भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३२१ प्रसूता में यदि अतिसार हो तो इसके साथ शृङ्ग भस्म देना चाहिये। अतीस के साथ भांग एवं घोड़वच मिलाकर अतिसार में दिया जाता है। इसके साथ सुगन्धित, कडुवी पौष्टिक तथा ग्राही अन्य औषधियाँ मिलाने से ज्यादा लाभ होता है। (२) इसको अधिक मात्रा में देने पर ही इसका ज्वरघ्न गुण स्पष्ट होता है लेकिन उस मात्रा में ज्वर कम होने के साथ-साथ विबन्ध भी हो जाता है जो विषमज्वर के लिये अहितकारक है। इसलिये विषमज्वर में इसकी अपेक्षा कुटकी ज्यादा लाभदायक होती है। ज्वर पश्चात् दौर्बल्य दूर करने के लिये दीपनीय एवं तिक्त पौष्टिक के रूप में इसका उपयोग अधिक अच्छा है। ज्वरातिसार के लिये यह अत्युत्तम औषधि है। इसमें १५ रत्ती अतीस तथा १५ रत्ती रसाञ्जन जल के साथ देते हैं। इसके साथ सुगन्धित पदार्थ मिलाने से ज्यादा लाभ होता है। बड़ों की अपेक्षा बच्चों के ज्वरातिसार में यह ज्यादा उपयोगी है। (३) मूषिक विष में इसको मधु के साथ सुबह चटाया जाता है। (४) कृमियों को निकालने के लिये इसके साथ विडंग का प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण १/२-२ माशा ज्वरातिसार, अतिसार में। चूर्ण २-४ रत्ती बल्य, तिक्तपौष्टिक । अथ लोध्रः 'शावरलोध्र-पटियालोध' इति लोके प्रसिद्धयोर्नामगुणानाह लोध्रस्तिल्वस्तिरीटश्च शावरो गालवस्तथा । द्वितीयः पट्टिकालोध्रः क्रमुकः स्थूलवल्कलः । जीर्णपत्रो बृहत्पत्रः पट्टी लाक्षाप्रसादनः ।। २१५ ।। लोध्रो ग्राही लघुः शीतश्चक्षुष्यः कफपित्तनुत् । कषायो रक्तपित्तासृग्ज्वरातीसारशोथहृत् ।। २१६ ।। शावरलोध्र और पटियालोध के नाम तथा गुण-लोध्र, तिल्व, तिरीट, शावर, गालव ये नाम लोध्र अर्थात् सावरलोध के हैं और दूसरा जो पटिआलोध (पटानी लोध) है उसके पट्टिकालोध्र, क्रमुक, स्थूलवल्कल, जीर्णपत्र, बृहत्पत्र, पट्टी और लाक्षा प्रसादन ये सब नाम हैं। दोनों प्रकार के लोध्र-ग्राही, लघु, शीतवीर्य, नेत्रों के लिए हितकर, कफपित्तनाशक, कषायरस युक्त, रक्तपित्त, रक्तविकार, ज्वर, अतिसार और शोथनाशक होते हैं। [२१५-२१६] ७५. लोध हिं०-लोध। बं०-म०-क०-लोध, लोध्र। गु०-लोधर। ते०-लोधुगचेट्टु। अ०-मुगाम। अं०- Lodh (लोध); Symplocos Bark (सिम्प्लोकोस् वार्क)। ले०-Symplocos racemosa, Roxb. (सिम्प्लोकॉस् रेसिमोसा, राक्सब) । Fam. Symplo-caceae (सिम्प्लोकेसी)। यह भारत के पूर्वोत्तर प्रान्त नेपाल, कुमाऊँ से आसाम, बंगाल, छोटा नागपुर, वर्मा आदि प्रदेशों के जङ्गल और छोटे पहाड़ों में पाया जाता है। इसका छोटा वृक्ष-२० फुट तक ऊँचा होता है। छाल-खुरदरी और गहरी धूसर (Grey) वर्ण की होती है। काट-(Blaze-ब्लेझ) आधा इञ्च तक मोटा, रेशेदार, हल्का पीला परन्तु हलके नारंगी भूरे रंग की रेखाओं से युक्त होता है। पत्ते-३।। से ७ इञ्च लम्बे, अण्डाकार-आयताकार या अण्डाकार-भालाकार; पत्राग्र-तीक्ष्ण, कुण्ठितलम्ब या कुंठित; पत्र तट-आरावत, अस्पष्ट गोलदन्तुर या क्वचित अखण्ड; पत्र पृष्ठ-कोमल पत्तों का ऊपर का पृष्ठ चिक्कण तथा अधोपृष्ठ मृदु रोमश, तथा अन्य पत्रों के पृष्ठ चिक्कण या मध्यशिरा पर कुछ रोमों से युक्त, चमकीले तथा ऊपर का पृष्ठ गहरे हरे रङ्ग का; शिराएँ-बगल की शिराएँ सूखे हुवे पत्तों में स्पष्ट, ५-९ जोड़ी एवं पत्रवृन्त १/४ से १/२ इञ्च लम्बा होता है। आश्विन से अगहन तक फूल फल आते हैं। फूल-गुच्छों में, पीले और सुगन्धित होते हैं। फल- अष्ठिल, प्रायः आध इञ्च लम्बे, आयताकार, चिक्कण, बैंगनी काले रङ्ग के एवं उनका बाह्यकोष चिपका रहता है। इसकी २४ भाव.I