भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३४७ कुछ ऊँचा करके रबर की नली द्वारा हर चार घण्टे पर दिया जाता है। घोल की उष्णता शरीर की उष्णता के बराबर या कुछ अधिक होनी चाहिये। (२) डॉ० ब्रुक मलेरिया के लिये एक प्रयोग लिखते हैं। एक मुट्ठीभर नमक को कढ़ाई में डालकर मन्द आँच पर कुछ बादामी रंग होने तक भूनते हैं। इसमें से १ तो० नमक जल के साथ सुबह खाली पेट रोगी को दिया जाता है। इसके पश्चात् प्यास बहुत लगे तो थोड़ा-थोड़ा जल पीने को दें। २, ३ घण्टे तक खाने को कुछ भी न दें। बाद में बहुत भूख लगने पर हलका पौष्टिक आहार दें। रोगी को ठण्डक से बच कर रहना चाहिये। डॉ० ब्रुक का कहना है कि इसके एक ही बार के प्रयोग से मलेरिया दूर हो जाता है या कभी-कभी दो बार प्रयोग करना पड़ सकता है। (३) व्रण, नाड़ीव्रण एवं दूषित क्षत आदि के प्रक्षालन के लिये परमबल लवणजल का प्रयोग किया जाता है तथा विरल कपड़े (गॉज) की पट्टी इस घोल में भिगो कर व्रण पर रखी जाती है। इससे व्रणित भाग में लसिकास्राव एवं श्वेतकणों की वृद्धि होकर व्रण शुद्ध होकर जल्दी अच्छा होता है। इस चिकित्सा में अन्य प्रतिदूषकों (Antiseptics) की तरह शरीर की कोषाओं को कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचता। (४) श्वसनक ज्वर (न्युमोनिया) में नमक की पोटली बना कर उससे छाती को सेंका जाता है जिससे कफ ढीला होकर निकलता है तथा वेदना शांत होती है। इसका आंतरिक प्रयोग ४ र० की मात्रा में जल के साथ किया जा सकता है। संधिवात, आमवात, गंडमाला एवं आमाशयिक पीड़ा आदि में भी पोटली से सेंकने से लाभ होता है। (५) इन्फ्लुएंजा, प्रतिश्याय एवं शिरःशूल तथा स्वास्थ्य वृद्धि के लिये १ तोला नमक १ सेर जल में डाल कर उसका नस्य बहुत लाभदायक है। (६) गले की खराबी में कदुष्ण जल में नमक डाल कर उससे गरारा करना चाहिये। गला एवं तालु की शिथिलता होने पर ठंडे पानी में नमक डाल कर कुल्ला कराने से लाभ होता है। (७) यदि गलती से जोंक गले के अन्दर चली जाय तो लवण जल पिलाते हैं। इसी प्रकार सिल्वर नाइट्रेट (Silver nitrate) नामक चाँदी के दाहक क्षार के विष को दूर करने के लिये इसको पिलाते हैं। (८) जीर्ण आमवात, गृध्रसी तथा अन्य पीड़ायुक्त संधि विकारों में एवं बिच्छू के काटने पर २०% उष्ण लवण जल में अवगाह किया जाता है तथा लवण जल पिलाते भी हैं। (९) सूत्रकृमि (Thread worm) में इसकी बस्ति दी जाती है। (१०) वमन कराने के लिये यह अत्युत्तम औषध है। अल्प मात्रा (२%) में देने से यदि वमन होता हो तो रुक जाता है। (११) मांसपेशियों की दुर्बलता में नमकयुक्त ठण्डे जल की धारा से बहुत लाभ होता है विशेषकर वर्धमान लड़कियों की पीठ की दुर्बलता में इसका अच्छा उपयोग होता है। करीब १५ सेर जल में १/२ सेर नमक डाल कर स्नान करने से रक्तप्रवाह बढ़ता है तथा स्फूर्ति मालूम होती है। मांसपेशियों की पीड़ा, चर्म रोग, मोच एवं मरोड़ आदि में भी स्नान से लाभ होता है। **निषेध—**किसी भी प्रकार के शोफ, जलोदर तथा अन्य रोग जिनमें शरीर के अन्दर द्रव पदार्थों का संचय होता है उनमें नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिये। रक्तभाराधिक्य, चर्मरोग एवं अत्यधिक प्यास आदि में भी इसका निषेध है। अधिक मात्रा में सिरा द्वारा लवणजल के प्रयोग से कभी-कभी इक्षुमेह (Glycosuria), साधारण ज्वर एवं क्वचित् मूत्र में ॲल्ब्यूमिन का निकलना आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। फुफ्फुस शोफ (Oedema of lungs) तथा हृदय अधिक भार सहन करने में असमर्थ हो तब सिरा द्वारा लवणजल का प्रयोग न करें नहीं तो मृत्यु की सम्भावना रहती है।