भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 388, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३३७
सुखानेवाला, रूक्ष, मदकारक, वाणी को बढ़ाने वाला, बार-बार मोहकारक, रुचिकारक और नित्य सेवन करने से पुरुषत्व को नाश करने वाला होता है। [२३५-२३७] ८३. पोस्ता क्षुपनाम-हिं०-पोस्ता। बं०-पोस्तार गाछ। अ०-नवातुल खश्खाश। फा०-कोकनार। ले०-Papaver somniferum, Linn. (पॅपेवर सॉम्निफेराम्, लिन.)। Fam. Papaveraceae (पॅपर्रैसी)। फलनाम-हिं०-पोस्त, पोस्ता, खसखस का फल, पोस्त के डोडे। बं०-पोस्तोढेरी। म०-अफूचे बोंड, खसखशीचे बोंड। गु०-अफीणना डोडा। ते०-गसुगसालु। ता०-गशगशा चेडि। मला०-कशकशा चेट्टि। फा०-पोस्ते कोकनार। अ०-किश्रुल खश्खाश बुस्तानी। अं०-Poppy Capsule (पॉपी कैप्स्यूल)। ले०- Papaveris capsulae (पॅपवेरिस् कॅप्सूली)। अफीम के क्षुप को पोस्ता कहा जाता है। यह क्षुप बाहर से भारतवर्ष में आया है लेकिन यहाँ की जलवायु अनुकूल होने के कारण इसकी यहाँ खेती की जाने लगी। चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट एवं चक्रदत्त में अफीम का उल्लेख नहीं है। शार्ङ्गधर (१४, १५वीं शताब्दी) एवं भावप्रकाश (१६वीं शताब्दी) में इसका प्रयोग किया गया है। अफीम की जानकारी के पूर्व लोग पोस्ते की डोडी का उपयोग उत्तेजक एवं मादक पेय के रूप में करते थे। अफीम की खोज सम्भवतः सर्वप्रथम ग्रीस में हुई तथा पहली शताब्दी में 'एशिया माइनर' इसके व्यापार का केन्द्र रहा। अरबों ने इसका प्रचार चीन एवं भारतवर्ष में किया। मुगलों के समय भारत में इसकी व्यापक रूप में खेती की जाती थी जिससे लोग इसकी डोडी का उपयोग 'कुकनार' नामक मादक पेय के रूप में करते थे। यहाँ से चीन एवं पूर्वीय देशों को काफी मात्रा में अफीम जाती थी। पंजाब में 'पोस्त' नाम से कुकनार की तरह पेय का प्रयोग किया जाता था। अंग्रेजों के समय इसकी खेती पर व्यापक नियन्त्रण के कारण धीरे-धीरे इसकी खेती कम होती गई तथा पोस्ते की डोडी का भी उपयोग कम हो गया। अंग्रेजों के समय इसकी उपज के ३ केन्द्र थे। बिहार एवं बंगाल की अफीम 'पटना या बंगाली' अफीम, उत्तर प्रदेश की अफीम 'बनारसी' एवं राजपुताना के ग्वालियर, भोपाल तथा बड़ोदा आदि स्थानों की अफीम 'मालवा' अफीम कहलाती थी। पञ्जाब के कुछ भागों में धार्मिक आधार पर इसके खेतों को छूट है अन्यथा इसकी खेती के लिये अनुमति पत्र लेना पड़ता है तथा पूरी उपज सरकार निश्चित मूल्य पर खरीद लेती है। आजकल इसकी खेती उत्तरप्रदेश, पूर्वी पञ्जाब, राजपुताना एवं मध्यभारत में की जाती है। एशिया, यूरोप एवं उत्तरी अफ्रीका के साधारण उष्ण प्रदेशों में भी इसकी खेती की जाती है। अक्तूबर, नवम्बर महीने में इसके बीजों को बोते हैं। दिसम्बर में सरकारी अफसर खेत की जाँच करते हैं। जनवरी से मार्च तक अफीम का संग्रह करके अप्रिल से जून तक बिकने के लिये भेजी जाती है। काले, लाल और सफेद फूलों के भेद से पोस्ते तीन प्रकार के होते हैं। इनमें सफेद फूल वाला पोस्ता सबसे अधिक प्रायः सम्पूर्ण भारतवर्ष में होता है। संयुक्तप्रान्त, बिहार और बङ्गाल की ओर सफेद ही होता है। इसका एक वर्षायु क्षुप- ३-४ फुट तक ऊँचा होता है। कांड-चिकना चमकीला हरित क्वचित् अल्प रोमश एवं अल्प शाखा युक्त होता है। पत्र-आयताकार, विषम दन्तुर, अल्पशः तरंगी या खण्डित एवं उनका हृदयाकृति फलकमूल कांड को घेरे रहता है। फूल-कटोरीनुमे बहुत सुहावने दिखाई पड़ते हैं। फूल खिलने के एक महीने बाद पुष्पफल के बीच डोंडी (फल) लगती है। डोंडी (Capsule)-अण्डाकार या करीब-करीब वर्तुलाकार, २-३ इञ्च के घेरे में एवं कभी-कभी आधार एवं शीर्ष पर दबी हुई होती है। इसका शीर्ष टोप की तरह कंगूरेदार, १२-१५ कंगूरों से युक्त एक बड़े कुक्षि (Stigma = स्टिग्मा) से बना होता है। इसका आधार संकुचित होकर एक ग्रीवा बनाता है जो पुष्प दण्ड की तरफ फैली हुई रहती है। इसका आधार संकुचित होकर एक ग्रीवा बनाता है जो पुष्प दण्ड की तरफ फैली हुई रहती है। इसका रंग हलका पीताभ या २५ भाव.I