भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३३५ पाये जाते हैं। अफ्रीकी, अमेरीकी एवं भारतीय किस्मों के गुणों में विशेष अन्तर नहीं है तथा शुष्क अवस्था में अच्छी तरह रखने से बहुत दिन तक इसके गुण भी कम नहीं होते। गांजे में करीब २६%, भांग में १०% एवं चरस में ४०% राल होती है। गुण और प्रयोग-भांग एवं गाँजे के गुण करीब-करीब समान ही हैं लेकिन भांग की क्रिया विशेषतः आमाशय एवं आंत्र पर, अधिक होती है तथा यह गाँजे की अपेक्षा अधिक ग्राही होती है। यह उत्तेजक, वेदनाहर, शांतिकारक, क्षुधावर्धक, आह्लादकारक, सौमनस्यजनन, स्वापजनन, आक्षेपनिरोधी (Anticonvulsant), उद्वेष्टननिरोधी (Antispasmodic), गर्भाशयसंकोचक, मूत्रजनन, संग्राही, बल्य, बाजीकर एवं स्थानिक स्वापजनन है। इसकी प्रधान क्रिया मस्तिष्क पर होती है। सेवन के पश्चात् करीब आधे घंटे में इसका प्रभाव मालूम होने लगता है। गाँजे के धूम्रपान के पश्चात् तुरंत असर होता है। इसकी क्रिया अफीम तथा मद्यसार की तरह होती है लेकिन इसके वीर्य में विभिन्नता होने के कारण इसका प्रभाव अनिश्चित होता है। अल्प मात्रा में इसके सेवन से कुछ उत्तेजना आती है तथा आह्लाद मालूम होने लगता है। किसी भी कार्य में मन एकाग्र होता है। इसके प्रभाव से काल एवं व्यक्तित्व का ज्ञान नहीं रहता तथा ऐसा मालूम होता है कि घण्टों तक आनन्द से बीता जबकि केवल कुछ मिनट ही बीते रहते हैं। अधिक मात्रा में प्रलाप होता है तथा तत्पश्चात् निद्रा आती है। निद्रा के पश्चात् अफीम की तरह इससे थकावट नहीं आती तथा उतना विबन्ध भी नहीं होता। आक्षेप निरोधी, उद्वेष्टन निरोधी एवं वेदनाहर गुण बहुत स्पष्ट है। भांग से बने पेय से मूत्र की मात्रा बढ़ती है। इसका गर्भाशय संकोचक प्रभाव प्रत्यक्ष मांसपेशी के संकोच एवं अप्रत्यक्षतया नाड़ीसंस्थान के द्वारा होता है। सांवेदनिक नाड़ियों की संवेदना शक्ति का घात होने से चर्म में शून्यता तथा झुनझुनाहट होती है। नाड़ी की गति उत्तेजना की अवस्था में बढ़ जाती है तथा बेहोशी की अवस्था में कम हो जाती है। उत्तेजना की अवस्था में श्वसन क्रिया शीघ्र होने लगती है। साधारण मात्रा में इसके व्यसन से शारीरिक या मानसिक कोई विकृति नहीं होती है। यह धारणा कि इसके व्यसन से पागलपन (Insanity) की प्रवृत्ति बढ़ती है सिद्ध नहीं हुई है। अधिक मात्रा में यदि निरन्तर उपयोग किया जाय तो शरीर एवं मन को हानि पहुँचती है तथा आत्मसम्मान का ह्रास एवं नैतिक पतन हो जाता है। (१) संग्रहणी, अतिसार, रक्तातिसार, कुपचन, आमाशय में पीड़ा एवं विसूचिका में अन्य औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इससे भूख बढ़ती है एवं उद्वेष्टन तथा पीड़ा दूर होती है। विरेचक औषधों के साथ प्रयोग से मरोड़ नहीं होती। विसूचिका के प्रारम्भ में ही इसको देने से लाभ होता है। अतिसार के पश्चात् रोग निवृत्तावस्था में इसका पानक शान्तिदायक औषध के रूप में व्यवहार में आता है। (२) वेदनाहर गुण के कारण पुराने सिर दर्द, सूर्यावर्त (Migraine = माइग्रेन), रजोनिवृत्ति के समय होनेवाले दर्द एवं थकावट आदि से उत्पन्न शिरःशूल में इसका उपयोग किया जाता है। वातनाड़ीशोथ में गाँजा के साथ पारद देते हैं एवं वातनाड़ी पीड़ा में गांजा, सोमल एवं लोह देते हैं। टेबीज् डॉर्सेलिस (Tabes dorsalis) नामक फिरंग से उत्पन्न रोग में एक प्रकार की विद्युत् के समान चपल एवं तीव्र पीड़ा (Lightning pains) होती है जिसमें गाँजे से लाभ होता है। (३) वेदनाहर एवं उद्वेष्टननिरोधी गुण के कारण आन्त्रिक, पैत्तिक एवं वृक्क शूल तथा बस्ति उद्वेष्टन एवं सोजाक से उत्पन्न वेदनायुक्त शिश्नोत्थान (Chordee) में इसका उपयोग किया जाता है। अपतन्त्रक, कम्पवात, वातिक वमन एवं बालकों के आक्षेप में इससे लाभ होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA