भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० भावप्रकाशनिघण्टुः ७४. अतीस हिं०-अतीस । बं०-आतइच । म०-अतिविष । पं०-अतीस । ते०-अतिवव । क०-अतिविषा । गु०- अतिवखनी कली । ता०-अतिवदयम । भोटि०-अइस । अं०-Indian Atees (इण्डियन् अतीस) । ले०- Aconitum heterophyllum, Wall. (एकोनाइटम् हेटरोफाइलम्, वाल.); Fam. Ranunculaceae (रॅनन्क्युलेंसी) । यह हिमालय पहाड़ में कुमाऊँ से हसोरा तक शिमला और इसके आस-पास में तथा चम्बा प्रान्त में ६ से १५ हजार फुट ऊँची चोटियों पर पाया जाता है । इसका क्षुप-२ से ४ फीट ऊँचा होता है । काण्ड-गोल, सीधा तथा विभिन्न आकार वाली पत्तियों से घिरा होता है । पत्र-नीचे के पत्तों के फलक प्रायः पाँच विच्छेदों से युक्त एवं गोलाई लिये हुये ताम्बूलाकार या लट्त्वाकार- ताम्बूलाकार होते हैं । ऊपर के पत्ते छोटे तथा धार पर दन्तुर होते हैं । पुष्प-नील अथवा हरितनील, १ से १।। इञ्च लम्बे एवं चमकीले होते हैं । आभ्यंतर पुट का एक दल सबसे बड़ा और फणाकार होता है । मूल-मूल में दो कन्द होते हैं जिनमें एक पिछले वर्ष का और दूसरा नये वर्ष का होता है । नवीन कन्द लम्बगोल या शंक्वाकार, हाथी की सूँड़ की तरह, १ इञ्च लम्बा तथा १/४ से १/२ इञ्च मोटा होता है । कन्दत्वक्-पतली तथा श्वेताभ, फीके राख के रङ्ग की तरह होती है । कन्द-स्वाद में अत्यन्त कडुवा, आसानी से टूट जाने वाला और भीतर से श्वेत तथा पिष्टमय पदार्थ से युक्त रहता है । इसे तोड़ने पर श्वेत मध्य भाग के चारों तरफ ४ काले धब्बे दिखलाई देते हैं । इनमें गन्ध नहीं रहती । इसमें कीड़े बहुत जल्दी लग जाते हैं तथा कीड़े लगने पर यह निःसत्व हो जाता है इसलिये औषधि में बिना कीड़े लगे हुवे अच्छे मूलकन्द का ही व्यवहार करना चाहिये । अन्य निघण्टुकारों ने वर्ण भेद से इसके ३, ४ भेद लिखे हैं लेकिन आजकल केवल एक ही भेद और मिलता है । जिसका वर्णन नीचे दिया गया है । (क) Aconitum palmatum D. Don (एकोनाइटम् पार्मेटम्) हिं०-बखमा । सं०-प्रतिविषा । इसके क्षुप पूर्वी हिमालय में सिकिम, गुर्बाल तथा मिश्री पर्वतों में पाये जाते हैं । इसके मूल अतीस की अपेक्षा अधिक लम्बे, कम मोटे, तोड़ने में सख्त, अधिक काले रङ्ग के तथा वजन में बहुत भारी होते हैं । इन पर गाँठें होती हैं । गुण आदि में यह अतीस के समान ही है । रासायनिक संगठन-वत्सनाभ वर्ग की औषधि होने पर भी यह विषैली नहीं है । इसमें एक अत्यन्त कड़वा बिना रवेदार क्षाराभ अतीसिन (Atisine) होता है जो विषैला नहीं है । इसके अतिरिक्त इसमें एकोनाइटिक् एसिड (Aconitic acid), टैनिक एसिड, अधिक मात्रा में पिष्टमय पदार्थ, वसा तथा ओलिइक्, पामिटिक् एवं स्टियरिक ग्लिसराइड्स (Oleic, Palmitic and Stearic Glycerides) के मिश्रण तथा गोंद, इक्षु शर्करा एवं राख २% आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-अतीस दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ग्राही, वृष्य, बल्य एवं विषमज्वरहर है । इसके सेवन से शरीर की विनिमय क्रिया सुधरती है । इसको ४-८ माशा देने पर भी विषैला परिणाम नहीं होता । इसका प्रयोग आमातिसार, विषमज्वर, कास, वमन, कुपचन, शूल, नवीन शोथयुक्त विकार एवं बालरोगों में किया जाता है । (१) तिक्तपौष्टिक तथा ग्राही होने के कारण अतिसार एवं संग्रहणी में इससे अच्छा लाभ होता है । बच्चों के वमन, अतिसार, ज्वर एवं खांसी में इससे बहुत लाभ होता है । इससे पाखाना पीला होकर मात्रा कम होती है । बच्चों तथा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA