भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 375

३२४ भावप्रकाशनिघण्टुः लहसुन में कटु आदि पाँचों रसों के रहने के स्थान—इसके मूलभाग में कटु रस रहता है । पत्तों में तिक्त रस, नाल में कषाय रस, नाल के अग्रभाग में लवण रस तथा बीज में मधुर रस रहता है, ऐसा लहसुन के गुणों के जानने वाले विद्वानों ने कहा है । [२२०] अथ लशुनगुणानाह रसोनों बृंहणो वृष्यः स्निग्धोष्णः पाचनः सरः । रसे पाके च कटुकस्तीक्ष्णो मधुरको मतः ।। २२१ ।। भग्नसन्धानकृत्कण्ठ्यो गुरुः पित्तास्रवृद्धिदः । बलवर्णकरो मेधाहितो नेत्र्यो रसायनः ।। २२२ ।। हृद्रोगजीर्णज्वरकुक्षिशूल-विबन्धगुल्मारुचिकासशोफान् । दुर्नमिकुष्ठानलसादजन्तुसमीरणाश्वासकफांश्च हन्ति ।। २२३ ।। लहसुन के गुण-लहसुन बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, उष्णवीर्य, पाचक तथा सारक होता है । और वह रस तथा पाक में कटु तथा मधुर रस युक्त, तीक्ष्ण, भग्न-सन्धानकारक (टूटी हड्डियों को जोड़ने वाला), कण्ठ को हितकारी, गुरु, पित्त एवं रक्तवर्धक, शरीर में बल तथा वर्ण को उत्पन्न करने वाला, मेधाशक्ति तथा नेत्रों के लिये हितकर और रसायन होता है । एवं हृद्रोग, जीर्णज्वर, कुक्षिशूल, मल तथा वातादिक की विबन्धता, गुल्म, अरुचि, कास, शोथ, बवासीर, कुष्ठ, अग्निमान्द्य, कृमि, वायु, श्वास और कफ को नष्ट करता है । [२२१-२२३] अथ लशुनसेविनां हिताहितपदार्थानाह मद्यं मांसं तथाऽम्लञ्च .हितं लशुनसेविनाम् । व्यायाममातपं रोषमतिनीरं पयो गुडम् ।। २२४ ।। रसोनमश्नन् पुरुषस्त्यजेदेतान् निरन्तरम् ।। २२५ ।। लहसुन सेवन करनेवालों के लिये हितकर तथा अहितकर पदार्थ-मद्य, मांस तथा अम्लरसयुक्त भक्ष्य पदार्थ ये सब लहसुन खाने वालों के लिये हितकर हैं । और व्यायाम, आतप (धूप में फिरना), क्रोध करना, अत्यन्त जल पीना, दूध और गुड़ इन सबों को लहसुन खाने वाले पुरुष सदा छोड़ दें, क्योंकि ये सब अहितकर हैं । [२२४-२२५] ७७. लहसुन हिं०-लहसुन, लशुन । बं०-रसुन । म०-लसून । क०-बेल्लुल्लिल । ते०-वेल्लुल्लिल, तेल्ललिगड्डा । ता०- वल्लपुंडु । गु०-लसण । सिंधी-पोम । आसा०-नहरु । भोटि०-गोक्पस । फा०-सीर । अ०-सूम, फूम । यू०-स्कर्दून् । अ०-Garlic (गार्लिक) । ले०-Allium sativum, Linn. (एलियम् सटाइवम्, लिन०) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में बोया जाता है । विशेषकर पश्चिमोत्तर प्रदेश, गढ़वाल, कुमाऊँ, पंजाब एवं काश्मीर आदि में अधिक उत्पन्न होता है । इसका बहुवर्षायु क्षुप-करीब १ फुट तक ऊँचा होता है । पत्र-चिपटे, लम्बे, १ इञ्च से कम चौड़े एवं इनका अग्र लम्बा होता है । पत्रकोश-३-४ इञ्च लम्बा होता है तथा पुष्प व्यूह को घेरे रहता है । पुष्पव्यूह-सवृन्त मूर्धज, छोटे, घने एवं पतले, शुष्क कोणपुष्पकों से युक्त होते हैं । इसके कन्द को लहसुन कहा जाता है जिसके अन्दर ८- २० जावा होते हैं । इसमें एक विशिष्ट प्रकार की तीव्र गन्ध तथा इसका स्वाद विशिष्ट प्रकार का कटु होता है । रासायनिक संगठन-इसमें एक बादामी पीले रंग का उड़नशील तैल ०.१-०.३% पाया जाता है जिसका वि० गु० १.०४६-१.०५७ होता है । इस तैल में प्रधान रूप से ॲलिल् डाइसल्फाइड् (Allyl disulphide, C₆ H₁₀ S₂) तथा ॲलिल्-प्रॉपिल् डाइसल्फाइड् (Allyl-propyl disulphide) एवं अल्प मात्रा में उच्च श्रेणी के पॉलीसलफाइड्स (Polysulphides) पाये जाते हैं । इसके अतिरिक्त लहसुन के मद्यसारिय सत्त्व से एक ॲल्लीसिन् (Allicin, C₆ H₁₀ S₂ O) नामक प्रतितृणाण्वीय (Antibacterial) तरल द्रव्य प्राप्त किया गया है । इसके साथ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA