भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४४ भावप्रकाशनिघण्टुः के कार्य में असमन्वयता, थकावट, नाड़ी की दुर्बलता, कंप, अग्निमांद्य, पाचन की खराबी, विबंध, निद्रानाश, तन्द्रा, नपुंसकता, अनार्तव एवं आँखों की पुतलियों का संकुचित होना आदि लक्षण होते हैं। लेकिन यदि अफीमची की अफीम बंद कर दी जाय तो भी मानसिक उत्तेजना, बेचैनी, आमाशय में पीड़ा, जलन एवं कभी-कभी वमन, विरेचन, स्वेदाधिक्य, पुरुषों में वीर्यपात और स्त्रियों में प्रहर्ष आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। एकाएक बंद करने से दुर्बल या वृद्ध लोगों में कभी- कभी अत्यन्त दौर्बल्य, अवसाद एवं निपात होकर मृत्यु भी हो सकती है। अफीम छुड़ाने के उपाय-बच्चों में या जो दिन भर में २ १/२ रत्ती से कम अफीम सेवन करते हैं या जो दुर्बल एवं वृद्ध नहीं है तथा किसी तीव्र शारीरिक रोग से पीड़ित नहीं है उनमें एकाएक अफीम बंद की जा सकती है। ३ दिन तक तकलीफ रहती है लेकिन बाद में ठीक हो जाती है। यदि हल्लास, अतिसार एवं मानसिक प्रक्षोभ आदि लक्षण हों तो क्षारीय मिश्रण तथा शामक औषधों का प्रयोग करना चाहिये। निपात आदि के लिये ॲड्रिनॅलीन का सूचिकाभरण तथा चाय, कोको एवं अमोनिया आदि का प्रयोग करें। सबसे सरल उपाय यह है कि धीरे-धीरे अफीम की मात्रा कम की जाय। कुचला, चिरायता एवं मिरिच आदि के साथ अफीम की गोलियाँ बनाकर उसका उपयोग करें। गोलियों में धीरे-धीरे अफीम कम करें। आहार में लेसिथिन नामक प्रभूजिन का उपयोग भी लाभदायक है। यह अंडे तथा सोयाबीन आदि में होता है। अल्प मात्रा में मद्य एवं कुछ शामक औषधों का उपयोग भी किया जा सकता है। मात्रा-अफीम १/४-१ रत्ती टिंक्चर ओपिआइ ५-३० बूँद, एक साल से कम उम्र के बच्चों को १/२-१ बूँद से अधिक नहीं। अथ खाखसतिलाः । तेषां नाम गुणाँश्चाह उच्यन्ते खसबीजानि ते खाखसतिला अपि ।।२३९।। खसबीजानि बल्यानि वृष्याणि सुगुरूणि च। जनयन्ति कफं तानि शमयन्ति समीरणम् ।।२४०।। खसखस के दाने के नाम तथा गुण-पोस्ता के दाने के ही खसबीज तथा खाखसतिल ये दोनों नाम संस्कृत में होते हैं। खसखस के दाने-बलकारक, वृष्य (वीर्यवर्धक) और अत्यन्त गुरुपाकी होते हैं तथा ये कफ के उत्पन्न करने वाले एवं वायु को शमन करने वाले होते हैं। [२३९-२४०] ८५. पोस्तादाना हिं०-पोस्तादाना, दाना, खसखस के दाने, खसबीज। बं०-पोस्तदाना, पोस्तबीज। म०-गु०-खसखस। ता०-गशगश। मला०-कशकश। फा०-तुख्मे कोकनार। अ०-बजरुल् खश्खाश। अं०-Poppy Seeds (पॉपी सोड्स)। उक्त पोस्तवृक्ष के डोंडे से निकले हुये बीज को पोस्तदाना कहते हैं। इसके स्वरूपादि का वर्णन पोस्ते को डोंडी के साथ किया गया है। रासायनिक संगठन-इसमें एक प्रकार का अप्रक्षोभक तैल पाया जाता है। इसमें कोई क्षाराभ नहीं पाया जाता। गुण और प्रयोग-अफीम की जानकारी के पूर्व इन बीजों का व्यवहार आहार द्रव्य के रूप में किया जाता था। यह स्नेहन, निद्राजनक, पोषक तथा साधारण ग्राही होतें हैं। मिठाइयों के ऊपर इसको छिड़का जाता है। इसका हलवा बनाकर खाया जाता है। निद्रानाश, दौर्बल्य, शुष्क कास एवं बस्ति विकार आदि में इसको पीसकर शर्करा या मधु के साथ खिलाया जाता है। इसका बाह्यलेप वेदनाहर माना जाता है।