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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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ही-साथ ॲल्लीसेशन् I तथा ॲल्लीसेशन् II (Allicetion I and Allicetion II) नामक दो अत्यन्त तीव्र प्रतिजैविक ((Antibiotics) पदार्थ भी पाये गये हैं जो ईथर (Ether) में घुलनशील लेकिन जल में न घुलने वाले होते हैं। **गुण और प्रयोग-**लहसुन एक बहुत ही उपयोगी औषधि है। प्राचीन काल से इसका प्रयोग किया जाता रहा है और आधुनिक विद्वानों ने भी इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। राजयक्ष्मा (Tuberculosis) एवं अन्य फुफ्फुसविकार, वातविकार, शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dyspepsia) एवं व्रण आदि के लिये यह बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुआ है। काश्यपसंहिता में लशुनकल्प नामक एक स्वतन्त्र अध्याय में इसका वर्णन किया गया है। धार्मिक ग्रन्थों में इसका सेवन निषिद्ध माना है। लहसुन उष्ण, दीपन, पाचन, वातहर, स्वेदजनन, मूत्रल, उत्तेजक, कफनिःसारक, बल्य, वृष्य, रसायन, दुर्गन्धहर एवं उत्तम प्रतिदूषक (Antiseptic) है। इसमें जो उड़नशील तैल होता है उसका उत्सर्ग, त्वचा, फुफ्फुस एवं वृक्क द्वारा होता है। फुफ्फुस से उत्सर्ग के समय इससे कफ ढीला हो जाता है तथा उसमें के जीवाणुओं का नाश होकर कफ की दुर्गन्ध दूर होती है। वात नाड़ी संस्थान पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से वमन, विरेचन एवं शिरःशूल आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। बच्चों में इसका सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये। अधिक मात्रा में सेवन करने पर कभी-कभी मृत्यु भी हो सकती है। इसका बाह्य प्रयोग त्वग्रागकारक (Rubefacient) एवं प्रतिदूषक औषधि के रूप में किया जाता है। अधिक समय. तक त्वचा के साथ सम्पर्क होने से स्फोट उत्पन्न होते हैं। (१) यक्ष्मा दण्डाणु से उत्पन्न सभी विकृतियों जैसे फुफ्फुसविकार, स्वरयन्त्रशोथ, चर्मविकार, अस्थिव्रण एवं नाड़ीव्रण आदि में यह निश्चित लाभदायक सिद्ध हुआ है। लहसुन के रस को इनमें पिलाया जाता है तथा इसका स्थानिक उपयोग भी किया जाता है। स्वरयंत्र शोथ में इसका टिंक्चर १/२-१ ड्रा० दिन में २, ३ बार देते हैं। पुराने कफविकार जैसे कास, श्वास, स्वरभङ्ग, श्वसनिका शोथ, श्वसनिकाभिस्तीर्णता (Bronchiectasis) एवं श्वासकृच्छ्र आदि में इसका अवलेह बनाकर उपयोग किया जाता है। लहसुन एवं वायविडङ्ग का सेवन भी लाभदायक है। बच्चों के कुकास में इसको ३, ४ घण्टे पर सुँघाया जाता है तथा इसके रस को पिलात भी हैं जिससे कष्ट कम हो जाता है। फुफ्फुसकोथ (Gangrene of lungs) में इसके टिंक्चर (५ में १) का उपयोग बहुत सफल रहा है। प्रारम्भ में इसको कम मात्रा में देना चाहिये तथा बाद में २० बूँद तक दिन में ३ बार देना चाहिये। थोड़े ही समय में ज्वर, कफ की दुर्गन्ध, स्वेदाधिक्य एवं अग्निमांद्य आदि दूर होकर लाभ होता है। इसी प्रकार खण्डीय फुफ्फुसपाक (Lobar pneumonia) में भी इसके टिंक्चर को ३० बूँद हर चार घण्टे पर जल के साथ देने से ४८ घण्टे के अन्दर ही लाभ मालूम होने लगता है तथा ५, ६ दिन में ज्वर कम हो जाता है। इन सभी विकारों में आन्तरिक प्रयोग के साथ-साथ इसको छाती पर लगाते भी हैं। (२) वायविडङ्ग के साथ इसका क्षीरपाक सभी वातविकार में जैसे गृध्रसी, कटिग्रह, अर्दित, पक्षाघात, एकाङ्गघात, उरुस्तम्भ, अपतन्त्रक एवं अपस्मार आदि में लाभदायक है। आन्तरिक प्रयोग के साथ इसंसे सिद्ध तैल की मालिश भी की जाती है। अपस्मार में इसका फांट भोजन के पूर्व एवं पश्चात् देने का विधान है। अपतन्त्रक में इसको सुँघाया जाता है। इसी प्रकार ठण्डक लगने से उत्पन्न पीड़ा, जीर्ण आमवात एवं संधिशोथ तथा शिरःशूल आदि में इसको खिलाया जाता है तथा बाह्य लेप भी किया जाता है। बच्चों के वात विकारों में इसकी मालिश विशेष लाभदायक है। (३) शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dyspepsia), आध्मान उदरशूल, विसूचिका, वमन, गुल्म, उदावर्त, आँव एवं केंचुवों की बीमारी में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। केंचुआ (Round worms) में १०-३० बूँद रस