भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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हरीतक्यादिवर्गः ३३१ अथ सामान्यतो भल्लातकगुणानाह भल्लातकः कषायोष्णः शुक्रलो मधुरो लघुः । वातश्लेष्मोदरानाहकुष्ठाशोंग्रहणीगदान् ।। हन्ति गुल्मज्वरश्वित्रवह्निमान्द्यकृमिव्रणान् ।। २३२ ।। साधारण रूप से भिलावे का गुण-भिलावा-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, उष्णवीर्य, वीर्यवर्धक एवं लघु होता है और यह वातकफ, उदररोग, आनाह, कुष्ठ, बवासीर, संग्रहणी, गुल्म, ज्वर, श्वित्रकुष्ठ, अग्निमान्द्य, कृमिरोग तथा व्रण को दूर करता है । [२३२] ८१. भिलावा हिं०, पं०-भिलावा, भेला । बं०-भेला, भेलातुकी । म०-बिब्बा । गु०, मा०-भिलामो । क०-गेरकायि । ते०-जिडिचेट्टु, जीड़िविट्टुलु । ता०-शेनकोट्टै । मला०-चेर्मर । फा०-बलादुर, बिलादुर । अ०-हब्बुलकल्ब, हब्बुलफहम् । अं०-The Marking-nut tree (दि मार्किङ्ग नट् टी) । ले०-Semecarpus anacardium, Linn. (सेमेकार्पस् ॲनाकार्डियम्, लिन.) । Fam. Anacardiaceae (ॲनाकार्डिएसी) । भिलावे के वृक्ष इस देश के विशेष कर गरम प्रान्तों में एवं हिमालय के निचले भागों में ३५०० फीट की ऊँचाई तक सतलज से पूर्व की ओर आसाम तक उत्पन्न होते हैं । इसका वृक्ष-देखने में सुन्दर २० से ४० फीट तक ऊँचा होता है । छाल-एक इञ्च मोटी धूसर रंग की होती है । छाल पर चोट मारने से उसमें से एक प्रकार का दाहजनक भूरे रंग का गाढ़ा रस निकलता है जो वार्निश बनाने के काम में आता है । लकड़ी-खाकी मिश्रित लाली युक्त सफेद या भूरे रङ्ग की होती है । छोटी-छोटी शाखाओं के नीचे कुछ तीक्ष्ण रोवें होते हैं । डालियों के अन्त में सघन पत्ते रहते हैं और वे ९ से २४ इञ्च तक लम्बे तथा ५ से १४ इञ्च तक चौड़े, ऊपर से लट्वाकार-आयताकार एवं सरल धारवाले होते हैं। माघ में पुराने पत्ते गिर जाते हैं और फागुन में नवीन पत्ते निकल आते हैं, माघ-फागुन में इसका वृक्ष फूलता है किन्तु इसके सिवाय कई बार वृक्षों पर फूल देखने में आते हैं । नन्हें-नन्हें फूलों की मञ्जरियाँ आती हैं । पुष्पदल-हरापन युक्त सफेद या हरापन युक्त पीले होते हैं । फल- एक इञ्च लम्बा तथा पौन इञ्च चौड़ा, चिपटा सा, हृदयाकृति, चमकीले काले रंग का तथा चिकना होता है । कच्चे फलों में दूध जैसा श्वेत वर्ण का रस होता है जो पकने पर कुछ गाढ़ा एवं काले रंग का हो जाता है । इस फल का आधारभाग मांसल तथा नारंगी वर्ण के स्तम्भक से बना होता है जो खाने के काम आता है । फलत्वक् में एक स्फोटकारक विषैला रस होता है जिससे धोबी कपड़ों में निशान लगाने की स्याही बनाते हैं । फल के अन्दर की मज्जा स्वादिष्ट होती है तथा वह भी खाने के काम आती है । कुछ लोगों में पुष्पित भल्लातक वृक्ष के पास सोने से या पुष्पपराग को हवा लगाने से शरीर पर सूजन आ जाती है । भल्लातक शोधन-औषधि में प्रयोग के लिये अच्छे सुपक्व तथा जल में डालने पर जो डूब जायें ऐसे भिलावों को लेकर कतर कर ईंट के टुकड़ों के साथ बोरे के अन्दर रगड़ कर फिर धोकर काम में लाना चाहिये । इससे उसके अन्दर का तैल सदृश रस कम होकर उसकी तीव्रता कम हो जाती है । इसके शोधन के पूर्व मुख, हाथ एवं पैर आदि खुले अंगों पर नारियल का तैल लगा लेना चाहिये । कुछ लोग फलों को केवल उबाल कर ठंडे जल से धोकर काम में लाते हैं । रासायनिक संगठन-इसके रासायनिक संगठन के विषय में कुछ मतभेद हैं और अभी संशोधन की आवश्यकता है । लेकिन इतना निश्चित है कि फलत्वक् के स्वरस में एक दाहजनक तैलीय पदार्थ एवं मज्जा में काजू की तरह पौष्टिक द्रव्य और एक प्रकार का तैल पाया जाता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA