भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० भावप्रकाशनिघण्टुः स्थानिक प्रक्षोभक प्रभाव इसमें के रेफाइड्स (Raphides) के कारण होता है । हृदय पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष मांसपेशी की अपेक्षा प्राणदा नाडी (Raphides) के द्वारा अधिक होता है । डिजिटैलिस की अपेक्षा इसकी क्रिया शीघ्र एवं अस्थायी होने के कारण इससे संचायी दुष्परिणाम नहीं होते । अल्प मात्रा में इसके प्रयोग से आमाशय में साधारण प्रक्षोभ होकर प्रत्यावर्तन क्रिया द्वारा कफ निकलने लगता है । वृक्क द्वारा उत्सर्ग के समय वृक्क कोशाओं को उत्तेजित करने के कारण डिजिटैलिस की अपेक्षा इससे मूत्रविरेचन अधिक होता है । अधिक मात्रा में रक्तमेह भी हो सकता है । इसका नूतन वृक्क रोगों में प्रयोग नहीं करना चाहिये । (१) हृदयोदर, सर्वांग शोफ एवं जलोदर आदि में इसका उपयोग किया जाता है । जिन व्यक्तियों में डिजिटैलिस के प्रति असहनशीलता होती है उनमें तथा जिनको जीर्ण कफविकार भी साथ-साथ रहते हैं उन्हें यह ज्यादा उपयोगी है । इससे काफी मात्रा में मूत्रस्राव होता है । इसका मूत्रल प्रभाव प्रत्यक्ष वृक्क कोशाओं की उत्तेजना से एवं रक्ताभिसरण की क्रिया ठीक होने से है । हृदयोदर में गेजपिल (Guy’s Pill) नामक पारद एवं डिजिटैलिस के साथ बनी इसकी गोलियों का व्यवहार किया जाता है । (३) बच्चों के जीर्ण श्वसनी विकारों में इसके शर्बत का उपयोग १०-१५ बूँद की मात्रा में किया जाता है । जीर्ण कफ विकारों में इससे तीन तरह से लाभ होता है । जीर्ण कफविकारों में हृदय के दक्षिण विभाग में जो शिथिलता आई रहती है वह दूर होती है, कफढीला होकर निकलने लगता है एवं पाचन सुधरकर शौच भी साफ होने लगता है । जिनमें कफ बहुत एवं चिपचिपा होता है उनमें इससे विशेष लाभ होता है । नूतन कफविकारों में इसका प्रयोग नहीं किया जाता । इपीकैक की अपेक्षा अधिक प्रक्षोभक होने के कारण वमन के लिये भी इसका उपयोग नहीं करते हैं । (३) पादकंटक (Corn = कॉर्न) पर इसके कंद को पकाकर पीसकर गरम-गरम बाँधते हैं तथा मस्सों (Warts = वार्ट्स) पर इसके चूर्ण को मला जाता है । मात्रा-शुष्क चूर्ण १/२-१ १/२ रत्ती; सिरप (शर्बत) ३०-६० बूँद; टिंकचर ५-३० बूँद । अथ भल्लातकः (भिलावा), तन्नाम तत्पक्वफलमज्जवृन्ताना तस्य च गुणानाह • भल्लातकं त्रिषु प्रोक्तमरुष्कोऽष्करोऽग्निकः । तथैवाग्निमुखी भल्ली वीरवृक्षश्च शोफकृत् ।।२२८।। भल्लातकफलं पक्वं स्वादुपाकरसं लघु । कषायं पाचनं स्निग्धं तीक्ष्णोष्णं छेदि भेदनम् ।।२२९।। मेध्यं वह्निकरं हन्ति कफवातव्रणोदरम् । कुष्ठार्शोग्रहणीगुल्मशोफानाहज्वरकृमीन् ।।२३०।। तन्मज्