भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३२९ यह वनस्पति सुदर्शन सदृश होती है। पत्र-मूलीय, ६-१८ इञ्च लम्बे, प्याज से बड़े और चौड़े, चिपटे, रेखाकार एवं नोकदार होते हैं। पत्रों के निकलने से पूर्व बीच से सदण्डिक पुष्पध्वज (Scape-स्केप) निकलता है जिस पर हरिताभ श्वेत पुष्प निकलते हैं। फल-सामान्यस्फोटी फल (Capsule-कॅपसूल) अण्डाकार, आधे-पौन इञ्च लम्बे, दोनों ओर क्रमशः पतले होते हुवे एवं ६-९ बीजों से युक्त होते हैं। बीज-छोटे, दीर्घवृत्ताकार, चिपटे तथा काले होते हैं। इसका कन्द प्याज की तरह २-४ इञ्च लम्बा, लट्वाकार एवं परिच्छदपत्रक (Tunicated Bulb-ट्यूनिकेटेड बल्ब) स्वरूप का होता है। इसके कटे हुये टुकड़े मुड़े हुए, चिपटे, विभिन्न आकार के आधे से दो इञ्च लम्बे, दोनों छोर की तरफ क्रमशः पतले होते हुए, कभी-कभी तीन या चार एक साथ, काण्डक से चिपके हुए, लंबाई में रीढ़दार ये हलके पीताभ बादामी या हलके पीत विभिन्न वर्ण के होते हैं। ये छिलके शुष्क अवस्था में सहज चूर्ण बनाने लायक एवं आर्द्र हो जाने पर चमड़े एवं लचीले हो जाते हैं। इनमें गंध नहीं होती तथा इनका स्वाद तिक्त एवं कटु होता है। ताजा कन्द खाने से जीभ पर कण्डू मालूम होती है। पहिले वर्ष के नींबू के इतने बड़े कन्द का व्यवहार करना चाहिये। पुष्पित होने पर इसके कोमल कंदों को निकाल कर, उनके ऊपर के पतले छिलकों को हटा कर, उनके टुकड़े करके सुखाकर शुष्क स्थान में रखा जाता है। इसका चूर्ण हवा से जल सोख लेता है इसलिये इसको बिलकुल शुष्क बंद पात्र में रखना चाहिये। (ख) Scilla indica, Baker (सिल्ला इण्डिका, बेकर)। हिं०, बं०-सुफेदी खस। बंबई-भुइकांदा। ता०-शिरू-नेरि-वेंगयम्। यह दक्षिणी पेनिन्सुला में कोंकण एवं नागपुर से दक्षिण की तरफ समुद्र के किनारे रेतीली भूमि में उत्पन्न होता है। इसी से मिलती-जुलती एक जाति सि० होईनकेरी (S. hohenackeri) पंजाब में मिलती है। इनके कन्द श्वेताभ बादामी, अंशच्छद पत्रक (Scaly bulb) स्वरूप के, जायफल के इतने बड़े, गोल या अंडाकार एवं कभी-कभी बगल से दबे हुए होते हैं। इनके मांसल छिलके (शल्क पत्र) बहुत चिकने होते हैं एवं इनके किनारे परस्पर ढके रहने के कारण इनका एक ही पर्त मालूम होता है। (क) और (ख) दोनों ही के गुण समान हैं तथा बाजार में दोनों के कंद मिले हुवे बिकते हैं तथा इनके शुष्क टुकड़े भी बिकते हैं। ये कंद विदेशी कंदों से कुछ छोटे होते हुए भी उन्हीं की तरह कड़वे एवं हल्लासकारक होते हैं। (क) और (ख) के कंदों में यही अन्तर है कि (क) के कन्द परिच्छद पत्रक (Tunicated bulb-ट्यूनिकेटेड बल्ब) स्वरूप के एवं (ख) के कंद अंशच्छदपत्रक (Scaly bulb-स्केली बल्ब) स्वरूप के होते हैं। रासायनिक संगठन-ताजे कंद में सिल्लारेन-ए (Scillaren-A, C₃₆ H₅₂ O₁₃) नामक एक रवेदार ग्लाइकोसाइड (Glycoside) तथा सिल्लारेन-बी Scillaren-B) नामक चूर्ण रूप का ग्लाइकोसाइड (Glycoside) पाया जाता है जिनमें से दूसरे में कम-से-कम दो ग्लाइकोसाइड मिले रहते हैं। इनमें से सिल्लारेन-ए जल में बहुत कम घुलता है और सिल्लारेन-बी जल और क्लोरिफार्म में घुलने वाला एवं अॅल्कोहोल या ईथर में न घुलने वाला होता है। कंद में जिस अनुपात में ये दोनों ग्लाइकोसाइड रहते हैं उनका सिल्लारेन (Scillaren) नामक मिश्रण जल में सरलता से घुल जाता है तथा वह बहुत दिन तक खराब भी नहीं होता। भारतीय स्क्वल में उपर्युक्त ग्लाइकोसाइड के अतिरिक्त गोंद, कर्बोज, फाइटोस्टेरॉल (Phytosterol) एवं कॅल्शियम ऑक्झॅलेट् (Calcium oxalate) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, तिक्त, कफनिःसारक, हृदयोत्तेजक, हृद्य, मूत्रविरेचक तथा उत्क्लेश एवं वमनकारक है। इसकी क्रिया डिजिटॅलिस् (Digitalis) के समान होती है जिससे हृदय की गति कम होती है एवं हृदय का कार्य ठीक होने से हृदय को बल प्राप्त होता है। पचन संस्थान द्वारा इसका प्रचूषण कम होने के कारण इसको अधिक मात्रा में देना पड़ता है लेकिन अधिक मात्रा में इससे महास्रोत में प्रक्षोभ होकर वमन, अतिसार एवं रक्तातिसार होता है। यह