भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३८ भावप्रकाशनिघण्टुः भूरा एवं इस पर कुछ काले रंग के धब्बे रहते हैं। इसकी महीन एवं मिदुर फल भित्ति से अन्दर की तरफ १२-१५ महीन अन्तर्भित्तियाँ निकली रहती हैं जो बीच में आपस में मिलती नहीं। इसमें शीर्ष पर अक्ष के ठीक नीचे चारों तरफ कई छिद्र बन जाते हैं जिनसे बीज बाहर निकल कर बीज स्फुटन (Dehiscence) होता है। इसी डोंडी से अफीम निकाली जाती है। सफेद फूल वाले पोस्ते से मॉर्फीन (Morphine) सबसे कम निकलती है। बाजार में मिलने वाली डोंडी टूटी-फूटी तथा उन पर लम्बाई में या आडेबल में चीरे लगे होते हैं। डोंडी के खानों के भीतर छोटे-छोटे करीब-करीब सफेद रंग के वृक्काकृति अनेक बीज होते हैं। इनकी सतह जालीदार एवं किनारे सीधे होते हैं। ये गन्धहीन एवं इनका स्वाद मधुर एवं कुछ कड़वा होता है। काले या नीले फूल तथा काले डण्ठल वाला पोस्ता राजपुताना एवं मध्यभारत में बहुत पाया जाता है। इसका पौधा बहुत छोटा और डोंडें भी बहुत छोटे-छोटे होते हैं। इसमें मॉर्फीन (Morphine) श्वेत जाति की अपेक्षा तिगुनी निकलती है। लाल फूल वाला पोस्ता हिमालय पहाड़ में पाया जाता है। काश्मीर और उत्तरीय भारत के मैदानों में २-३ प्रकार का लाल फूल का पोस्ता स्वयं उत्पन्न होता है। उसके फूलों को 'गुललाला' कहते हैं। इसके डोंडे से गहरे रंग के पोस्तदाने निकलते हैं। लाल फूल वाले पोस्ते से मॉर्फीन मध्यम मात्रा में निकलती है। रासायनिक संगठन-पोस्ते की डोंडी में ०.१-०.३% मॉर्फीन (Morphine) एवं अत्यल्प मात्रा में कोडीन (Codeine), पॅपॅहेराइन (Papaverine) एवं नार्कोटीन (Narcotine) आदि क्षाराभ एवं मेकोनिक एसिड (Meconic acid) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-पोस्ते की डोंडी में अल्प मात्रा में अफीम के क्षाराभ होने के कारण यह निद्राकर, मादक, वेदनाहर, ग्राही एवं रक्तस्तम्भक होती है। (१) वेदनाहर एवं निद्राजनक होने के कारण इसके फांट या क्वाथ को शिरःशूल, अर्धवभेदक, पार्श्वशूल, कटिशूल, गृध्रसी, उन्माद एवं अनिद्रा आदि में पिलाते हैं तथा इसका स्थानीय लेप किया जाता है। गले के दर्द में इससे गण्डूष कराते हैं। (२) ग्राही औषधियों के साथ अतिसार एवं संग्रहणी में इसका चूर्ण बहुत लाभदायक है। रक्तातिसार में देने से रक्त गिरना भी बन्द हो जाता है। बच्चों के दन्तोद्भेद के समय होने वाले अतिसार में इसका प्रयोग किया जाता है। (३) मोच, सूजन एवं चमड़े के छिल जाने आदि में इसके फांट या क्वाथ से सेंका जाता है। (४) शुष्क कास में अन्य औषधों के साथ इसके चूर्ण का उपयोग लाभदायक है। (५) पीड़ायुक्त नेत्राभिष्यन्द में इसका लेप नेत्र के चारों तरफ लगाते हैं। (६) कर्णपीड़ा में इसके क्वाथ से सेंका जाता है। (७) कोकनार नामक मादक पेय के रूप में इसका बहुत प्रयोग किया जाता था एवं अफीम की जानकारी के पूर्व भी मादक एवं उत्तेजक पेय तथा शामक औषध के रूप में इसका व्यवहार किया जाता था। मात्रा-१-२ माशा। अथाहिफेनकम् (अफीम)। तस्य नामगुणानाह उक्तं खसफलक्षीरमाफूकमहिफेनकम्। आफूक शोषणं ग्राहि श्लेष्मघ्नं वातपित्तलम्। तथा खसफलोद्भूतवल्कलप्रायमित्यपि ।।२३८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA