भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ भावप्रकाशनिघण्टुः अफीम तथा मॉर्फीन के प्रयोग (१) अल्प मात्रा में अफीम का उपयोग उत्तेजक औषध के रूप में बहुत अच्छा होता है। डर लगना, उदासीनता, चिन्तायुक्त वृत्ति, खेदवृत्ति, थोड़े से क्रोध से हाथ पैर काँपने लगना, थकावट एवं वृद्धावस्था में जीवन से निराश होना ऐसी परिस्थितियों में इससे बहुत लाभ होता है। निरोगी अवस्था में प्रयोग से कामवासना बढ़ती है। (२) बहुत विचार करना, बहुत अभ्यास करना, चिन्ता तथा जिन व्याधियों में पीड़ा की वजह से नींद न आती हो उनको निद्रा के ३ घण्टे पूर्व उपयोग किया जाता है। (३) शूल, पीड़ा एवं प्रक्षोभ आदि के लिये यह बहुत ही उपयोगी है। इसका उपयोग गृध्रसी, वातनाड़ी शोथ, कटिशूल, सन्धिशूल, पार्श्वशूल, कष्टार्तव, चोट, शरीर का जलना, अस्थिभग्न, सन्धिभंग शस्त्रक्रिया के पूर्व एवं पश्चात्, आन्त्रिकशूल, पैत्तिकशूल, वृक्कशूल, अश्मरी, आमाशयिक शूल, आमाशय प्रक्षोभ, आमाशयिक व्रण, आन्त्रिक व्रण एवं कर्कटार्बुद आदि में किया जाता है। वृक्कजन्य आक्षेप में मूत्रल औषधों के साथ इसे देते हैं। (४) अतिसार एवं संग्रहणी आदि में जब मल पक्व हो जाता है लेकिन ग्रहणी दौर्बल्य से दस्त बन्द नहीं होते तब अन्य ग्राही औषधियों के साथ इसकी गोली का प्रयोग किया जाता है। ऐसी अवस्थाओं में जातीफलादि रस (भै० र०) या दुग्धवटी (भै० र०) का अच्छा उपयोग होता है। विसूचिका की प्रारंभिक अवस्था में अहिफेनासव के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है लेकिन शीताङ्ग अवस्था में इसका प्रयोग न करें। टायफॉयड (आन्त्रिक ज्वर) में अतिसार हो तो इससे दस्त कम होने के साथ-साथ वातिक लक्षणों में भी लाभ होता है। डर, घबड़ाहट तथा अन्य मानसिक कमजोरी के कारण होने वाले अतिसार में भी इससे लाभ होता है। (५) प्रतिश्याय के प्रारम्भ में स्वेदल औषध के रूप में इसको देते हैं। (६) रक्तष्ठीवन में इसका उपयोग किया जाता है। इससे रक्त का दबाव कम होता है, हृदय की गति मन्द होती है, खांसी कम होती है, मानसिक चिन्ता दूर होती है एवं नींद आती है। रक्तातिसार तथा आमाशयव्रण में आंत्रिक गति कम होकर लाभ होता है। (७) शुष्क कास, दमा, कुकास, फुप्फुसावरण शोथ एवं क्षयज ग्रन्थियों की वृद्धि से प्रक्षोभ होकर सूखी खाँसी आती हो तो इसको मधु के साथ चटाने से लाभ होता है। जिसमें कफ बहुत जमा हो और जिसमें खाँसी कफ निकल जाने के लिये आ रही हो उसमें अफीम का प्रयोग नहीं करना चाहिये। श्वासकृच्छ्र, नीलीमा एवं श्वसनमार्ग में अवरोध हो तो इसका प्रयोग न करें। दमे में इसके प्रयोग से आदत पड़ने की सम्भावना रहती है इसलिए जहाँ तक हो प्रयोग न करें। (८) हृदय एवं रक्तवाहिनियों के कारण यदि श्वासकृच्छ्र हो तो इससे बहुत लाभ होता है लेकिन यदि जलोदर आदि के दबाव से हृदय का कार्य ठीक न होता हो तो इसका प्रयोग न करें। (९) प्रचुर लालास्राव, श्वेतप्रदर एवं मधुमेह में इससे लाभ होता है। मधुमेह में अफीम का प्रयोग बहुत किया जाता है लेकिन कर्नल चोपरा के मत से इसमें बिलकुल लाभ नहीं होता। (१०) मलेरिया आदि विषमज्वरों में इससे लाभ होता है ऐसी धारणा थी। जिन-जिन स्थानों में अफीम का सेवन किया जाता है वहाँ मलेरिया कम होता है ऐसी धारणा थी। कुछ विद्वानों ने इसके नार्कोटीन (Narcotine) नामक क्षाराभ को १/२-१ १/२ रत्ती की मात्रा में मलेरिया में सफलतापूर्वक प्रयोग किया लेकिन कर्नल चोपरा के प्रयोगों के द्वारा यह ज्ञात होता है कि इससे मलेरिया के कीटाणुओं पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं होता। यह बात अवश्य है कि अफीम या नार्कोटीन मस्तिष्क के उन स्थानों का जहाँ सूक्ष्मतर वेदनाओं का ज्ञान होता है (Algesic areas of brain), CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA