भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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३३६ भावप्रकाशनिघण्टुः धनुर्वात (Tetanus) के लिये यह बहुत लाभदायक है। इसको अधिक मात्रा में एवं अधिक दिन तक प्रयोग करना पड़ता है। जलसंत्रास (Hybrophobia) में आक्षेप कम करने के लिये इसको देते हैं। (४) स्वापजनन गुण के कारण निद्रानाश विशेष कर वृद्धावस्था के निद्रानाश (Senile insomnia) में इसका उपयोग किया जाता है। (५) गाँजा से गर्भाशय में सङ्कोच होता है एवं वेदना भी कम होती है जिससे पीड़ातार्तव, अत्यार्तव तथा प्रसव के समय आवि वृद्धि के लिये इसको देते हैं। बीजकोश पीड़ा (Ovarian irritation) में इसको देते हैं। (६) अर्श में इसके आन्तरिक प्रयोग के साथ भांग को दूध में उबाल कर पीस कर उसकी टिकिया बाँधते हैं। हरिद्रा, प्याज तथा तिल के साथ पीस कर लेप करने से एवं इसके धूएँ से भी लाभ होता है। (७) गाँजा अत्यन्त वाजीकर है। मस्तिष्क के ऊपर प्रभाव से आह्लाद उत्पन्न होकर कामवासना बढ़ती है एवं रक्ताभिसरण को उत्तेजना मिलने से शिश्न अधिक कठोर हो जाता है। इसके साथ-साथ संवेदना शक्ति के ह्रास से अधिक काल तक घर्षण करने से भी शुक्र पात नहीं होता। अफीम, धतूरा एवं अन्य औषधों के साथ बने पाक का प्रयोग नपुंसकता एवं शीघ्रपतन आदि में किया जाता है। (८) शुष्क कास, कुकास एवं तमक श्वास में इसको खिलाते हैं अथवा इसका धूम्रपान कराते हैं। फुफ्फुसावरण शोथ में पीड़ा शमन के लिये अफीम की अपेक्षा यह अधिक अच्छी है। (९) जीर्ण आमवात में इसको खिलाते हैं तथा इसके बीजों का तेल मालिश किया जाता है। (१०) स्थानिक वेदनाशामक होने के कारण विसर्प, वातिक पीड़ा, खुजली एवं जलन में इसका लेप उपयोगी है। अरूंषिका (Dandruff) तथा जूँ आदि में सर पर इसका लेप करते हैं। चरस—यह मदकारी, शुक्रस्तम्भन, मूर्च्छा एवं हृदयदौर्बल्य कारक है। इससे हल्लास, विबन्ध एवं शिरःशूल आदि नहीं होते तथा तम्बाखू के साथ इसका धूम्रपान उन्माद एवं अपतन्त्रक आदि में शामक औषध के रूप में किया जाता है। विषैला प्रभाव—भांग एवं गाँजा आदि अधिक मात्रा में लेने से आँखें लाल हो जाती हैं। चेहरा फूल सा जाता है, पैर लड़खड़ाते हैं तथा बुद्धि एवं स्मृति का नाश, अग्निमान्द्य, अनिद्रा, दौर्बल्य, प्रलाप एवं शिरःशूल आदि लक्षण होते हैं। क्वचित् हृदयातिपात से मृत्यु होती है। हानिनिवारक—वमन कराना एवं दूध, दही, घृत तथा नारंगी, अनार, अमरूद आदि फलों के रस पिलाना चाहिये। मात्रा—भांग १-४ रत्ती; गाँजा १/२-१ रत्ती; चरस १/४-१/२ रत्ती। अथ खाखसः (पोस्ता)। तस्य नामानि तत्फलोद्भववल्कलगुणानाह तिलभेदः खसतिलः खाखसश्चापि स स्मृतः। स्यात् खाखसफलोद्भूतं वल्कलं शीतलं लघु ।।२३५।। ग्राहि तिक्तं कषायञ्च वातकृत् कफकासहृत्¹ ।।२३६।। धातूनां शोषकं रूक्षमदकृद्वाग्विवर्धनम्²। मुहुर्मोहकरं रुच्यं सेवनात्पुंस्त्वनाशनम् ।।२३७।। पोस्ता के नाम तथा गुण—तिलभेद, खसतिल और खाखस ये सब नाम पोस्ता के हैं। पोस्ता के फल का छिलका शीतल, लघु, ग्राही, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, वातकारक, कफ तथा कास को दूर करनेवाला, धातुओं को १. 'तत् कफास्र'ति पा०। २. 'मेहमदवाग्वह्निवर्धनमि'ति पा०।