भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३४३ अवसाद उत्पन्न करती है जिससे ज्वर में होने वाले शिरःशूल, बेचैनी एवं शरीर में पीड़ा आदि लक्षण कम होकर तथा पसीना आकर ज्वर कम होने से लाभ प्रतीत होता है। मस्तिष्क या उसके आवरण में शोथ होने से यदि ज्वर हो तो इसका प्रयोग न करें। (११) गर्भपात में शामक औषध के रूप में अफीम या मॉर्फीन का पूर्ण मात्रा में उपयोग किया जाता है। अत्यार्तव एवं रक्तप्रदर आदि में नार्कोटीन से व्युत्पन्न अन्य स्टिप्टिसीन या स्टिप्टॉल आदि का उपयोग आन्तरिक एवं स्थानिक पिचु आदि के रूप में व्यवहार किया जाता है। (१२) फुफ्फुसावरण शोथ, आमवात एवं कटिशूल आदि में इसका पोल्टिस लगाया जाता है या १ छटाँक गरी या तिल के तेल में ३ माशा अफीम मिलाकर मालिश की जाती है। मलाशय, श्रोणिगुहा की पीड़ा एवं परिकर्तिका आदि में अफीम की गुदवर्ति या बस्ति का उपयोग किया जाता है। शोथयुक्त अर्श पर माजूफल के साथ अफीम का मल्हम लगाया जाता है। कर्णशूल में गिलसरीन के साथ इसके टिंक्चर को कान में डालने से लाभ होता है। **अफीम के विष लक्षण—**अफीम अधिक मात्रा में लेने से या आत्महत्या के लिये प्रयोग से घातक होती है। प्रथम तन्द्रा मालूम होती है। रोगी को उस समय जगाया जा सकता है लेकिन धीरे-धीरे तन्द्रा बढ़ कर संन्यास का रूप धारण कर लेती है तब रोगी को जगाया नहीं जा सकता। आँखों की पुतलियाँ बिलकुल संकुचित हो जाती हैं लेकिन मृत्यु के कुछ मिनट पूर्व पुतलियाँ विकसितों हो जाती हैं। शरीर ठण्डा और पसीने से तर हो जाता है। चेहरा, ओठ एवं अङ्गुलियाँ नीली पड़ने लगती हैं। नाड़ी अत्यन्त क्षीण तथा मन्द होती है। श्वास मन्द, अनियमित तथा अन्तिम अवस्था में घरघराहट युक्त हो जाता है। प्रत्याक्षिप्त क्रियाएँ लुप्त हो जाती हैं। अन्त में श्वासावरोध से मृत्यु हो जाती है। अवसादावस्था प्रायः ४ से ६ घण्टे रहती है और ६ से १२ घण्टे में मृत्यु हो जाती है। विष चिकित्सा—(१) सर्वप्रथम रोगी को रीठे का जल या सरसों या राई जल के साथ या तूतिया १० रत्ती जल के साथ पिलाकर वमन कराना चाहिये। लेकिन प्रायः वमन केन्द्र के अवसादित होने के कारण वमन नहीं होता इसलिये सबसे अच्छा यह है कि स्टमक् पम्प या साइफन् के द्वारा आमाशय प्रक्षालन कराया जाय। सर्वप्रथम रोगी को २-४ रत्ती पोटैशियम् परमैग्नेट २ से ६ छटाँक जल के साथ पिला दें। फिर उसी के हल्के घोल से आमाशय प्रक्षालन तब तक करें जब तक घोल का रंग उसी तरह नहीं रहता। (२) श्वसन केन्द्र को उत्तेजित करने के लिये बार-बार गरम कॉफी का क्वाथ पिलाना तथा अॅट्रोपीन, स्ट्रिक्नीन् १/६० ग्रेन, कोरामीन एवं लेप्टॅझॉल आदि का सूचिकाभरण करना, कृत्रिम श्वसन कराना या श्वसन यन्त्रों का उपयोग करना, ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइ ऑक्साइड को सुँघाना आदि उपचार करना चाहिये। अफीम आदि के अवसादक तथा मादक विषैले प्रभाव को दूर करने के लिये उसके ठीक विरोधी कार्य करने वाली एक नई औषध नॅलोर्फीन हाइड्रोक्लोराइड् (Nalorphine Hydrochloride) ५-१० मि० ग्रा० की मात्रा में शिरा द्वारा दी जाती है। लेथिड्रोन (Lethidrone, Burr. & Well.) एवं नेल्लाइन हाइड्रोक्लोराइड् (Nalline hydrochloride, Merck) नाम से यह डाक्टरी दुकानों में मिलती है। बच्चों में ०.२५ मि० ग्रा० हर दो मिनट पर कई बार दी जाती है। अन्य औषधों में चन्द्रोदय, कस्तूरी, जुन्दबेदस्तर, हींग, जद्दार या जहरमोहरा पिष्टी आदि को शहद के साथ बार-बार चटाना चाहिये। (३) रोगी को सोने न दें। बार-बार उस पर ठंडा एवं गरम जल छिड़कते रहें। रोगी को पकड़कर चलावें। तीक्ष्ण नस्य, सरसों का लेप, बार-बार हिलाना आदि क्रियाओं से रोगी को जगावें। **अफीम के व्यसन के दुष्परिणाम—**कुछ दिन लगातार अफीम खाने से उसकी आदत पड़ जाती है तथा उससे लाभ होने के लिये प्रत्येक समय मात्रा भी बढ़ानी पड़ती है। अफीमची २ १/२-१ रत्ती तक बिना किसी तीव्र दुष्परिणाम के अफीम का सेवन कर सकता है। इसके व्यसन से नैतिकपतन, कृशता, पाण्डु, मांसपेशियों की दुर्बलता, मांसपेशियों