भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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हरीतक्यादिवर्गः ३४५ इसके तैल का ऑलिव्ह आईल की तरह १/४-१/२ तोला की मात्रा में प्रयोग करते हैं। यह निद्राजनक है एवं शिरःशूल में इसको सिर पर लगाते हैं तथा कर्णशूल में इसे कान में डालते हैं। अथ सैन्धवः । तस्य नामगुणानाह सैन्धवोऽस्त्री शीतशिवं मणिमन्थञ्च सिन्धुजम् । सैन्धवं लवणं स्वादु दीपनं पाचनं लघु । स्निग्धं रुच्यं हिमं वृष्यं सूक्ष्मं नेत्र्यं त्रिदोषहत् ।। २४१ ।। सेंधानमक के नाम तथा गुण-सैन्धव (यह पुल्लिंग तथा नपुंसकलिंग में होता है), शीतशिव, मणिमन्थ और सिन्धुज ये संस्कृत नाम सेंधा नमक के हैं। सेंधानमक-स्वादिष्ट, अग्निदीपक, पाचक, लघु, स्निग्ध, रुचिकारक, शीतवीर्य, वृष्य, सूक्ष्म (सूक्ष्म स्रोतों में भी प्रवेश करके प्रभाव दिखाने वाला), नेत्रों के लिये हितकारी तथा तीनों दोषों को दूर करने वाला होता है। [२४१] ८६. सेंधानमक हिं०-सेंधानमक, सेंधानोन, लाहौरीनमक । बं०-सैंधवलवण। म०-सैंधवमीठ । गु०-सिंधालुण । क०- सैंधव, सैंधवलवण । मा०-सीधोलूण । ते०-सैंधवलवणं, सिंधु उपु । पं०-सेंधानमक । ता०-इन्दु उप्पु । फा०- नमकेसंग । अ०-मिलहे तवजर्द । अं०-Chloride of Sodium (क्लोराइड् ऑफ सोडियम्); Rock-salt (रॉक्साल्ट); Bay salt (बे साल्ट) । ले०-Sodii chloridum (सोडिआइ क्लोराइड्म्) । सेंधानमक एक सुप्रसिद्ध नमक सिन्ध देश की खानों से निकलता है। पत्थर के ढोंके के समान इसके बड़े-बड़े टुकड़े आते हैं। यह सब प्रकार के नमकों में शुद्ध नमक समझा जाता है। सिन्धु नदी के पूर्व में होने वाला नमक कुछ लाल रंग का होता है। इसमें पोटैशियम् तथा मॅग्नेशियम् के कुछ लवण मिले रहते हैं। इन खानों में ऊपर का स्तर कुछ मटमैला होता है लेकिन नीचे का स्तर शुद्ध होता हैं। इस नमक को 'लाहोरी' नमक कहते हैं। सिन्धु नदी के पश्चिम की खानों में नमक के स्तर के ऊपर गोदन्ती का एक स्तर रहता है। इसमें पोटेशियम् तथा मॅग्नेशियम् के लवण नहीं होते। इस नमक को 'कोहटी' या 'निमक सब्ज' कहते हैं। खानों से प्राप्त होने वाला एक और स्फटिक के समान पारदर्शक नमक होता है जिसे 'निमक शीश' (रसार्णव-मणिमंथ) और (अं) सल्जेम् (Salgem) कहते हैं। उत्पत्ति-स्थानभेद से नमक की कई जातियाँ होती हैं लेकिन सबों में खाने का नमक रहता है। अन्य अशुद्धियों के कारण उनमें स्वाद, स्वरूप तथा गुणों में अंतर रहता है। सभी नमकों का मूल स्रोत समुद्र ही है। जहाँ आज पहाड़ हैं वहाँ भी किसी जमाने में समुद्र था और वहाँ का हिस्सा समुद्र से अलग होने से वहाँ का जल सूखकर नमक जम गया। कालान्तर से उस पर मिट्टी आदि जमती गई तथा यह पृथ्वी के अंदर नमक की खानों के रूप में रह गया। भारत में खाने का नमक तीन प्रकार से प्राप्त होता है- (१) समुद्र के जल को सूर्य की उष्णता से या उबालकर जो नमक तैयार किया जाता है उसे 'समुद्र' कहते हैं। (२) खारे तालाब, खारे झरने तथा खारे कुओं का जल या खारी मिट्टी पानी में घोलकर उस घोल को उबाल कर या धूप में सुखाकर तैयार करते हैं। (३) पृथ्वी के अन्दर रहने वाली नमक की खानों से प्राप्त जिसे सैंधव कहते हैं। बंबई तथा मद्रास का समुद्र किनारा, पंजाब का पहाड़ी नमक, राजपूताना की झीलें तथा विभिन्न स्थानों की रेह इनसे बहुत नमक प्राप्त होता है लेकिन सबसे अच्छा नमक सैंधव होता है। यद्यपि भारतवर्ष में नमक बहुत पाया जाता है तथा और अधिक बनाया भी जा सकता है तो भी ब्रिटिशकाल में सरकारी नियंत्रण के कारण विदेशों से भी नमक का आयात होता था।