भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 1167 में से

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हरीतक्यादिवर्गः ३३३ (८) इसका क्वाथ दुग्ध एवं घृत के साथ नाड़ी शोथ, वातबलासक, संखिया के विष से उत्पन्न नाड़ीविकार एवं आर्त्तवविकार में लाभदायक है। (९) इसके तैल का बाह्यप्रयोग प्रतिक्षोभक (Counter irritant) एवं स्फोटोत्पादक (Vesicant) के रूप में किया जाता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसका ज्यादा उपयोग होता है। चर्मकील, दद्रु, किलास, सन्धिपीड़ा, मोच, श्वित्र, गजचर्म, कुष्ठज ग्रन्थि एवं प्लीहावृद्धि आदि पर सूई के नोक से कई जगह इसको लगाते हैं या इसको मक्खन के साथ मिलाकर मलहम के रूप में प्रयोग करते हैं। (१०) इसकी मज्जा वाजीकर होती है। गरी एवं चिरौंजी के साथ इसका पाक सेवन कराया जाता है। विषैला प्रभाव—किसी-किसी को भिलावा सहन नहीं होता है। इससे मूत्र का रंग गहरा शरीर में दाह, खुजली, चकत्ते, अतिसार, ज्वर एवं कभी-कभी रक्तमेह, फोड़े फूट कर व्रण एवं उन्माद आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। प्रारम्भ में मूत्र की मात्रा कम होती है तथा उसका रंग धुँधला होने लगता है। गुदा एवं शिश्नेन्द्रिय के मुख पर कण्डू उत्पन्न होती है। प्रारंभिक लक्षण उत्पन्न होते ही औषधि को बन्द कर नारियल का दूध या इमली की पत्ती का रस या तिल एवं नारियल खाने को देना चाहिये। शरीर पर नारियल का तेल, घी, राल या नागद्रव (Lead lotion-लेड लोशन) का बाह्य उपयोग करना चाहिये। पथ्य—भिलावे के प्रयोग के समय घी, दूध एवं चावल का सेवन अधिक करना चाहिये। वर्ज्य—धूप में घूमना, स्त्रीसहवास, मांसभक्षण, नमक, व्यायाम एवं तैलाभ्यङ्ग आदि छोड़ देना चाहिये। निषेध—पैत्तिक विकार, रक्तस्रावी प्रवृत्ति, गर्भिणी, बाल, वृद्ध, अतिसार, वृक्कशोथ एवं उष्ण काल में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। मात्रा—तैल-१-२ बूँद, अवलेह-१/४-१/२ तोला, क्षीरपाक-१-२ तोला। अथ भङ्गा (भांग), तस्या नाम गुणानाह भङ्गा गञ्जा मातुलानी मादिनी विजया जया ।।२३३।। भङ्गा कफ हरी तिक्ता ग्राहिणी पाचनी लघुः । तीक्ष्णोष्णा पित्तला मोहमदवाग्वह्निवर्द्धिनी ।।२३४।। भांग के नाम तथा गुण—भङ्गा, गञ्जा, मातुलानी, मादिनी, विजया और जया ये सब भांग के पर्यायवाची नाम हैं। भांग—कफ को दूर करने वाली, तिक्तरस युक्त, ग्राही, पाचक, लघु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पित्तकारक तथा मोह, मद, वाणी और जठराग्नि को बढ़ाने वाली होती है।।२३३-२३४। ८२. भांग हिं०—भांग, भंग, बूटी। बं०—सिद्धि। म०-पं०-मा०—भांग। गु०—भांग। ते०—गंजाायि। ब्रही०—बिन। मा०—बूटी। क०—भंगी। ता०—कञ्जा। फा०—क (कि) नव, वंग। अ०—हशीश, बर्कुल ख्याल। गाँजा हिं०—गाँजा, गंजा, गाँझा। बं०, म०—गाँजा। ता०—गाँजा, येला। गु०—गांजो। ते०—गाञ्जई, बंगि-अकु। फा०—किन्नब। अ०—कु(कि)न्नब। अं०—Indian hemp (इण्डियन हेम्प), Cannabis (कॅन्नाबिस्)। ले०— Cannabis sativa, Linn. (कॅन्नाबिस् सेटाइव्हा, लिन.); Cannabis indica Lam. (कॅन्नाबिस् इण्डिका लॅम.)। Fam. Cannabinaceae (कॅन्नैबिनॅसी)।

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