भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ भावपादननिघण्टुः इसका पौधा भारतवर्ष में हिमालय के निचले प्रदेशों में करीब-करीब अपने स्वाभाविक रूप में उत्पन्न होता है तथा पंजाब से पूर्व की ओर बंगाल एवं बिहार तक तथा दक्षिण की ओर परती भूमि में बहुतायत से प्राप्त होता है। उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा, गढ़वाल तथा नैनीताल जिलों में इसकी उपज की जाती है। ट्रावनकोर तथा कश्मीर में भी अल्प मात्रा में इसकी उपज की जाती है। भांग का पौधा पश्चिमी तथा मध्य एशिया का नैसर्गिक (Native-नेटिह्व) माना जाता हैं। मुंगेर, पञ्जाब, नागपुर, बहराइच आदि जिलों को भंग अच्छी समझी जाती है। इसका क्षुप-सीधा ३ से ८ फीट एवं कभी-कभी १६ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-नीचे के समवर्त्ती और विषमवर्त्ती दोनों प्रकार के करतलाकार तथा आधार तक कटे हुवे होते हैं। ऊपर वाले पत्ते १-५ भागों में विभक्त और नीचे वाले ५ से ११ खण्ड में कटे हुए तथा ३ से ७ इञ्च के घेरे में रेखाकार-भालाकार दिखाई पड़ते हैं। इनके खण्ड तीक्ष्ण दन्तुर, लम्बाग्रयुक्त, आधार की तरफ संकुचित तथा इनका ऊर्ध्व पृष्ठ गहरे हरे रंग का खुरदरा एवं अधोपृष्ठ हल्के रंग का मृदुरोमश होता है। फूल-हल्के पीत-हरित रंग के, अद्विलिंगों एवं गुच्छेदार होते हैं। फल-बहुत छोटे, कुछ दबे हुवे, बीज के समान चर्मल फल (Achene = एकीनी), स्थायी परिपुष्प (Perianth = पेरियँथ) से आवृत एवं एक-एक बीजों से युक्त होते हैं। भांग के क्षुप स्त्री जाति और पुरुष जाति इन भेदों से दो प्रकार के होते हैं। स्त्री जाति का क्षुप कुछ अधिक ऊँचा तथा उसमें पत्र बहुतायत से तथा गहरे वर्ण के होते हैं। इसका क्षुप पुरुष जाति के क्षुप की अपेक्षा ५, ६ सप्ताह अधिक समय में परिपुष्ट होता है। भांग-यह उपज किये हुए या अपने आप उत्पन्न इस क्षुप के स्त्री एवं पुरुष जाति के सूखे हुए पत्तों को कहते हैं। इसमें पुरुंष जाति के पुष्प भी होते हैं। पुरुष जाति के पुष्प, पत्तों की अपेक्षा अधिक मादक नहीं होते जैसा कि स्त्री जाति के पुष्प होते हैं। जून एवं जुलाई के महीने में अधिक ऊँचाई पर होने वाले क्षुपों का एवं मई और जून में मैदानी प्रान्तों वाले क्षुपों का संग्रह किया जाता है। उन्हें काटकर ओस तथा धूप में बार-बार रख कर सुखाते हैं तथा सूखने पर दबाकर रखा जाता है। गाँजा-उपज किये हुए स्त्री जाति के क्षुप की सूखी हुई रालदार पुष्पमञ्जरी को गाँजा कहते हैं। इसका रंग मटमैला, हरा, स्वाद कुछ कटु एवं गंध विशिष्ट प्रकार की मादक होती है। गाँजे की जटा १॥ इञ्च से २॥ इञ्च तक लम्बी तथा चौड़ी होती है। एक-एक इञ्च लम्बी लकड़ियों के चारों ओर फूलदार शाखाएँ लगी रहती हैं। चरस-गाँजा के वृक्ष से एक लसदार राल के समान रस निकल कर जम जाता है उसी को चरस कहते हैं। ओस पड़ने के पश्चात् सुबह चमड़े का कपड़ा पहन कर वृक्षों में रगड़ने से समस्त चरस कपड़े पर लग जाता है उसी को चमड़े से पृथक् कर गोले या ढेले बना लेते हैं। या हाथ और पैरों से पुष्पमञ्जरियों को रगड़ कर हाथ पैरों में चिपके हुए भाग को खुरच कर जमा कर लेते हैं। हिन्दुस्तान में उत्पन्न हुए वृक्षों से चरस पृथक् नहीं की जाती इसलिये यहाँ गाँजा तैयार हो जाता है। भारतवर्ष में चरस यारकंद से, काश्मीर के लेह के रास्ते आता है। भारत के दक्षिण तथा पश्चिम में अधिकतर गाँजा नाम से भांग और गाँजा दोनों का प्रयोग होता है। भांग तो पीस कर बनाये हुये पेय को अधिकतर कहा जाता है। पुरी की तरफ गाँजे को ही पीसकर बने पेय को भांग कहा जाता है। भांग, गाँजा, चरस तथा बीजों का औषध में व्यवहार किया जाता है तथा मादक पेय एवं धूम्रपान आदि के व्यसन के रूप में लोग इनका बहुत व्यवहार करते हैं। चरक सुश्रुतादि प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं है लेकिन बाद में ग्रन्थकारों ने इनका भांग नाम से अधिकतर उपयोग किया है। शोधन-भांग तथा गाँजे को दूध में दोलायंत्र में पकाकर जल से धोकर सुखाकर प्रयोग में लाना चाहिये। रासायनिक संगठन-गाँजे में कॅन्नाबिनोन् (Cannabinone) नामक एक मुलायम बादामी रंग की राल होती है। इस राल का प्रधान तत्त्व एक लाल रंग का गाढ़ा मादक (Narcotic) तैल होता है जो वायु के साथ संपर्क में आने पर गाढ़ा तथा अल्प वीर्य हो जाता है। इस तैल में एक कॅन्नाबिनोल् (Cannabinol, C₂₁ H₂₆ O₂) नामक विषैला तत्त्व रहता है जो इसमें का कार्यकारी तत्त्व नहीं है। इस राल के अतिरिक्त इसमें गोंद, शर्करा, कॅल्शियम् फॉस्फेट् (Calcium phosphate), अत्यल्प मात्रा में उड़नशील तैल, सेन्द्रिय अम्ल, कलमी सोरा एवं नौसादर आदि पदार्थ