भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३२३ (४) श्लीपद (Filaria = फाइलेरिया) के कारण उत्पन्न पायसमेह (Chyluria = काइलूरिया) तथा फीलपांव (Elephantiasis = एलिर्फेन्टियासिस) में यह लाभदायक सिद्ध हुआ है। (५) कुष्ठ एवं व्रण आदि में इसका अंतः बाह्य प्रयोग किया जाता है। प्रसूता में योनिक्षत के लिये इसका लेप उपयोगी है। गलशूण्डिका एवं लोध्र का मधु के साथ मसूढ़ों पर लेप करते हैं। सूजन पर लोध्र के लेप से सूजन कम हो जाती है। मात्रा-चूर्ण ५-१० रत्ती। ७६. पठानी लोध हिं०-पठानी लोध। बं०-पटिया लोध। गु०-पठाणी लोधर। पं०-पठानी लोद, लान्दर, लोज, लोश। म०-पट्टी लोध्र। ते०-तेल्ल लुट्टुगु। क०-बिली लोध्र। सिन्ध०-लोदर, पठानी लोध। ले०-Symplocos crataegoides Buch. Ham. (सिम्प्लोकॉस् क्रेटेगॉइडिस्)। Fam. Symplocaceae (सिम्प्लोकेसी)। इसके वृक्ष हिमालय में सिन्ध नदी से आसाम तक, खासिया पहाड़ और मरतवान के पहाड़ों में ३-९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं। यह वृक्ष-३० फुट तक ऊँचा होता है। छाल-हलके सफेद रंग की और कार्क युक्त होती है तथा उस पर खड़ी नालियाँ रहती हैं। काट-आधा इञ्च मोटा, हलका पीला व रेशेदार होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, १-१॥ इञ्च चौड़े, पतले, अण्डाकार या लट्वाकार, लंबाग्र और अग्र की ओर तीक्ष्ण दन्तुर होते हैं तथा सूखने पर पीले रङ्ग के हो जाते हैं। फूल-सफेद, समशिखाकार गुच्छों में तथा सुगन्धित होते हैं। इसके फूलों की सुगन्धि दूर तक जान पड़ती है। फल-चौथाई इञ्च से तिहाई इञ्च तक लम्बे तथा गोल होते हैं। उनसे मुड़ा हुआ गोल बीज निकलता है। इसके गुण और प्रयोग आदि सब उपर्युक्त लोध्र के समान ही है। अथ लशुना, तस्य नामान्याह लशुनस्तु रसोनः स्यादुग्रगन्धो महौषधम्। अरिष्टो म्लेच्छकन्दश्च यवनेष्टो रसोनकः ।।२१७।। अथ लशुनोत्पत्तिमाह यदाऽमृतं वैनतेयो जहार सुरसत्तमात्। तदा ततोऽपतद् बिन्दुः स रसोनोऽभवद् भुवि ।।२१८।। लहसुन की उत्पत्ति-जिस समय गरुड़ने इन्द्र के पास से अमृत हरण किया था उस समय उस अमृत) से जो बिन्दु (अमृत-बिन्दु) पृथ्वी पर गिरा उसी से लहसुन की उत्पत्ति हुई। [२१७-२१८] अथ रसोनशब्दस्य निरुक्तिमाह पञ्चभिश्च रसैर्युक्तो रसेनाम्लेन वर्जितः। तस्माद्रसोन इत्युक्तो द्रव्याणां गुणवेदिभिः ।।२१९।। लहसुन के 'रसोन' नाम की व्युत्पत्ति-लहसुन में ६ प्रकार के रसों में से ५ प्रकार के रस रहते हैं किन्तु केवल एक अम्ल रस नहीं रहता है, अतएव रस अर्थात् केवल अम्ल रस से ऊन अर्थात् शून्य रहने से द्रव्यों के गुणादि जानने वाले विद्वानों ने इसका 'रसोन' नाम रक्खा है। [२१९] अथ लशुने रसस्थानान्याह कटुकश्चापि मूलेषु तिक्तः पत्रेषु संस्थितः। नाले कषाय उद्दिष्टो नालाग्रे लवणः स्मृतः।। बीजे तु मधुरः प्रोक्तो रसस्तद्गुणवेदिभिः ।।२२०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA