहर होते हैं तथा पत्र विरेचक, कृमिघ्न एवं पार्यायिक ज्वरहर होते हैं। (१) इसके बीज की क्रिया त्वचा पर होती है। दाद, खुजली, कुष्ठ, सिध्म, पामा एवं छाजन (एक्झिमा) आदि में यह बहुत लाभदायक है। जिन रोगों में त्वचा मोटी हो जाती है उनमें इससे विशेष लाभ होता है। दाद में मूली के पत्ते के साथ या नींबू के रस के साथ या करञ्ज के तेल के साथ पीस कर इसे लगाया जाता है। छाजन में मट्ठे के साथ पीस कर लगाते हैं। सिध्म के लिये कांजी में पीसकर लगाना चाहिये। व्रणवस्तु के स्थान पर उत्पन्न होनेवाली तन्तु युक्त गाँठों (कीलॉइड-Cheloid) के लिये इसके बीजों को सेहुँड के दूध में भिगोकर फिर गोमूत्र में पीस कर लेप करने से लाभ होता है। अर्धविभेदक आदि शिरोरोग में कांजी के साथ इसका लेप उपयोगी है। इसका सेवन कॉफी के रूप में भी किया जाता है। (२) इसके पत्तों का क्वाथ बच्चों के विकारों में विशेषकर दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर मृदु विरेचक के रूप में दिया जाता है। इसका रस भिलावे से उत्पन्न दाह पर लगाया जाता है। इसका पोल्टिस बनाकर फोड़ों पर बाँधने से फोड़े जल्दी पक जाते हैं एवं वातरक्त, गृध्रसी तथा संधिवात में भी इनके बाँधने से वेदना कम होती है। इसके पत्तों को एरण्ड तैल में भूनकर दुर्गंध युक्त व्रणों में पुल्टिस के रूप में प्रयोग से लाभ होता है। मात्रा-बीज चूर्ण १-२ माशा। अथातिविषा (अतीस) । तस्या नामगुणानाह- विषा त्वतिविषा विश्वा शृङ्गी प्रतिविषाऽरुणा। शुक्लकन्दा चोपविषा भङ्गुरा घुणवल्लभा ।।२१३।। विषा सोष्णा कटुस्तिक्ता पाचनी दीपनी हरेत्। कफपित्तातिसारामविषकासवमिकृमीन् ।।२१४।। अतीस के नाम तथा गुण-विषा, अतिविषा, विश्वा, शृङ्गी, प्रतिविषा, अरुणा, शुक्लकन्दा, उपविषा, भङ्गुरा और घुणबल्लभा ये सब अतीस के नाम हैं। अतीस-उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्तरस युक्त, पाचक तथा अग्निदीपक होती है एवम् कफ, पित्त, अतिसार, आम, विष, कास, वमन और कृमि इन सब रोगों को दूर करनेवाली होती है। [२१३-२१४]

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