भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२८ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) बच्चों एवं वृद्धों के कफविकारों में विशेषकर जब ज्वर न हो तब यह लाभदायक है। कच्चे प्याज के रस को मिश्री मिलाकर बच्चों को चटाया जाता है तथा वृद्धों में इसको पकाकर देते हैं। क्षुयजकास में इससे कष्ट कम हो जाता है। श्वसनियों के जीर्ण शोथ के लिये लाभदायक औषधियों में यह श्रेष्ठ औषधि है। (२) वाजीकरण के लिये इसके रस को मधु एवं घृत के साथ दिया जाता है। (३) अर्श में इसके रस को १-२ तो० मिश्री के साथ पिलाते हैं या प्याज को पकाकर उसमें मिश्री, घी तथा जीरा मिलाकर खिलाते हैं एवं गरम-गरम मस्सों पर बाँधते हैं। (४) मसूढ़ों की सूजन तथा शूल में इसको नमक के साथ खिलाते हैं। (५) इसका क्वाथ आन्त्रावरोध, अर्श, कामला एवं गुदभ्रंश आदि में लाभदायक है। (६) विसूचिका में इसके रस के साथ चूने का पानी मिलाकर पिलाते हैं। अग्नि वृद्धि के लिये सिरके के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। प्लेग आदि मरक के समय कच्चे प्याज या सिरके के साथ इसका उपयोग किया जाता है। (७) अपतन्त्रक तथा नासिका से रक्तस्राव होने पर इसका नस्य कराया जाता है। चक्कर आता हो तो इसको सुँघाते हैं। (८) कर्णपिटिका में इसका पुटपाक करके साधारण गरम रस कान में डालने से शूल कम हो जाता है। इसके बीच के टुकड़े को भी कान में रखने से लाभ होता है। (९) अंधता तथा धुन्ध आदि विकारों में इसका रस मधु में मिलाकर नेत्र में लगाते हैं तथा रात्र्यंध में नमक के साथ इसका रस डालते हैं। (१०) इसको घी में भूनकर उसका पोल्टिस गाँठ, फोड़े, बद एवं व्रण आदि पर लगाया जाता है। आमवातादि संधिविकार एवं अन्य दाह, कण्डू आदि चर्म रोगों में इसके रस को सरसों के तेल में मिलाकर मलते हैं। (११) बिच्छू तथा अन्य कीड़ों के काटने पर इसके रस को लगाने से दाह एवं वेदना की शांति होती है। (१२) प्याज के बीज बाजीकर होते हैं। इसको पीसकर मधु के साथ खालित्य, व्यंग एवं झाँई आदि पर लगाते हैं। दाद में सिरका में पीसकर इसे लगाते हैं एवं मस्सों पर नमक के साथ इसका उपयोग किया जाता है। ८०. जंगली प्याज उपर्युक्त प्याज के अतिरिक्त इसी वर्ग का एक जंगली प्याज होता है जिसकी दो-तीन किस्में भारतवर्ष में पाई जाती हैं। यह डाक्टरी स्किल (Squill) नामक औषधि अर्जिनीया मॅरिटिमा (Urginea maritima (Linn.) Baker) की श्वेत उपजाति जो भूमध्यसागरीय तट पर होती है उसका अच्छा प्रतिनिधि है। यह अत्यन्त उपयोगी होने के कारण यहाँ उसका वर्णन दिया जा रहा है। लोग इसे रा० नि० एवं नि० र० का कोलकंद मानते हैं। दोनों निघण्टुकार उसे 'वान्तिशमनकृत्' लिखते हैं लेकिन जंगली प्याज 'वान्तिजननः' होता है। (क) ले०- Urginea indica, Kunth. (अर्जिर्निया इण्डिका, कुंथ)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। सं०- कोलकन्द, वनपलांडु। हिं०, बं०- कांदा, जंगली प्याज। गु०- जंगली कांदो, पाण कंदो। म०- नानकांदा, कोलकांदा, कोचिंदा। ता०- नेरि वंगायम्। ते०- अडवितेलु गड्डु। पं०- कफोर, कचवरसल। अ०- उन्मुले हिंदी। फा०- पियाज सहराई। अ०- Indian Squill (इण्डियन स्किल)। यह पश्चिमी हिमालय में ७००० फीट तक, गढ़वाल, कुमाऊँ, बिहार एवं कारोमंडल तट तथा कोंकण के रेतीले किनारों एवं पश्चिमी घाट पर पाया जाता है।