भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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३४८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ शाकम्भरीयम्। तस्य नामगुणानाह शाकम्भरीयं कथितं गडाख्यं रोमकं तथा।।२४२।। गडाख्यं लघु वातघ्नमत्युष्णं भेदिपित्तलम्। तीक्ष्णोष्णं¹ चापि सूक्ष्मञ्चाभिष्यन्दिकटुपाकि च।।२४३।। सांभर नमक के नाम तथा गुण—शाकम्भरीय के ही, गडाख्य (गडलवण) तथा रोमक पर्यायवाची शब्द हैं। सांभर नमक—लघु, वायुनाशक, अत्यन्त उष्णवीर्य, भेदी (मलादिक का भेदन करनेवाला), पित्तजनक, तीक्ष्णोष्णवीर्य, सूक्ष्म, अभिष्यन्दी तथा विपाक में कटुरस युक्त होता है। [२४२-२४३] ८७. साम्भरनमक हिं०—साम्हर नमक, साम्भरनोन, सांभर निमक। बं०—सांभरलुण, शाम्भारि लवण। म०—सांबर मीठ, सांभर लोण। गु०—बड़ागरूं मीठ, साम्भरमोह, सामरलून। क०—गाड़लबड, गाढ़ लवण। फा०—मिलहे अवकीर, नमक साम्भर। अ०—मलह उल् अवकर। राजपुताना की झीलों के जल को सुखा कर जो नमक प्राप्त किया जाता है वह सांभर नमक कहलाता है। राजपुताना में सांभर नामक एक २० मील लम्बी तथा ५ मील चौड़ी झील है। इसमें ४ नदियाँ बहती हैं। बरसात में उसमें पानी जमा होता है। गर्मी में जल सूख जाता है। इसके २० भाग नमक में १५ भाग खाने का नमक, १ भाग सर्जिका (सोडियम् कार्बोनेट) तथा ३ भाग खारोनोन (सोडियम् सल्फेट) तथा अल्प मात्रा में आयोडीन एवं सोरे के लवण रहते हैं। यहां के जल को क्यारियों में जमा करते हैं जिसके सूर्य की गरमी से सूखने से उसमें का नमक अलग हो जाता है। जल में अन्य अशुद्धिया हर जाती हैं जिसे फिर से झील में डाल देते हैं। नमकीन जल को सुखा कर बनाये हुए नमकों में यह सबसे अच्छा होता है। इसका स्वाद कुछ कटु होता है। गुण और प्रयोग—इसके गुण भी सेंधव की तरह होते हैं लेकिन वह उससे न्यून गुण वाला है। अथ सामुद्रं लवणं (पाङ्गा) तस्य नामगुणानाह सामुद्रं यत्तु लवणमक्षीवं वशिरञ्च तत्। समुद्रजं सागरजं लवणोदधिसम्भवम्।।२४४।। सामुद्रं मधुरं पाके सतिक्तं मधुरं गुरु। नात्युष्णं दीपनं भेदि सक्षारमविदाहि च।। श्लेष्मलं वातनुत्तीक्ष्ण ²मरूक्षं नातिशीतलम्।।२४५।। समुद्रनोन (पांगा) के नाम तथा गुण—समुद्रलवण के ही अक्षीव, वशिर, समुद्रज, सागरज और लवणोदधिसम्भव ये संस्कृत नाम हैं। समुद्र नमक—पाक में मधुररस युक्त, स्वाद में तिक्तरस मिश्रित मधुररस युक्त और गुरु होता है। यह अत्यन्त उष्णवीर्य नहीं होता है। यह दीपद, भेदी, क्षारगुण युक्त, अविदाही (दाह नहीं पैदा करने वाला), कफकारक, वातनाशक एवं तीक्ष्ण होता है। यह रूखा तथा अत्यन्त शीतल भी नहीं होता है। [२४४-२४५] ८८. समुद्रनमक हिं०—पांगनिमक, पंगानोन, समुद्रनिमक, समुद्रीनोन। बं०—पांगा। म०—मीठ। गु०—मीठु, दरियाइ लूण। ते०, ता०—उप्पु। फा०—नमक, नमक दरिया। अ०—मिलह शोरी, मलहे उल् मुहीत। अं०—Salt (साल्ट)। ले०—Sodii muras (सोडिआइ मुरास्)। १. 'तीक्ष्णं व्यवायी'ति पाठान्तरम्। २. 'तिक्तेति' पाठान्तरम्।