भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ भावप्रकाशनिघण्टुः दूध में मिलाकर पिलाते हैं। वातगुल्म में इसको पीस कर घृत के साथ खिलाने से लाभ होता है। ग्रहणीव्रण (Duodenal ulcer) में भी इसको लाभदायक माना गया है। (४) विषमज्वर में इसको तैल या घृत के साथ सुबह खिलाने से लाभ होता है। आन्त्रिक एवं तन्द्राभ ज्वर (Typhoid and Typhus) के प्रतिबन्धन के लिये इसका टिंक्चर को १ ड्रा० हर ४ या ६ घण्टे पर शरबत के साथ देते हैं। यदि रोग के प्रारम्भ में ही इसका प्रयोग किया जावेगा तो ज्वर बढ़ने नहीं पावेगा। इसका उपयोग आन्त्रिक प्रतिदूषक (Intestinal antiseptic) औषधि के रूप में किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। बच्चों को ½ ड्रा० की मात्रा में शरबत के साथ पर्याप्त है। (५) हृद्रोग में इसके प्रयोग से आध्मान कम हो कर हृदय के ऊपर का दबाव दूर होता है जिससे हृदय को बल प्राप्त होकर मूत्र अधिक होने लगता है तथा सर्वाङ्गशोथ एवं जलोदर में लाभ होता है। (६) इसके स्वरस को ३, ४ भाग जल में मिला कर क्षत तथा दुर्गन्धित व्रण प्रक्षालन के काम में लाया जाता है जिससे वेदना कम होकर व्रण जल्दी ठीक होता है। कार्बोलिक एसिड (Carbolic acid) की अपेक्षा इससे धातुओं को कम नुकसान होता है। इसी प्रकार शोथ, विद्रधि, बालतोड़ एवं दाद आदि पर इसका लेप लाभदायक है। इससे सिद्ध सर्षप तैल का उपयोग खुजली (पामा) में किया जाता है। रोहिणी (Diphtheria) नामक अत्यन्त उग्र गले के विकार में इसकी एक, एक कली चूसने को दी जाती है। ३, ४ घण्टे में १ छटांक तक लहसुन दिया जाता है। विकृत कला (Membrane) के दूर होने पर दिन भर में १ छटांक तक लहसुन देना चाहिये। शिशुओं के लिये इसके रस को २०-३० बूँद हर चार घण्टे पर शरबत के साथ देना चाहिये। एक रोगी में नाड़ीव्रण (Sinus) के लिये इसके ताजे स्वरस को २ बूँद को मात्रा में हर छठें दिन स्थानिक सूचिकाभरण किया गया जिससे ४ इञ्च गहरा नाड़ीव्रण २ महीने के अन्दर ठीक हो गया। उपजिह्वा शोथ में इसका स्थानिक प्रयोग सिल्वर नाइट्रेट् (Silver nitrate) की अपेक्षा अच्छा होता है। (७) कर्णशूल में इसके गुनगुने रस का या इससे सिद्ध तैल का उपयोग लाभदायक है। इससे वाधिर्य में भी लाभ होता है। (८) आर्तवप्रवर्तक होने के कारण इसका उपयोग अनार्तव एवं कष्टार्तव आदि में किया जाता है। गर्भिणी में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। (९) मवेशियों में अँन्थ्राक्स (Anthrax) नामक रोग के प्रतिबन्धन के लिये एवं सर्पविषादि में बाह्याभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है। हानिनिवारक-कतीरा, धनियाँ एवं बादाम का तेल। मात्रा-स्वरस १०-३० बूँद; कल्क २-३ माशा। ७८. एकपुतिया लहसुन हिं०-लहसुन, एककांदा लहसुन, एककली लहसुन, एकपुती लहसुन, एकपुतिया लाहुसन। बं०-गंधुन। अं०-Shallot (शॅल्लोट), One Clove Garlic (वन क्लोव गार्लिक)। ले०-Allium ascalonicum Linn. (एलियम् ॲस्कॅलोनिकम् लिन) Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। यह अनेक प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसकी जड़ दो वर्ष या इससे कुछ अधिक ही जीवित रह सकती है। इसके साथ कई एक अण्डाकार लम्बे जावे रहते हैं। यह १-१॥ इञ्च तक लम्बा और मध्यमा अङ्गुली के समान मोटा होता CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA