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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

३४८ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ शाकम्भरीयम्। तस्य नामगुणानाह शाकम्भरीयं कथितं गडाख्यं रोमकं तथा।।२४२।। गडाख्यं लघु वातघ्नमत्युष्णं भेदिपित्तलम्। तीक्ष्णोष्णं¹ चापि सूक्ष्मञ्चाभिष्यन्दिकटुपाकि च।।२४३।। सांभर नमक के नाम तथा गुण—शाकम्भरीय के ही, गडाख्य (गडलवण) तथा रोमक पर्यायवाची शब्द हैं। सांभर नमक—लघु, वायुनाशक, अत्यन्त उष्णवीर्य, भेदी (मलादिक का भेदन करनेवाला), पित्तजनक, तीक्ष्णोष्णवीर्य, सूक्ष्म, अभिष्यन्दी तथा विपाक में कटुरस युक्त होता है। [२४२-२४३] ८७. साम्भरनमक हिं०—साम्हर नमक, साम्भरनोन, सांभर निमक। बं०—सांभरलुण, शाम्भारि लवण। म०—सांबर मीठ, सांभर लोण। गु०—बड़ागरूं मीठ, साम्भरमोह, सामरलून। क०—गाड़लबड, गाढ़ लवण। फा०—मिलहे अवकीर, नमक साम्भर। अ०—मलह उल् अवकर। राजपुताना की झीलों के जल को सुखा कर जो नमक प्राप्त किया जाता है वह सांभर नमक कहलाता है। राजपुताना में सांभर नामक एक २० मील लम्बी तथा ५ मील चौड़ी झील है। इसमें ४ नदियाँ बहती हैं। बरसात में उसमें पानी जमा होता है। गर्मी में जल सूख जाता है। इसके २० भाग नमक में १५ भाग खाने का नमक, १ भाग सर्जिका (सोडियम् कार्बोनेट) तथा ३ भाग खारोनोन (सोडियम् सल्फेट) तथा अल्प मात्रा में आयोडीन एवं सोरे के लवण रहते हैं। यहां के जल को क्यारियों में जमा करते हैं जिसके सूर्य की गरमी से सूखने से उसमें का नमक अलग हो जाता है। जल में अन्य अशुद्धिया हर जाती हैं जिसे फिर से झील में डाल देते हैं। नमकीन जल को सुखा कर बनाये हुए नमकों में यह सबसे अच्छा होता है। इसका स्वाद कुछ कटु होता है। गुण और प्रयोग—इसके गुण भी सेंधव की तरह होते हैं लेकिन वह उससे न्यून गुण वाला है। अथ सामुद्रं लवणं (पाङ्गा) तस्य नामगुणानाह सामुद्रं यत्तु लवणमक्षीवं वशिरञ्च तत्। समुद्रजं सागरजं लवणोदधिसम्भवम्।।२४४।। सामुद्रं मधुरं पाके सतिक्तं मधुरं गुरु। नात्युष्णं दीपनं भेदि सक्षारमविदाहि च।। श्लेष्मलं वातनुत्तीक्ष्ण ²मरूक्षं नातिशीतलम्।।२४५।। समुद्रनोन (पांगा) के नाम तथा गुण—समुद्रलवण के ही अक्षीव, वशिर, समुद्रज, सागरज और लवणोदधिसम्भव ये संस्कृत नाम हैं। समुद्र नमक—पाक में मधुररस युक्त, स्वाद में तिक्तरस मिश्रित मधुररस युक्त और गुरु होता है। यह अत्यन्त उष्णवीर्य नहीं होता है। यह दीपद, भेदी, क्षारगुण युक्त, अविदाही (दाह नहीं पैदा करने वाला), कफकारक, वातनाशक एवं तीक्ष्ण होता है। यह रूखा तथा अत्यन्त शीतल भी नहीं होता है। [२४४-२४५] ८८. समुद्रनमक हिं०—पांगनिमक, पंगानोन, समुद्रनिमक, समुद्रीनोन। बं०—पांगा। म०—मीठ। गु०—मीठु, दरियाइ लूण। ते०, ता०—उप्पु। फा०—नमक, नमक दरिया। अ०—मिलह शोरी, मलहे उल् मुहीत। अं०—Salt (साल्ट)। ले०—Sodii muras (सोडिआइ मुरास्)। १. 'तीक्ष्णं व्यवायी'ति पाठान्तरम्। २. 'तिक्तेति' पाठान्तरम्।

हरीतक्यादिवर्गः ३४९ समुद्र के खारे पानी से बनाये हुए नमक को समुद्र नमक कहते हैं। भारत में आवश्यक नमक का ३७% भाग बंबई के समुद्री तट से निर्मित होता है। नमक निकालने के लिये विभिन्न देशों में हवा की उष्णता के अनुसार विभिन्न पद्धतियाँ काम में लाई जाती हैं। समुद्र के किनारे पर छोटे-छोटे गढ़े बनाते हैं जिसमें समुद्र का जल धीरे-धीरे भरता है। सूर्य की गरमी से उसमें का जलीय अंश सूखने लगता है। १०० भाग जल में ३७ भाग नमक घुलता है। नमक को घुलने के लिये जितने जल की आवश्यकता होती है उससे कम जल जब सूख कर रह जाता है तब उसमें का नमक अलग होकर नीचे जमने लगता है। जैसे-जैसे नमक जमता है वैसे-वैसे उसे निकल कर जमा करते जाते हैं। उस नमक की राशि में से मॅग्नेश्यिम् क्लोराइड् (Magnesium chloride) निस्यंदित होकर निकल जाता है। समुद्री जल में खाने के नमक के साथ पोटाश्यिम् क्लोराइड (Potassium chloride), मॅग्नेश्यिम् क्लोराइड् (Magnesium chloride), मॅग्नेश्यिम् सल्फेट् (Magnesium sulphate) एवं कॅल्शियम सल्फेट् (Calcium sulphate) आदि द्रव्य रहते हैं जो खाने के नमक निकालने के बाद उस जल में रह जाते हैं। इस कड़वे जल में से इन पदार्थों को विभिन्न पद्धतियों से अलग कर लेते हैं। बाजारू समुद्री नमक कुछ आर्द्र रहता है उसका कारण यह है कि उसमें मॅग्नेश्यम् एवं कॅल्शियम क्लोराइड्स के कुछ अंश रह जाते हैं। शुद्ध नमक आर्द्र नहीं होता तथा इसका १ भाग २ ३/४ भाग जल में घुल जाता है। गुण और प्रयोग-सामुद्र लवण के गुण सैंधव के समान होते हुवे भी इसमें जो अन्य पदार्थ रहते हैं उनके कारण कुछ अंतर पड़ता है। (१) समुद्र में स्नान करने से जो चुनचुनाइट होती है उसके कारण शरीर का रक्त प्रवाह बढ़ जाता है तथा उससे शरीर में स्फूर्ति मालूम पड़ती है। (२) समुद्री जल का मांसपेश्यन्तर्गत सूचिकाभरण अजीर्ण, शोथ, जीर्ण चर्मविकार तथा बच्चों के पाचनसंस्थान के विकारों में लाभदायक माना जाता है। (३) समुद्री नमक में आयोडिन (Iodine) रहने के कारण गलगण्ड (Goitre) के प्रतिबंधन की दृष्टि से इसका उपयोग लाभदायक माना जाता है। (४) पाण्डु, आमाशयिक व्रण, प्रतिश्याय वातनाड़ीशोथ, नाड्यवसन्नता एवं पचनसंस्थान की दुर्बलता में समुद्री जल का उपयोग रोगनाशकरूप में किया जाता है। फ्रांस में बच्चों की जीवनी शक्ति (Vitality) बढ़ाने के लिये इसका प्रयोग करते हैं। अथ बिडलवणम् (बिरियासंचर)। तस्य नामगुणानाह बिडं पाक्यञ्च कृतकं तथा द्राविडमासुरम्। बिडं सक्षारमूर्ध्वाध कफवातानुलोमनम् ।।२४६।। बिरिया संचर नमक के नाम तथा गुण-विड, पाक्य, कृतक, द्राविड तथा आसुर ये सब बिरिया संचर नमक के संस्कृत नाम हैं। बिरिया संचर नमक-क्षार गुण युक्त (विकृत त्वचा मांसादिकों को गला कर दूर करने वाला) होता है तथा ऊपर (मुखादि) के मार्ग से कफ एवम् नीचे (गुदादि) के मार्ग से वायु का अनुलोमन करने वाला अर्थात् कफ को मुखादि से निकालने वाला और अपान वायु को अधोगामी करने वाला होता है ।।२४६] ❖ ऊर्ध्व कफमधो वातं सञ्चारयेदित्यर्थः ।।२४६।। यहाँ पर 'ऊर्ध्वाधःकफवातानुलोमनम्' का-'ऊपर मुखादि की ओर कफ को एवं नीचे गुदादि की ओर अपान वायु को संचारित करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये । [२४६] दीपनं लघु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं रुच्यं व्यवायि च। विबन्धानाहविष्टम्भहृद्गौरवशूलनुत् ।।२४७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

३५० भावप्रकाशनिघण्टुः बिरिया संचर नमक-अग्निदीपक, लघु (शीघ्र पच जाने वाला) तीक्ष्ण तथा उष्ण वीर्य, रूक्ष, रुचिकारक, व्यवायि (परिपक्व होने के पहले ही शरीर में प्रभाव दिखाने वाला), विबन्ध, आनाह, विष्टम्भ, हृद्रोग, शरीर की गुरुता तथा शूल को नष्ट करने वाला भी होता है। [२४७] ८९. बिरिया संचर नमक हिं०-बिरिया (आ) नमक, बिरिया संचर नमक, बिरिया सोंचर नमक, कटीला नमक, कालानमक। बं०- विटनुन। म०-पादेलोण, विडलोण। गु०-विड लवण। विडलवण क्या है इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। श्रीयुत् द० अ० कुलकर्णी जी ने अपनी रसरत्नसमुच्चय की टीका में इसका स्पष्टीकरण किया है। जो क्षार, अम्ल, गंधक तथा नमक आदि पदार्थ पारद में दिये हुवे ग्रास को जीर्ण करने के लिये प्रयुक्त होते थे उन्हें विड कहा जाता था। बाद में इस शब्द का प्रयोग अन्य धातुओं को पारद में जीर्ण कराने के लिये एवं भिन्न-भिन्न धातुओं के शोधन अथवा द्रावण के लिये प्रयुक्त द्रव्यों के लिये किया जाने लगा। इसके पश्चात् रसशास्त्र की अवनति के काल में उपर्युक्त दोनों अर्थ भूल गये और बिड का प्रयोग नमक के साथ करके बिडनमक के रूप में कालानमक के लिये आजकल किया जा रहा है। यह कालानमक मनुष्य के खाये हुवे ग्रास अथवा गुरु भोजन को जीर्ण अथवा हजम कराने में समर्थ होने के कारण विडनमक या कालानमक यह अर्थ ही अब व्यवहार में विशेष रूढ़ हो गया है। सुश्रुत की टीका में डल्हण लिखते हैं कि 'कृत्रिमं स्वनाम्ना ख्यातं, तच्च प्रसारिणी कल्कभक्तलवणसंयोगादग्निदाहेन निवृत्तम्' अर्थात् प्रसारिणी का कल्क, भात तथा नमक आदि को जलाकर बनाया हुआ नमक। गुजरात की ओर उपर्युक्त चीजों को गढ़े में डालकर जलाते हैं तथा १०, १५ दिन बाद उसमें से नमक के ढेले निकाल कर व्यवहार करते हैं। कुछ लोगों ने सौवर्चल लवण को कालानमक लिखा है। आजकल विडलवण नाम से जिस काले नमक का व्यवहार किया जाता है उसके बनाने की निम्नलिखित विधि है। यह हिसार जिले में भिवानी नामक ग्राम में अधिक बनाया जाता है। १ मन सेंधानमक तथा हर्रा, आँवला तथा सज्जीखार (व्यापार का सोडियम् कार्बोनेट) प्रत्येक आधा सेर लेकर सब चीजों को कूट कर एवं मिलाकर मिट्टी की हाँड़ियों में पकाते हैं। जब सब चीजें गलकर एक हो जाती हैं तब आँच को बन्द करके ठंडा होने पर नमक के ढोकों को निकाल लिया जाता है। एक अन्य विधि यह है कि २८ सेर सांभर नमक तथा ५० तो० आँवला चूर्ण को मिला कर उसका चतुर्थांश एक सँकरे मुँह को हाँड़ी में रखकर गरम करें तथा लाल होने पर बाकी चूर्ण में से थोड़ा-थोड़ा उस हाँड़ी में डालते जायँ। करीब ६ घण्टे पश्चात् २४ सेर के लगभग काला नमक तैयार हो जावेगा। यह काला नमक गहरे लाल काले से चमकीले रंग का, नमकीन एवं विशिष्ट गंधयुक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रधानतया (९५%) खाने का नमक तथा अत्यल्प मात्रा में खारी नोंन (Sodium Sulphate-सोडियम् सल्फेट), ॲल्यूमिना, मॅग्नेशिया, फेरिक् ऑक्साइड् एवं आयर्न सल्फाइड् आदि पदार्थ पाये जाते हैं। इसकी गन्ध इसके आयर्न सल्फाइड् के कारण रहती है लेकिन इसमें यह बहुत अल्प (१०० में १ से कम) मात्रा में रहता है। गुण और प्रयोग-यह अग्निदीपक, वातानुलोमक, विरेचक एवं बल्य है। इसका प्रयोग प्लीहावृद्धि, यकृत विकार, आध्मान, शूल, अपचन एवं अन्य आंत्रिक विकारों में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः ३५१ अथ सौवर्चलं लवणम् । तस्य नामगुणानाह सौवर्चलं स्याद् रुचकं मन्थपाकञ्च तन्मतम्¹। रुचकं रोचनं भेदि दीपनं पाचनं परम् ।।२४८।। सस्नेहं वातनुन्नातिपित्तलं विशदं लघु। उद्गारशुद्धिदं सूक्ष्मं विबन्धानाहशूलजित् ।।२४९।। काला नमक के नाम तथा गुण-सौवर्चल, रुचक और मन्थपाक ये सब काला नमक के संस्कृत नाम हैं। कालानमक-रोचक, भेदक, अग्निदीपक, अत्यन्त पाचक, स्नेहयुक्त, वातनाशक एवम् अत्यन्त पित्तजनक नहीं होता है। तथा यह विशद गुण युक्त, हलका, उद्गार (डकार) को शुद्ध करने वाला, सूक्ष्म (सूक्ष्म स्रोतोगामी), विबन्ध, आनाह तथा शूल का नाश करने वाला है। [२४८-२४९] ९०. सोंचर नमक हिं०-कालानमक, सोंचर नमक, चौहार कोड़ा, चोहार कोरानोन, चौहार कारा, चौहार काला। बं०-संचल लवण। म०-सोनचक मीठ। गु०-संचल। क०-चौवर्चल। ते०-नालु उपु। फा०-नमक सिया, नमक स्याह। यू०-नमक काला। अ०-माला अस्वद, मलह अस्वद। अं०-Black Salt (ब्लॅक साल्ट), Sochal Salt (सोचल साल्ट)। ले०-Unaqua Sodium Chloride (अनकुआ सोडियम् क्लोराइड)। जिस प्रकार विडलवण के सम्बन्ध में मतभेद है उसी तरह सौवर्चल लवण के सम्बन्ध में भी मतभेद है। कुछ लोगों ने इसे काललवण लिखा है। कुछ लोगों ने यह लिखा है कि जो सौवर्चल निर्गन्ध होता है वह काललवण है तथा वह दक्षिण समुद्र के समीप बनता है। डॉ० देसाई लिखते हैं 'रसग्रन्थों में सौवर्चल नाम शोरे को दिया गया है। सु = सुष्ठु, वर्चः = दिप्ति, अल् = प्राप्ति, सर्वथा अलति अनेन इति सौवर्चलं = जिसके कारण भली प्रकार प्रकाश पड़ता है अर्थात् 'वह्न्युत्तेजक'। श्रीयुत् द० अ० कुलकर्णीजी लिखते हैं 'जिस मिट्टी से शोरा प्राप्त किया जाता है उसे लुनिया मिट्टी कहते हैं तथा उस मिट्टी में कुछ खाने का नमक भी रहता है जिसे अलग कर लिया जाता है। ऐसे नमक में कुछ शोरे का अंश रहता है। शोरे के साथ-साथ पैदा होने के कारण तथा शोरे की कुछ मात्रा इसमें रहने के कारण इसको सोंचर अथवा सोवर्चल कहते हैं। सोंचर नमक बनाने की निम्नलिखित विधि प्रचलित है-सज्जी माटी को जल में घोल दिया जाता है फिर उसमें थोड़ा-थोड़ा खाने का नमक डालते जाते हैं और जितना घुलता है उतना घुलने देते हैं। फिर इस घोल को छानकर अग्नि से सुखाते हैं। यह कुछ गहरे रङ्ग का होता है। रासायनिक संगठन-इसमें खाने का नमक, खारी नोन (सोडा सल्फ) एवं सज्जीखार (कॉस्टिक सोडा) रहता है लेकिन सोडियम् कार्बोनेट नहीं रहता। गुण और प्रयोग-इसका उपयोग विड लवण के स्थान पर भी किया जाता है। यह अग्निदीपक, पाचक एवं विरेचक होता है। इसका उपयोग शूल, गुल्म, आन्त्रकृमि एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती। अथ खानिजं लवणम् । तस्य नामगुणानाह औद्भिदं पांशुलवणं यज्जातं भूमितः स्वयम् । क्षारं गुरु कटु स्निग्धं शीतलं वातनाशनम् ।। २५० ।। खानिज लवण अर्थात् रेहगवा नोन के नाम, उत्पत्ति तथा गुण-औद्भिद तथा पांशुलवण ये दो नाम संस्कृत में उस नमक का है जो कि जमीन से स्वयम् उत्पन्न होता है। रेहगवा नोन-क्षार गुणयुक्त गुरु, कटुरसयुक्त, स्निग्ध, शीतल और वातनाशक होता है। [२५०] १. 'अक्षपाकं च धातुमत्' इति पाठा० ।

३५२ भावप्रकाशनिघण्टुः ९१. रेह का नमक हिं०-रेहगवा नोन, रेह का नमक, मटिया नोन, शोरा नोन। बं०-फूला लवण। जांगल देश की खारी भूमि में रेह उत्पन्न होती है। उत्तर प्रदेश, पञ्जाब, बिहार एवं बंगाल आदि प्रान्तों की ऊसर जमीन में भी रेह होती है। उसी रेह से बना हुआ नमक रेहगवा नोन कहलाता है। जिस प्रकार की मिट्टी होगी उसी प्रकार का नमक प्राप्त होता है। जिस मिट्टी से शोरा अलग किया जाता है उससे प्राप्त नमक में शोरे का अंश रहता है। ऐसे नमक को कुछ लोग सौवर्चल लवण मानते हैं। तथा सज्जी मिट्टी से प्राप्त नमक में सज्जीखार की कुछ मात्रा रहती है। इसे वे औद्भिद लवण या रेहगवा नोन मानते हैं। कुछ भी हो जो ऊसर मिट्टी से नमक निकाला जाता है उसे रेहगवा नोन कहा जाता है। यह नमक कुछ तीता, कड़वा एवं क्षारीय होता है। रासायनिक संगठन-इस नमक में काफी मात्रा में खारी नोन (सोडा सल्फ) तथा अल्प मात्रा में सोडियम् कार्बोनेट एवं मॅग्नेशियम् सल्फेट रहते हैं। गुण और प्रयोग-रोचक, दीपन एवं पाचन गुण के कारण सभी पाचन योगों में इसका व्यवहार किया जाता है। सामान्य मात्रा में मूत्रल भी होता है। योगों के अतिरिक्त स्वतन्त्र रूप में लवणों का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। वमन कराने के लिए प्रायः सैन्धव ही प्रयुक्त होता है। मात्रा-४ रत्ती से १ माशा। नोट-उपर्युक्त लवणों के अतिरिक्त चरक (वि० अ० ८) के लवण स्कन्ध में एवं सुश्रुत (सू० अ० ४६) में इतर विशिष्ट लवणों का उल्लेख किया गया है। अथ चणकाम्लकम्। तस्य गुणानाह चणकाम्लकमत्युष्णं दीपनं दन्तहर्षणम्। लवणानुरसं रुच्यं शूलाजीर्णविबन्धनुत् ।। २५१ ।। चनाखार के नाम तथा गुण-चनाखार को संस्कृत में चणकाम्ल कहते हैं। चणकाम्ल-अत्यन्त उष्णवीर्य, अग्निदीपक, दन्तहर्षण (दन्तहर्ष अर्थात् दाँतों में खट्टापन लग जाने से चबाने में असमर्थ कर देने वाला), कुछ लवण रस युक्त, रुचिकारक, शूल, अजीर्ण तथा विबन्ध को दूर करने वाला होता है। [२५१] ९२. चनाखार हिं०-चने का खारा, चनाखार, चनक लोनी, चने का सिरका। म०-हरभरयाची आँव। गु०-चणा नो खार। मार्गशीर्ष के महीने में जब चने के क्षुप लवण युक्त हो जाते हैं तब मलमल का सफेद कपड़ा लेकर प्रतिदिन प्रातःकाल उक्त क्षुपों पर फिर, उन पर पड़े हुए ओस की बूँदों से उसको तर कर सुखा दे। इस प्रकार एक मास करके उस कपड़े को पानी में खूब मलकर उसका अम्ल पदार्थ निकाल लें। फिर उस पानी को ५-७ घण्टे स्थिर छोड़ कर उसका पानी निथार लें। नीचे जमे हुए पदार्थ को सुखा लें और पानी को अग्नि पर औंटा कर उसको भी सुखा लें। फिर दोनों को एक में मिला कर सुरक्षित रख दें। उपर्युक्त विधि के अतिरिक्त केवल रात में या सुबह मलमल का कपड़ा चने के क्षुपों पर डाल कर सुबह उसको निचोड़ लेते हैं। जो द्रव प्राप्त होता है उसे उसी द्रव रूप में या सुखा कर काम में लाया जाता है। कुछ लोग क्षार-निर्माण विधि की तरह चने का क्षुप जलाकर उससे क्षार निकालते हैं वह गलत है क्योंकि उसमें तो केवल क्षार (पोटैशियम् कार्बोनेट) ही रहता है। यहाँ जो गुण दिये गये हैं वे अम्ल के हैं। इसलिये ऊपर दी हुई विधि से ही इसे बनाना चाहिये न कि क्षार रूप में। रासायनिक संगठन-यद्यपि इसे चनाखार लिखा गया है लेकिन इसमें अम्ल द्रव्य होते हैं। इसमें ऑक्झॅलिक् (Oxalic), मॅलिक् (Malic) एवं अॅसेटिकू (Acetic) आदि अम्ल पाये जाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः ३५३ गुण और प्रयोग-चणकाम्ल का उपयोग उदरशूल, अजीर्ण, बच्चों के आमातिसार, अग्निमांद्य, विबन्ध तथा कष्टार्तव में किया जाता है। इसको जल में मिला कर लू लगने पर तथा ज्वर में देने से तृषा, दाह एवं सन्ताप कम होता है। अजीर्ण में इसको सिरका के साथ मिला कर पिलाते हैं। लौंग तथा मिश्री के साथ इसको जल में मिलाकर हैजे में देने से लाभ होता है। मधुमेह एवं पथरी में इसका प्रयोग हानिकारक है। मात्रा-१-२ रत्ती या ५-१० बूंद। अथ यवक्षारः स्वर्जिका सुवर्चिका च । तन्नामगुणानाह पाक्यं क्षारो यवक्षारो यावशूको यवाग्रजः । स्वर्जिकाऽपि स्मृतः क्षारः कापोतः सुखवर्चकः ।। २५२ ।। कथितः स्वर्जिकाभेदो विशेषज्ञैः सुवर्चिका । यवक्षारो लघुः स्निग्धः सुसूक्ष्मो वह्निदीपनः ।। २५३ ।। निहन्ति शूलवातामश्लेष्मश्वासगलामयान् । पाण्ड्वर्शोग्रहणीगुल्मानाहप्लीहहृदामयान् ।। २५४।। स्वर्जिकाऽल्पगुणा तस्माद्विज्ञेया गुल्मशूलहृत् । सुवर्चिका स्वजिकावद् बोद्धव्या गुणतो जनैः ।। २५५ ।। जवाखार, सज्जी तथा सोरा के नाम और गुण-पाक्य, क्षार, यवक्षार, यावशूक और यवाग्रज ये सब जवाखार के संस्कृत नाम हैं। स्वर्जिका, क्षार, कापोत और सुखवर्चक ये सब सज्जी के संस्कृत नाम हैं। जवाखार की भाँति इसका भी संस्कृत में क्षार नाम है। द्रव्यों की विशेषताओं के ज्ञाता वैद्य जन सोरा को सज्जी का ही भेद बतलाते हैं। इसे संस्कृत में सुवर्चिका कहते हैं। जवाखार-लघु, स्निग्ध, अत्यन्त सूक्ष्म (सूक्ष्म स्रोतोगामी) तथा अग्निदीपक होता है एवम् यह शूल, वायु, आम, कफ, श्वास, गलरोग, पाण्डुरोग, बवासीर, संग्रहणी, गुल्म, आनाह, प्लीहा और हृद्रोग का नाश करता है। सज्जी-इसे जवाखार की अपेक्षा न्यून गुणवाली तथा विशेष करके गुल्म तथा शूल को दूर करने वाली समझना चाहिये। सुवर्चिका-(सोरा) इसे लोग गुणों में सज्जी के समान ही समझें, ऐसा वैद्यों का मत है। [२५२-२५५] ९३. जवाखार हिं०-जवाखार, जवखार। बं०-यवक्षार। म०-झाडाचे मीठ, जवाखार। गु०-जवाखार, खारो। ता०- मरवप्पु। ते०-मानुवप्पु। मल०-कारम्। क०-मरदउप्पु। अं०-Impure carbonate of potash (इम्प्योअर कार्बनेट ऑफ पोटॅश्)। ले०-Potasii carbonas (पोटॅसाइ कार्बोनस्)। जब यव क्षुपों पर बाल निकलने वाले हों तब पञ्चांग को संग्रह कर सुखा दें। और सुखाने पर आग लगा कर राख बना उसको २४ घंटे आठगुने पानी में भिगो दें। यदि पञ्चांग जलाने के बाद उसकी राख काली रहे तो जल में डालने के पूर्व उसे कढ़ाई में डाल कर राख सफेद होने तक पकाना चाहिए। फिर ऊपर का स्वच्छ जल निथार लें अथवा फिल्टर से पानी को छान लें। उस स्वच्छ जल को किसी कलईदार कड़ाही में अग्नि पर पकावें। पानी सूखने पर कड़ाही में जमे हुए क्षार को खुरच कर सुरक्षित रखें। इसी को जवाखार कहते हैं। यवक्षार नाम से औषध में उपर्युक्त विधि से तैयार किये हुए क्षार का व्यवहार करना चाहिये। इस क्षार में अधिकांश मात्रा पोटैशियम् कार्बोनेट (Potassium carbonate) की रहती है तथा कुछ अन्य पदार्थ भी रहते हैं। इसी प्रकार अधिकांश वृक्षों की राख में पोटैशियम् कार्बोनेट रहता है। तथा उनके अन्दर रहने वाले अन्य विभिन्न पदार्थों के कारण विभिन्न क्षारों के गुणों में अन्तर पाया जाता है। काष्ठमय झाड़ियों की अपेक्षा रसयुक्त वर्षायु क्षुपों में यह अधिक पाया जाता है। व्यापार की दृष्टि से पोटैशियम् कार्बोनेट्, आर्टिमिसिआ या वर्मवुड् (Artemisia; Wormwod) नामक वृक्षों से, वीट-रूट् (Beet-root) से, भेंड़ के बालों को धो कर उस घोल से, सोराखार से एवं पोटैशियम् सल्फेट (Potassium sulphate) आदि से प्राप्त किया जाता है। भूमि में पोटैशियम् के लवण रहते हैं। वृक्ष भूमि से इनका शोषण कर लेते हैं। इनके बिना वृक्षों की वृद्धि नहीं होती। २६ भाव.I

३५४ भावप्रकाशनिघण्टुः उपर्युक्त क्षार मृदुक्षार कहलाता है। तीक्ष्ण क्षार बनाने के लिये क्षारोदक (वृक्ष को जला कर बनाई राख के जलीय भाग) में चूना मिलाना चाहिये तथा बाद में उस घोल को सुखाना चाहिये। यह अत्यन्त दाहक होता है तथा इसमें पोटैशियम् हाइड्रोऑक्साइड् रहता है। यवक्षार का स्वाद राखी के समान किन्तु कुछ नमकीन होता है। गुण और प्रयोग-यवक्षार अग्निदीपक, मृदुविरेचक, अम्लतानाशक, रक्तशोधक, सौम्यमूत्रल, कफनिःसारक एवं कुछ स्वेदजनक है। इसका उपयोग शूल, अजीर्ण, अम्लपित्त, अम्लोत्कर्ष, मूत्रकृच्छ्र, यकृत् प्लीहा एवं अन्यग्रन्थियों की वृद्धि, ज्वर, अर्श, कामला एवं गुल्म में किया जाता है। (१) जीर्ण आमाशयशोथ तथा आमाशय में श्लेष्मा की अधिकता होने पर भोजन के २० मिनट पूर्व यवक्षार का उपयोग अन्य सुगन्धित एवं तिक्त औषधों के साथ किया जाता है जिससे श्लेष्मा कम हो कर पाचक स्रावों की उत्पत्ति होती है तथा पाचन ठीक होता है। परिणाम शूल एवं अम्लपित्त आदि विकारों में भोजन के २ घंटे पश्चात् इसके उपयोग से अम्लता की अधिकता से होने वाला शूल नहीं होता। नींबू के रस के साथ फेनायमान मिश्रण के रूप में लेने से आमाशय पर शामक प्रभाव होकर वमन में लाभ होता है। (२) यकृत्, प्लीहावृद्धि एवं गुल्म आदि में बड़ाहर्रा, रोहितक की छाल एवं छोटी पीप के क्वाथ के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इसके उपयोग से आन्त्रिक श्लेष्मा कम होकर पित्त मार्ग का अवरोध दूर होने से कामला में लाभ होता है। (३) इसके उपयोग से कफ पतला होकर निकलने लगता है। शुष्क कास तथा श्वसनिकाशोथ आदि में ४ रत्ती यवक्षार, १० बूँद अडूसा का रस तथा २ रत्ती लौंग का चूर्ण देने से लाभ होता है। (४) ज्वर तथा अम्लोत्कर्ष की अवस्थाओं में इसका उपयोग किया जाता है। ज्वर में स्वेदल रूप में पसीना लाने के लिये नीम के रस या क्वाथ के साथ इसका उपयोग लाभदायक है। (५) इससे वृक्कों को उत्तेजना मिलने से मूत्रोत्सर्ग अधिक होता है। मूत्रकृच्छ्रता में इससे प्रक्षोभ का शमन होकर पेशाब की जलन दूर होती है। मूत्र की प्रतिक्रिया क्षारीय होने से यूरिक् एसिड (Uric acid) का उत्सर्ग अधिक होकर आमवात, वातरक्त तथा यूरिक् एसिड से बनने वाली पथरी में लाभ होता है। (६) इसके घोल का बाह्य प्रयोग शीतपित्त, उदर्द, खुजली, श्वित्र, विचर्चिका एवं कीटदंश पर किया जाता है। इससे त्वचा के ऊपर का तैलीय अंश घुल कर निकल जाता है जिससे सादे जल की अपेक्षा इसके घोल से त्वचा अधिक साफ हो जाती है। अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से अतिसार, शोथ, फॉस्फेट्स से बनने वाली पथरी आदि व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं तथा वृक्क भी विकारग्रस्त हो जाते हैं। मात्रा-१-२ रत्ती। ९४. सज्जी हिं०-सज्जी, सज्जीखार, सज्जीमिट्टी। बं०-साजिखार, साजीमाटी, साजी खारु। म०-सज्जीखार, साजी। मा०-साजीक्षार। गु०-साजीखार। क०-साजीखारुं, साजी खार, सज्जीखार। ता०-सज्जीकारं। पं०-सज्जी, लोटा सज्जी, खगनखार। फा०-संजार कलिया, अशखार। अ०-कलिमास्कर, कलिवशब्बुल असफर। अं०- Barilla (बॅरिल्ला-खारे वृक्ष की राख); Impure Carbonate of Soda (इम्प्योअर कार्बोनेट ऑफ् सोडा)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः ३५५ सज्जी—सफेदी लिए भूरे रंग का एक प्रसिद्ध खार है। औषध के अतिरिक्त काँच, साबुन एवं कागज आदि अनेक पदार्थों के निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है। सज्जी कई प्रकार से बनाई जाती है जिनका संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है। (१) समुद्र के किनारे तथा क्षारीय भूमि में उत्पन्न होने वाले कुछ वृक्ष होते हैं, उनकी राख में सज्जी होती है। समुद्र के सेवार में भी सज्जी होती है जिसकी राख को केल्प (Kelp) कहा जाता है। ये स्पंज के समान कड़े गट्ठे होते हैं तथा इसमें ३-८% सज्जी होती है। खारे वृक्षों की राख को खार सज्जी (Barila-बरिला) कहा जाता है जिनमें २५-४०% सज्जी होती है। भारतवर्ष में निम्नलिखित तीन वर्ग के खारे वृक्ष पाये जाते हैं—चिनोपोडिएसी Chenopodiaceae, सैलिकोर्निसी (Salicorniceae) एवं (Salsolaceae) सॅल्सोलेसी। पंजाब में अक्तूबर से जनवरी तक सज्जी बनाने के कारखाने काम करते हैं। खारे वृक्षों को सुखाकर ६ फीट गोल एवं ३ फीट गहरे गढ़े में डालकर धीरे-धीरे जलाते हैं। गढ़े में हाँड़ियों को नीचे छेद कर उल्टे मुँह रखते हैं। कुछ समय बाद राख में से पतला द्रव निकल कर हाँड़ियों में जमता है। ४ दिन वैसे ही अपने आप ठंडा होने देते हैं। हाँड़ियों में जो सज्जी जमा होती है उसे वहाँ लोटासज्जी कहा जाता है। हाँड़ियों के बाहर जो सज्जी जमती है वह अशुद्ध होती है। लोटासज्जी कॅरोक्साइडॉन् ग्रिफिथिआइ (Caroxylon Griffithii) नामक वृक्ष से बनाई जाती है। यह सबसे शुद्ध होती है तथा औषध में इसका व्यवहार किया जाता है। मांटगोमरी प्रांत में इसे खगनखार कहा जाता है। दूसरे वृक्षों से प्राप्त सज्जी जो हलके दर्जे की होती है उसे भूत्नीसज्जी कहते हैं। लोटासज्जी को औषध में व्यवहार में लाने के पूर्व शोधन कर लेना चाहिये। इसके लिये इसे दुगुने जल में बंद पात्र में २ घंटे उबालते हैं तथा बार-बार हिलाते जाते हैं। फिर ऊपर के गरम तरल भाग को छान कर तामचीनी को कढ़ाइयों में मन्द आँच पर सुखाते हैं। बचे हुये नीचे के भाग में फिर जल डालकर उबाल कर ऊपर का द्रव छान कर सुखाते हैं। इस प्रकार प्राप्त हुई सज्जी को फिर उष्ण जल में घोल कर सुखाते हैं जिससे सइके रवे बनते हैं। इन्हें बंद बोतलों में रखना चाहिये। (२) भारतवर्ष के अनेक प्रान्तों में ऊसर अथवा रेहाल भूमि होती है। ऐसी भूमि में सज्जी, खारीनोन (सोडियम् सल्फेट), नमक एवं सोरा आदि मिले रहते हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों की रेह में इनकी मात्रा कम ज्यादा हुआ करती है तथा और भी कुछ पदार्थ उसमें रहते हैं। जिस रेह में सज्जी की अधिकता होती है उसे सज्जी माटी या धोबी की मट्टी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश में गंगा और जमुना नदी के बीच के प्रदेश में रेह बहुत होती है। इसमें ८८% सज्जी होती है। जिस स्थान में रेह अधिक होती है वहाँ इसका जमीन पर बरफ की तरह सफेद स्तर स्पष्ट दिखलाई देता है। हिमालय से जो नदियाँ बहती आती हैं वे अपने साथ विभिन्न क्षार तथा लवणों को बहा ले आती हैं। ये आसपास की जमीन में जमा होते हैं। गरमी के दिनों में उष्णता से जब नीचे का जल ऊपर आता है तब उसके साथ ये क्षार ऊपर आकर जम जाते हैं। जिस रेह में सज्जी अधिक होती है उसे जल में घोल कर एवं निथार-छानकर सुखा लेते हैं। (३) मध्यप्रांत में लोणार तालाब से भी सज्जी बनाई जाती है। यह रेह से प्राप्त सज्जी से शुद्ध होती है। इस तालाब में सज्जी के बड़े-बड़े टुकड़े भी मिलते हैं तथा उसके जल को सुखाकर भी सज्जी प्राप्त करते हैं। इस तालाब से सोडियम् बाइकार्बोनेट (Sodium bicarbonate, Na H C O₃), सं०-द्रोणलवण भी प्राप्त होता है। इसको दोने में लेकर जमाते हैं। इसलिये इसे द्रोण लवण कहा जाता है। (४) उपर्युक्त विधियों के अतिरिक्त खाने के नमक एवं खारीनोन आदि से भी सज्जी बनाई जाती है। शुद्ध सज्जी को सुरतीखार कहा जाता है तथा बाजारी अशुद्ध सज्जी को बांगडखार कहते हैं। सर्वप्रथम लिखे हुए प्रकार की शुद्ध सज्जी का औषध में व्यवहार करना चाहिये। यह शुभ्र, गंधहीन, अस्वादु, कुछ नमकीन एवं ताजी अवस्था में रवेदार होती है। खुली हवा में रखने पर इस पर बुरादा जम जाता है। यह जल में विलेय लेकिन मद्यसार में अविलेय होती है।

३५६ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-इसमें प्रधानतया सोडियम् कार्बोनेट (Sodium carbonate, Na₂ Co₃ 10 H₂O) रहता है। गुण और प्रयोग-सज्जी के गुण यवक्षार के गुणों के समान ही हैं किन्तु उससे यह कुछ हीनगुण युक्त है। यह दीपन, पाचन, मूत्रल, कफनिःसारक, अम्लतानाशक एवं आध्मानहर है। इसका उपयोग कास, श्वास, अजीर्ण, अम्लपित्त, शूल, आध्मान, मूत्रकृच्छ्र, आमवात एवं गुल्म आदि रोगों में किया जाता है। (१) अग्निमांद्य, अजीर्ण एवं परिणामशूल में सज्जीखार, यवक्षार एवं पञ्चलवण सब समान मात्रा में लेकर नींबू के रस की भावना देकर १० रत्ती की मात्रा में दिया जाता है। (३) अनेक चर्म रोगों में इसके हल्के घोल में अवगाहन कराया जाता है एवं जले हुए भाग पर १०% घोल की पट्टी रखने से पीड़ा शांत होती है। सज्जीखार एवं यवक्षार दोनों को जल में मिलाकर फोड़े पर लगाने से फोड़ा जल्दी फूटकर बह जाता है। मात्रा-१-२ रत्ती। नोट-पाश्चात्य चिकित्सा में यवक्षार (पोटैशियम् कार्बोनेट) एवं सज्जीखार (सोडियम् कार्बोनेट) की अपेक्षा आंतरिक प्रयोग के लिये पोटैशियम् बाइकार्बोनेट एवं सोडियम् बाइकार्बोनेट का अधिक प्रयोग किया जाता है क्योंकि ये अधिक सौम्य होते हैं। इनमें भी पोटैशियम् के लवण शरीर में एक निश्चित अनुपात में रहते हैं। जब तक इन्हें अत्यधिक मात्रा में या सिरा द्वारा प्रयोग नहीं करते तब तक इनके प्रभाव में विशेष अंतर दिखलाई नहीं देता। भारतवर्ष के लोणार तालाब की सज्जी में सोडियम् बाइ कार्बोनेट रहता है। ९५. सोरा (सुवर्चिका) सं०--सौराक्षार, सूर्यक्षार, सौवर्चल, वह्न्युत्तेजक, सुवर्चिका, कर्पूर शिलाजतु । हिं०--सोरा, कलमी सोरा, सोराखार । बं०--सोरा । गु०--सुरोखार । पं०--कल्मीशोर । ता०--पोत्तिवुप्पु । अ०--अब़कर । फा०--शोरा । अं०-- Saltpetre (साल्टपीटर = पहाड़ी नमक); Potassium Nitrate (पोटैशियम् नाइट्रेट) । ले०--Potassii Nitras (पोटॅसिआइ नाइट्रेट्रास्) । भारतवर्ष में सोरे की जानकारी बहुत दिनों से है। शुक्रनीति एवं रसार्णव में इसे सौवर्चल लिखा है। माधवविरचित आयुर्वेद-प्रकाश में सोरे को 'कर्पूराभं शिलाजतु सोराकाख्यं तु पाण्डुरम्' ऐसा लिखकर अग्निबाण में इसका उपयोग होता है, ऐसा लिखा है। रसपद्धति में 'श्वेतं शिलाजतु वह्न्युत्तेजकं' लिखा है तथा उचित रोगोपयोग भी दिया है। रसरत्नसमुच्चय में भी 'कर्पूर शिलाजतु' नाम से इसका उल्लेख है तथा गुण भी सोरे से मिलते हैं। इसका मारण अथवा सत्त्वपातन नहीं किया जाता' यह निर्देश ध्यान देने योग्य है। और भी अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख मिलता है। मूल में यह आया हैं कि 'सुवर्चिका स्वर्जिकावद् बोद्धव्या गुणतो जनैः' यह बात भ्रमात्मक मालूम होती है। या तो सज्जी का ही कोई भेद होगा जिसके लिए सुवर्चिका शब्द का प्रयोग भावप्रकाशकार ने किया हो या डॉ० देसाई के कथनानुसार 'भावप्रकाशकार का कथन गलत हो। इसी प्रकार 'सौवर्चल' शब्द के विषय में भी मतभेद है जिसके संबन्ध में सौवर्चल लवण के अन्तर्गत विवेचन किया गया है। यहाँ सोरे का वर्णन दिया जा रहा है। प्राचीनकाल में भारतवर्ष से सोरे के निर्यात का व्यापार बहुत था लेकिन अंग्रेजों के नियन्त्रण के कारण इसका व्यापार बहुत कम हो गया। यहाँ उत्तर हिन्दुस्तान, पंजाब, सिंध एवं गङ्गा नदी के बीच के प्रदेश तथा बिहार में यह बहुत उत्पन्न होता है। बिहार में तो यह सबसे अधिक उत्पन्न होता है। वहाँ पर जमीन पर ओस की तरह

हरीतक्यादिवर्गः ३५७ लकड़ी, गोबर आदि की राख, जानवरों की विष्ठा, मूत्र, कुछ बरसात एवं उष्णता तथा एक प्रकार के कृमि इन सबकी सहायता से सोरा बनता है इसलिए इसे पूतिलवण और कृमिज क्षार ये नाम दिये गये हैं। बरसात के पूर्व गाँव के आस-पास की भूमि १/२ इञ्च तक खोदकर उसे जल में मिलाते हैं फिर ऊपर के जल को उबाल कर या सूर्यताप से सुखाकर सोरा निकालते हैं। फिर से अशुद्ध सोरे को साफ किया जाता है। कलमीशोरा काफी शुद्ध रहता है। इसमें ९०% शुद्ध सोरा रहता है। बिहार में सोरा निकालने वाले लोगों को लूनिया कहा जाता है। सोरे के साथ-ही-साथ उस मिट्टी में खारीनोन एवं खाने का नमक भी होता है जिसे अलग कर लिया जाता है। ऐसे नमक को पंजाब में 'कल्रीनून' या 'निमकशोर' एवं बिहार में 'पकवानिमक' कहा जाता है जिसे कुछ लोगों ने सौवर्चल लवण माना है। सोरा, सोडियम् नाइट्रेट (Sodium Nitrate) तथा पोटैशियम् क्लोराइड् (Potassium Chloride) के परस्पर संयोग के द्वारा कृत्रिम रूप से भी बनाया जाता है। शोधन-बाजारू सोरे में ४०-६४% शुद्ध सोरा होता है और बाकी नमक रहता है। कलमीशोरा काफी शुद्ध होता है। सोरे को साफ करने के लिये एक ताँबे के पात्र में सोरे के बराबर उबलते जल में उसे घोलते हैं तथा मोटे कपड़े से लकड़ी की थालियों में छानते हैं। जब घोल ठंडा होने लगता है तब उसे लकड़ी से हिलाते जाते हैं जिससे इसका दानेदार चूर्ण प्राप्त होता है। औषध-प्रयोग में लाने से पूर्व इलायची के क्वाथ से इसमें ३ बार भावना देनी चाहिये। अशुद्ध सोरे के प्रयोग से दाह, मूर्च्छा, रक्तपित्त, श्रम, अग्निमांद्य एवं विड्ग्रह आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। अशुद्ध के सेवन से उत्पन्न विकारों की शान्ति के लिए ३ माशा कालीमरिच का चूर्ण घृत के साथ ७ दिन तक प्रातःकाल में सेवन करना चाहिये। शुद्ध सोरा रंगहीन दानेदार चूर्ण रूप में या षट्फलक स्फटिक रूप में होता है। इसका स्वाद शीतल एवं कुछ नमकीन होता है। अंगारे पर डालने से एकदम जलने लगता है। इसमें का ५/६ आक्सीजन अलग होने में समर्थ होने के कारण किसी गंधक आदि ज्वलनशील पदार्थ के साथ इसे मिलाकर गरम करने से एकाएक बहुत तीव्र उष्णता उत्पन्न होती है जिसमें चाँदी का सिक्का तक गल जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें पोटैशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate, KNO₃) रहता है। अल्प मात्रा में सोरे में कुछ नाइट्राइट्स (Nitrites) भी पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह कटु, तीक्ष्ण, मूत्रविरेचनीय, स्वेदजनन, श्लेष्महर एवं शोथहर है। इसका गाढ़ा घोल आमाशय एवं आंत्र में तीव्र प्रक्षोभ उत्पन्न करता है जिससे रक्तवमन, रक्तातिसार तथा हृदयातिपात होकर मृत्यु भी हो सकती है। हृदय के लिए यह अवसादक होने के कारण हृदय की गति कम होती है तथा उसका बल भी कम हो जाता है। यह रक्त कणों के आक्सीजन ग्रहण करने की शक्ति को घटाता है एवं इससे रक्त जमने की क्रिया भी घट जाती है। इसका मूत्रल प्रभाव वृक्क द्वारा अधिक मूत्र के छनने (Filtration) से होता है तथा अधिकांश मात्रा में यह मूत्र द्वारा उत्सर्गित हो जाता है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, ज्वर, शोथ, प्लीहावृद्धि, पाण्डु, कामला, प्रमेह एवं अग्नि मांद्य आदि में किया जाता है। (१) मूत्रकृच्छ्र एवं अश्मरी में इसको गोखरू के काढ़े के साथ पिलाते हैं तथा बड़ के पत्तों को पीस कर तथा उसमें सोरा मिला कर पेडू पर लेप करते हैं। (२) पुराने सोजाक में सोरा ५, दालचीनी ४, हर्रा ३, पाषाणभेद ३, इलायची ५ एवं चीनी २० भाग, इसका अवलेह ४ माशा की मात्रा में उपयोगी हैं। सोरा ५ रत्ती की मात्रा में भिंडी के क्वाथ के साथ देने से भी सोजाक में लाभ होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

, शर्करा एवं उष्ण जल के साथ १० रत्ती सोरा देने से पसीना होकर ज्वर कम हो जाता है। -> "मद्य" (६) वातरक्त (गाउट) एवं मदात्ययजन्य शिरःशूल के निवारण के लिये सोरा १० रत्ती एवं पोर्टेशियम् बाइकार्बोनेट १५ रत्ती एक बोतल सोडावाटर के साथ पिलाने से आवेग रुक जाता है। आमवात में अर्कमूल के चूर्ण के साथ या मांड के साथ इसको दिया जाता है। (७) उरस्तोय (प्लूरिसी), सद्रव हृदयावरणशोथ (पेरीकार्डाइटिस्) एवं जलोदर आदि में पुनर्नवा, काली कुटकी, सोंठ आदि के क्वाथ के साथ इसका प्रयोग करते हैं। (८) ५ साल से बड़े बच्चों की खाँसी में सोरा ५, हीराकासीस ४, नौसादर ४ एवं गन्धक ४ भाग इनका चूर्ण १/२ रत्ती की मात्रा में देते हैं। (९) शिरःशूल, शोथ, आमवातज सन्धिपीड़ा, मोच एवं चोट आदि पर नवसादर एवं सोरा जल में घोल कर उसमें कपड़ा भिगो कर उसकी पट्टी रखी जाती है।

हरीतक्यादिवर्गः ३५९ औषधि के लिये व्यवहार करते हैं। इसी को संभवतः आयुर्वेदप्रकाश में ‘नीलकण्ठ’ कहा गया है जिसमें नीली आभा रहती है। इन पर मिट्टी लगी रहती है। अंगुली से रगड़कर मिट्टी हटाने पर तेलिया स्पर्श मालूम होता है। खुली हवा में टङ्कण का जलीयांश निकल जाता है जिससे उसके ऊपर सफेद बुरादा जम जाता है। इसलिये इस पर घी या चर्बी लगा देते हैं। शुद्ध टङ्कण स्फटिक सदृश, वर्णरहित, पारभासक, चमकीला, गन्धहीन, स्वाद में कुछ नमकीन एवं कसैला तथा अल्पक्षारीय होता है। इससे गरम करने पर इसका जलीयांश निकल जाता है और यह फूलकर छिद्रयुक्त ढेला सा हो जाता है। यही इसकी शोधन की विधि भी है क्योंकि इस पर जो चर्बी आदि लगी रहती है वह गरम करने से जल जाती है। अशुद्ध सुहागे के सेवन से चर्बी आदि के कारण वांति और भ्रम आदि उत्पन्न होते हैं। औषध के अतिरिक्त मिट्टी के बर्तनों पर चमक लाने में, मीना बनाने में, बनावटी रत्नों के निर्माण, वार्निश रंग के काम, धातुओं के शोधन एवं द्रावण आदि के लिये इसका उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-यह सोडियम् तथा बोरिक् एसिड के संयोग से बनता है। इसका रासायनिक सूत्र Na₂ B₄ O₇, 10 H₂ O है। गुण और प्रयोग-टङ्कण, उष्ण, रूक्ष, कफहर, दीपन, हृद्य, आध्मानहर, विषदोषहर, आर्तवप्रवर्तक एवं व्रणरोपक है। इसका उपयोग अम्लपित्त, आध्मान, कफज्वर, प्लीहवृद्धि, रक्तप्रदर, अनार्तव, कष्टार्तव, प्रसव के समय आविवृद्धि के लिये तथा इसके सौम्य प्रतिदूषक होने के कारण बाह्य प्रयोग के लिये किया जाता है। (१) बच्चों के कफयुक्त ज्वर, कास विशेषकर गले की खराबी से उत्पन्न होने पर दुर्गन्धयुक्त अतिसार, अपस्मार तथा आक्षेप आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। परिश्रुत जल में बनाया हुआ इसका १० प्रतिशत का घोल सिरा द्वारा सूचीवेध से देने पर अपस्मार में बहुत लाभकर होता है। (२) इसका मूत्र के द्वारा शीघ्र उत्सर्ग होने के कारण जल तथा यूरिया का अधिक उत्सर्ग होता है। यह मूत्र को क्षारीय करता है तथा इसी प्रतिक्रिया में मूत्र जननेन्द्रिय संस्थान के लिये अच्छा प्रतिदूषक है। इसके प्रयोग से दूषित मूत्र साफ हो जाता है। (१) सौम्य प्रतिदूषक (Antiseptic) होने के कारण इसका बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। प्रक्षोभकारक न होने के कारण कोमल श्लेष्मलकला के उपसर्ग में लाभदायक है। क्षत, व्रण, खुजली, विचर्चिका, दाद, जले हुये व्रण आदि के लिये व्रणप्रक्षालन एवं मलहम के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। श्वेतप्रदर, सोजाक, दुर्गन्धयुक्त नासास्राव एवं कर्णस्राव आदि में इसके २ १/२% घोल को पिचकारी के द्वारा प्रयोग करते हैं। नेत्राभिष्यन्द में फिटकिरी के साथ इसके घोल से अक्षिप्रक्षालन किया जाता है। दाह एवं शोथयुक्त मुखपाक में मधु के साथ इसका लेप किया जाता है तथा पारदविषजन्य लालास्राव तथा अन्य मुखविकारों में इसके घोल का उपयोग कुल्ला करने के लिये किया जाता है। स्वरभङ्ग में इसकी टिकिया मुख में रखकर चूसने से लाभ होता है। बोल के साथ इसका उपयोग मसूढ़ों के व्रणों पर लाभदायक है। २ छटाँक जल में ४ माशा सोहोगा डालकर उससे प्रक्षालन से योनि एवं गुदकंडू दूर होती है। उष्ण जल में इसके घोल में मोजे तर कर उसका उपयोग करने से पैरों के पसीने की दुर्गन्ध दूर होती है। अम्हौरी आदि में इससे युक्त पाउडर का उपयोग किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती। नोट-टङ्कण एवं गन्धक के तेजाब के संयोग से बोरिक् एसिड (Boric acid) बनता है जिसके गुण धर्म एवं प्रयोग सब टङ्कण के समान ही है किन्तु यह कुछ अम्ल है। अन्नसंरक्षण (Food preservation) में पहले इसका बहुत प्रयोग किया जाता था लेकिन इसके विषैले परिणाम दृष्टिगोचर होने के कारण इस कार्य में अब इसका प्रयोग नहीं किया जाता। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

३६० भावप्रकाशनिघण्टुः अधिक मात्रा में इनके प्रयोग से अग्निमान्द्य, वमन, विरेचन, मांसपेशी-दुर्बलता, मूत्र में ॲल्ब्यूमिन् एवं अत्यन्त थकावट आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। अधिक दिन तक बाह्य या आभ्यन्तर प्रयोग से बालों का झड़ना, विचर्चिका, गजचर्म, त्वक्शोफ, त्वक्शोथ, मुख में प्रक्षोभ, मसूढ़ों पर एक धूसर रेखा तथा अन्य चर्मविकार आदि होते हैं। वृक्क रोगियों में विषैले परिणाम की अधिक सम्भावना रहती है। अथ क्षारद्वयं क्षारत्रयं क्षाराष्टकं च तेषां लक्षणानि गुणाँश्चाह स्वर्जिका यावशूकश्च क्षारद्वयमुदाहृतम्। टङ्कणेन युतं तत्तु क्षारत्रयमुदीरितम्।।२५७।। मिलितं तूक्तगुणकृद्विशेषाद्गुल्महत्परम्। पलाशवज्रिशिखरिचिञ्चाऽर्कतिलनालजाः ।।२५८।। यवजः स्वर्जिका चेति क्षाराष्टकमुदाहृतम्। क्षारा एतेऽग्निना तुल्या गुल्मशूलहरा भृशम् ।।२५९।। क्षारद्वय, क्षारत्रय तथा क्षाराष्टक का वर्णन और गुण-क्षारद्वय-सज्जी तथा जवाखार को क्षारद्वय कहते हैं। क्षारत्रय-क्षारद्वय (सज्जी तथा जवाखार) में यदि सुहागा मिला दिया जाय तो उसे क्षारत्रय कहते हैं। इन तीनों प्रकार के क्षारों के जो गुण ऊपर पृथक्- पृथक् कह आये हैं वे ही सब एकत्र मिल जाने पर भी उपर्युक्त गुणवाले होते हैं किन्तु विशेषरूप से गुल्म दूर करने में उत्तम होते हैं। पलाशक्षार, सेहुंडक्षार, चिचिड़ाक्षार, इमलीक्षार, मदारक्षार, तिलनालका क्षार, जवाखार तथा सज्जी इन सब क्षारों के योग का क्षाराष्टक कहते हैं। ये सब क्षार अग्नि के तुल्य हैं तथा गुल्म एवं शूल के नाश करने में उत्तम होते हैं।[२५७-२५९] ९७. क्षारद्वय-क्षारत्रय-क्षाराष्टक क्षार बनाने की क्रिया-क्षार बनाने के लिये बड़े वृक्ष की छाल और गुल्म तथा क्षुप जाति की वनस्पति का पञ्चांग लेना चाहिये। इष्ट पदार्थ को जला कर उसकी सफेद भस्म (राख) संग्रहकर किसी मिट्टी के पात्र में रख उसमें चौगुना जल छोड़ भली प्रकार घोलकर एक सुरक्षित स्थान में रख दें। कुछ लोग राख को जल में डालकर कुछ देर उबालते हैं जिससे उसमें के क्षार आसानी से जल में घुल जाते हैं। दो-एक दिन के बाद ऊपर का जल निथार लें अथवा फिल्टर से छान लें। नीचे जमे हुए पदार्थ में फिर से चौगुना जल डालकर, उबालकर फिर ऊपर का जल निथार लें। फिर दोनों नितारे हुए जल को कड़ाही में छोड़ अग्नि पर चढ़ाकर जल औटावें। सूख जाने पर पात्र के पेंदे में जमा हुआ पदार्थ खुरचकर निकाल सुरक्षित रखें। उपर्युक्त विधि से जो क्षार तैयार होता है वह मृदुक्षार कहलाता है। इसमें प्रायः कुछ पदार्थों के साथ-साथ सोडियम् एवं पोटैशियम् तत्त्वों के कार्बोनेट लवण हुआ करते हैं। यदि क्षारयुक्त जल को औटाते समय पूरी तरह न औटाकर आधा औटाने के बाद उस द्रव में चूना और शखनाभि आदि पदार्थों की कुछ भस्म मूल राख की चौथाई मात्रा में डालकर और थोड़ा उबालकर तथा छानकर प्राप्त द्रव को पूरी तरह औटावें तो तीक्ष्णक्षार प्राप्त होता है। इसमें थोड़ी बहुत मात्रा में प्रायः सोडियम् और पोटैशियम् तत्त्वों के हाइड्रोक्साइड्स रहते हैं जो अत्यन्त दाहक होते हैं। दाहजनक होने के कारण ही उन्हें तीक्ष्णदाह (Caustic alkalies) कहा जाता है। अथ चुक्रम् (चूक) । तन्नामगुणानाह चुक्रं सहस्रवेधि स्याद्रसाम्लं शुक्तमित्यपि। चुक्रमत्यम्लमुष्णञ्च दीपनं पाचनं परम् ।।२६०।। शूलगुल्मविबन्धामावातश्लेष्महरं सरम्। वमितृष्णाऽऽस्यवैरस्यहृत्पीडावह्निमान्द्यहृत् ।।२६१।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्र भावविरचिते भावप्रकाशे प्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणं समाप्तम् ।।२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

हरीतक्यादिवर्गः ३६१ चूक के नाम तथा गुण—चुक्र, सहस्रवेधि, रसाम्ल तथा शुक्त ये सब चूक के संस्कृत नाम हैं। चूक—अत्यन्त खट्टा, उष्णवीर्य, अग्निदीपक तथा अत्यन्त पाचक होता है और यह शूल, गुल्म, विबन्ध, आमवात तथा कफ का नाशक और दस्तावर होता है तथा वमन, प्यास, मुख की विरसता, हृदय की पीड़ा एवम् अग्नि की मन्दता को दूर करता है। [२६०- २६१] ९८. चूक हिं०—चूक, चूका। मा०—चूका। गुरु-चुका। चूक—काले रङ्ग का एक तरल पदार्थ अत्यन्त खट्टा होता है। खट्टा अनार, नींबू, इमली, आमला इत्यादि कितने ही खट्टे पदार्थों के रस से चूक बनाया जाता है। इनमें अनार का बना हुआ चूक अच्छा समझा जाता है। चूक नाम से श्वेत, पारदर्शक स्फटिक भी मिलते हैं। जो खट्टे होते हैं। यूनानी वाले कहते हैं कि चूक एक पहाड़ी फल का स्वरस है जिसको पहाड़ी मनुष्य लाते हैं। आगे शाकवर्ग में भी एक चुक्रिक नामक शाक का वर्णन आया है। इति श्रीमिश्रलटकनतनयश्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे हरीतक्यादिवर्गः समाप्त ।।

अथ कर्पूरादिवर्गः

अथ कर्पूरम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह

पुंसि क्लीबे च कर्पूरः सितःभ्रो हिमवालुकः । घनसारश्चन्द्रसंज्ञो हिमनामाऽपि स स्मृतः ॥१॥ कर्पूरः शीतलो वृष्यश्चक्षुष्यो लेखनो लघुः । सुरभिर्मधुरस्तिक्तः कफपित्तविषापहः ॥२॥ दाहतृष्णाऽस्यवैरस्यमेदोदौर्गन्ध्यनाशनः । कर्पूरो द्विविधः प्रोक्तः पक्वापक्वप्रभेदतः । पक्वात्कर्पूरतः प्राहुरपक्वं गुणवत्तरम् ॥३॥ अब कर्पूरादिवर्ग आरम्भ होता है, उसमें प्रथम कर्पूर के नाम तथा गुण—कर्पूर (यह पुंल्लिङ्ग तथा नपुंसकलङ्गि में होता है), सिताभ्र, हिमवालुक, घनसार, चन्द्रसंज्ञ (चन्द्रमा के जितने नाम हैं वे सभी इसके पर्यायवाची शब्द हैं) और हिमनामा (जितने हिम के नाम हैं वे सभी इसके पर्यायवाची शब्द हैं) ये सब कपूर के संस्कृत नाम हैं। कपूर—शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक), नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, लघु, सुगन्धयुक्त, मधुर तथा तिक्त रस युक्त एवम्- कफ, पित्त, विष, दाह, प्यास, मुख की विरसता, मेदरोग तथा दुर्गन्ध को नष्ट करने वाला होता है। पक्व तथा अपक्व इन भेदों से कपूर दो प्रकार का होता है। पक्व की अपेक्षा अपक्व कपूर अधिक गुणकारी होता है ऐसा वैद्य लोग कहते हैं। १-३

१. कपूर

हिं०—कपूर, भीमसेनी कपूर, बरास कपूर। बं०—कर्पूर। मा०—कापूर। म०—कापूर। गु०—कपुर। ते०, ता०—कर्पूरम्। फा०—कापूर। अ०—काफूर। यू०—रियाही काफूर। अं०—Camphor (कैम्फर); Borneo Camphor (बोर्निओ कैम्फर)। ले०—Camphora (कैम्फोरा)। कपूर— यह एक उड़नशील जमा हुआ श्वेत तैलीय पदार्थ है। यह चार प्रकार का होता है। (१) भीमसेनी या बरास कपूर, (२) चीनी या जापानी कपूर, (३) पत्री या नागी कपूर, ब्ल्यूमिया कैम्फर (Blumea Camphor), (४) रासायनिक विधि द्वारा निर्मित कृत्रिम (Synthetic–सिंथेटिक्) कपूर। (१) भीमसेनी कपूर— इसके बहुत बड़े वृक्ष बोर्निओ तथा सुमात्रा में होते हैं। इसे ले०—Dryobalanops camphora Colebr.; Fam. Dipterocarpaceae (ड्रायोबॅलेनॉप्स कॅम्फोरा कोलेडिप्टेरोकार्पेसी) कहते हैं जो भारतीय साल से मिलता-जुलता है। इसके वृक्ष भारतवर्ष में नहीं पाये जाते। इधर कुछ वृक्षों को लगाने का प्रयत्न किया गया है। औषध में बहुत प्राचीन काल से कपूर नाम से इसका व्यवहार किया जाता है। प्राचीनों ने कर्पूर का अपक्व भेद जो कहा है वह संभवतः यही है क्योंकि यह, वृक्ष में जहाँ पोल हो अथवा चीरे पड़े हों वहाँ जमा हुआ ही प्राप्त होता है। इसको चीनी कपूर की तरह पकाकर बनाना नहीं पड़ता। इस वृक्ष से एक तरल द्रव्य भी प्राप्त होता है जिसे कर्पूर तैल (Camphor oil of Borneo) कहा जाता है। यह कपूर चीनी कपूर की अपेक्षा भारी होने के कारण जल में डूब जाता है। यह हवा की उष्णता से उड़ता नहीं। इसे बोतलों में रखने पर इसके कण बोतल पर जमा नहीं होते। यह चीनी कपूर की अपेक्षा अधिक उष्णता से जलता है। इसमें कपूर के अतिरिक्त कुछ अम्बर आदि की मिश्रित गन्ध आती है। इसके छोटे, बड़े, गोल स्फटिक होते हैं जो CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३६३ सफेद, चमकीले, चिकने, कुछ कड़े, चूर्ण करने में चीनी कपूर की अपेक्षा देर में चूर्ण होने वाले एवं वायु से आर्द्रता को न सोखने वाले होते हैं। यह कपूर बहुत महँगा होता है। इसका रासायनिक संगठन C₁₀ H₁₈ O₁ है। इसके गुण एवं प्रयोग आदि सब चीनी कपूर के समान ही हैं लेकिन यह त्वचा की रक्तवाहिनियों का अधिक बिस्फार करता है तथा चीनी कपूर की अपेक्षा बाह्य प्रयोग में कम दाहजनक है। यह मस्तिष्क के लिये अधिक अवसादक है तथा चीनी कपूर की अपेक्षा अधिक मात्रा में दिया जा सकता है। इसके गुणधर्मों का वर्णन आगे चीनी कपूर के साथ ही दिया गया है। भीमसेनी कपूर के अभाव में निम्नलिखित विधि से बनाये हुये कपूर का व्यवहार किया जाता है। दूब, शीतल मिरच इलायची और जो हरड़ इनको समान मात्रा में पीसकर एक बटलुई में बिछा दें और उस पर कपूर के छोटे-छोटे टुकड़े पानी में भिगो कर रख दें तथा कुछ घी भी डाल दें। उस बटलुई पर केले का पत्ता ढाँक कर उस पर एक दूसरा पीतल का कटोरा रख दें। इस कटोरे में थोड़ा जल डाल दें। फिर बटलुई को जलयुक्त पात्र में रखकर मन्द आँच पर गरम करें। ऊपर के कटोरे का पानी गरम होने पर उसे निकाल कर ठण्डा पानी डालते रहें। अब सब कपूर उड़कर ऊपर जम जाय तब उसे निकालकर व्यवहार करें। (२) चीनी या जापानी कपूर-यह तमाल जाति के वृक्षों से बनाया जाता है। इसका विशेष वर्णन आगे किया गया है। (३) पत्री या नागी कपूर-वस्तुतः भारतीय कपूर यही है। यद्यपि इसके क्षुप भारतवर्ष में बहुत होते हैं जिनसे बहुत कपूर निकाला जा सकता है तथापि अपने यहाँ इससे कपूर नहीं निकाला जाता। भारत में जितना भी कपूर आवश्यक होता है वह विदेशों से ही आता है। पत्री कपूर कुकरौंधा जाति के क्षुपों से प्राप्त होता है। इस क्षुप के कई भेद हैं जिनमें ये प्रधान हैं-Blumea balsamifera, DC., B. lacera, DC., B. densiflora, B. DC., malcolmii Hook. f. (ब्लूमिया बाल्समीफेरा, ब्ल्यू. लॅसेरा, ब्ल्यू. डेन्सिफ्लोरा, ब्ल्यू. मालकोल्माइ)। यह Compositae (काम्पोज़िटी) वर्ग के क्षुप हैं। यह हिमालय में नेपाल से सिक्किम तक तथा दक्षिणी पठार के पश्चिमी भाग में १७००- २५०० फीट तक पाये जाते हैं। ब्ल्यू. डेन्सिफ्लोरा का छोटा क्षुप आसाम, खासिया पहाड़, चटगाँव एवं अन्य स्थानों में पाया जाता है। ब्ल्यू. बाल्समीफेरा के क्षुप वर्मा में इतने अधिक उत्पन्न होते हैं कि वह आधे संसार की कपूर की पूर्ति कर सकता है। ब्लूमिया के अतिरिक्त तुलसी की जाति में ऑसिमम् किलिमैण्ड्सचॅरिकम् (Ocimum kilimandscharicum) तथा 'कर्पूर' (बं.) (Limnophila gratioloides R. Br. लिम्नोफाइला ग्रॅटियोलॉइडीस) आदि अन्य अनेक वनस्पतियों में कपूर की गन्ध आती है जिनसे कपूर प्राप्त किया जा सकता है। पत्री कपूर का रासायनिक संगठन भीमसेनी कपूर से मिलता-जुलता है। (४) कृत्रिम कपूर-भारतवर्ष में यद्यपि ब्लूमिया से काफी कपूर निकाला जा सकता है तथापि अब रासायनिक विधि द्वारा कृत्रिम कपूर बनाया जाने लगा है जो वृक्षों से प्राप्त कपूर से सस्ता होता है। औषध की अपेक्षा कपूर का अन्य सेल्युलाइड़ आदि बनाने में बहुत उपयोग होता है। नोट-राजनिघण्टु में रस, गुण, वीर्य के अनुसार कपूर के पोतास, भीमसेन, शीतकर, शंकरावास, प्रांशु, पिंज, अब्दसार, हिमयुता, बालुका, जूटिका, तुषार, हिम, शीतल एवं पक्किका (पिचका) ये १४ भेद लिखे हुये हैं। फिर शिर, मध्य और तल, इन भेदों से तीन प्रकार का माना है। स्तम्भ के अग्रभाग में होने वाला कपूर शिरसंज्ञक, मध्य में— मध्यम और पत्तों के तले होने वाला तलसंज्ञक है। प्रकाशवान्, स्वच्छ और फूला हुआ शिर; सामान्य फूला हुआ और स्वच्छ मध्यम और तल में होने वाला चूर्णवत् कुछ पीला सा होता है। अन्य प्रकार से स्तम्भ के गर्भ में स्थित कपूर उत्तम; स्तम्भ के बाहर होने वाला मध्यम जो निर्मल, कुछ पीलापन युक्त एवं चमकीला होता है; तथा कड़ा, सफेद, रूखा और फूला हुआ बाह्य कपूर कहलाता है। आगे खाने योग्य कपूर के ये लक्षण दिये हैं-साफ, भंगरइया के पत्तों के समान छोटे-छोटे टुकड़ों वाला, बहुत हलका, बिलकुल सफेद, स्वाद में तिक्त रस वाला, शीतल हृदय को प्रिय, घन, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

३६४ भावप्रकाशनिघण्टुः आह्लादकारक सुगन्ध युक्त, स्नेहहीन, कड़े परतों से युक्त तथा चमकीला कपूर राजयोग्य होता है और अन्य प्रकार के कपूर के खाने से व्रण एवं स्फोट आदि उत्पन्न होते हैं। इन्होंने 'चीनक' नाम से एक अन्य कृत्रिम भेद भी माना है। धन्वन्तरि निघण्टु में कपूर के भेद नहीं लिखे हुए हैं। कपूर का चरक में दशोमानि में उल्लेख नहीं है लेकिन सू० अ० ५ में 'धार्याण्यास्येन वैशद्यरुचिसौगन्ध्यमिच्छता।''''''''तथा कर्पूरनिर्यासं'''''''' ऐसा उल्लेख है। सुश्रुत सू० अ० ४५ में तिक्त, सुगन्धित, शीतल, लघु, लेखन आदि इसके गुण लिखे हैं एवं तृष्णा, मुखशोष तथा अरुचि आदि में उपयोगी लिखा है। अष्टांगसंग्रह (वृद्धवाग्भट) में लिखा है-'रुचिवैशद्यसौगन्ध्रमिच्छन् वक्त्रेण धारयेत्। जातीलवंग कर्पूर-'। चक्रदत्त, वृन्द आदि ने कास, श्वास, प्रमेह एवं ग्रहणी की चिकित्सा में कपूर का उपयोग नहीं लिखा है लेकिन रसचिकित्सा वालों ने इसका प्रयोग उपर्युक्त रोगों में किया है। अथ चीनाककर्पूरः (चिनिया)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह चीनाकसंज्ञः कर्पूरः कफक्षयकरः स्मृतः। कुष्ठकण्डूवमिहरस्तथा तिक्तरसश्च सः॥१४॥ चीनिया कपूर के गुण-चीनिया कपूर को संस्कृत में चीनक कर्पूर कहते हैं। यह-कफ को नष्ट करने वाला तथा कुष्ठ, खुजली और वमन को भी दूर करने वाला एवम् तिक्त रस से युक्त होता है। [४] २. चीनिया कपूर हिं०-चीनिया कपूर, चीनी कपूर, जापानी कपूर, फारमोसा कपूर। बं०-चीनेर कर्पूर। क०-चीनी कापूर। गु०-चिनाई कपूर। यू०-कैसूरी कपूर। ले०-Cinnamomum camphora Nees & Eberm. (सिनॅमोमम् कॅम्फोरा नीज, एवं)। Fam. Lauraceae (लॉरैसी)। इसके वृक्ष कोचीन चाइना से लेकर शंघाई तक तथा हैनाम से दक्षिणी जापान तक पाये जाते हैं। भारत में देहरादून, कलकत्ता, मैसूर एवं नीलगिरी पर्वत आदि स्थानों में इसके वृक्षों को लगाया गया है। दक्षिण की जलवायु इसके लिये अधिक उपर्युक्त है लेकिन भारत में लगाये वृक्षों में कपूर कम निकलता है। इसका वृक्ष-देखने में सुन्दर, ऊँचा तथा सदाहरित होता है। पत्ते-अण्डाकार, चिकने, चमकीले, नोंक की ओर संकुचित, २ से ४ इञ्च लम्बे, एकान्तर एवं पीताभ हरित होते हैं। छाल-छोटे-छोटे पीताभ श्वेत या रक्ताभ श्वेत बौर के समान आते हैं। फल-गहरे हरे रंग के मटर के समान तथा गुच्छों में आते हैं। बीज-छोटे तथा कपूर की गन्धयुक्त होते हैं। इस वृक्ष के सभी भागों में विशेष कोशाएँ होती हैं जिनमें कपूर बनता है। कपूर निकालने के लिये इसकी लकड़ी को टुकड़े-टुकड़े करके भपके के द्वारा गरम करते हैं जिससे लकड़ी में का कपूर उड़कर ऊपर जम जाता है। उस कपूर को फिर से उर्ध्वपातन विधि द्वारा शुद्ध कर लिया जाता है। प्राचीनों ने कपूर का जो पक्व भेद कहा है वह यही है क्योंकि इसे लकड़ी को पकाकर निकालते हैं। इसके पत्तों से भी कुछ कपूर प्राप्त होता है। यह कपूर रंगहीन, सफेद या पारदर्शक, स्फटिकों में, बेडौल डलियों में, चौकोर टिकियों में तथा चूर्ण रूप में होता है। यह जल पर तैरता है तथा इसका विशिष्ट गुरुत्व ०.९९५ है। इसकी गन्ध तीक्ष्ण एवं विशिष्ट प्रकार की होती है तथा स्वाद कडुवा एवं तीता होता है। एवं बाद में ठंडक मालूम होती है। यह जलाने से तुरंत जलता है तथा हवा की उष्णता से धीरे-धीरे उड़ जाता है। इसका १ भाग ७०० भाग जल में, १ भाग मद्यसार (९०%) में, ४ भाग तैल में, १/४ भाग क्लोरोफॉर्म में घुलता है तथा इथर में यह बहुत घुलता है। अजवाइन का सत्त्व या पेपरमिंट के साथ इसको मिलाने से पतला द्रव बनता है। भीमसेनी कपूर से इसका भेद पीछे लिखा गया है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३६५ रासायनिक संगठन—यह एक प्रकार का घन उड़नशील तैल (स्टियरोप्टेनस्-Stearoptenes) है। इसका रासायनिक सूत्र C₁₀H₁₆O है। ऊर्ध्वपातन द्वारा कपूर के अतिरिक्त एक तैल भी पाया जाता है। गुण और प्रयोग—कपूर वातहर, दीपन, कफघ्न, कासहर, ज्वरघ्न, स्वेदजनन, कामोत्तेजक (अल्पमात्रा में), कामवासना कम करने वाला (अधिक मात्रा में), स्तन्यनाशन तथा मस्तिष्क, हृदय एवं श्वसन के लिये उत्तेजक, उद्वेष्टन- निरोधी, सौम्य-प्रतिदूषक, स्थानिक त्वगरागकारक (प्रारंभ में), स्वापजनन (बाद में), शोथहर तथा वेदनाहर है। अधिक मात्रा में यह दाहजनक एवं मादक विष है। (१) यह आमाशय में पहुँच कर वहाँ रक्ताभिसरण क्रिया की वृद्धि करता है जिससे पाचक रसों की वृद्धि होती है तथा वायु का अनुलोमन होता है। इसके कारण अतिसार, उष्णकालीन अतिसार, वमन, विसूचिका की प्रारंभिक अवस्था, आध्मान, शूल एवं भूतोन्माद के कारण उत्पन्न वमन आदि में इससे बहुत लाभ होता है। विसूचिका के प्रारम्भ में कर्पूरासव (भै० र०) अतिसार, प्रवाहिका एवं संग्रहणी में दस्त कम करने के लिये दिया जाता है। बच्चों के आध्मान एवं शूल में कर्पूराम्बु का उपयोग एवं बड़ों में कर्पूरासव का उपयोग लाभदायक है। (२) इसके सेवन से त्वचा की रक्तवाहिनियों का बिस्फार होता है तथा पसीना अधिक होता है जिससे ज्वर में यह ताप को कम करता है। मसूरिका, रोमान्तिका, आन्त्रिकज्वर एवं ग्रन्थिंज्वर आदि में कर्पूराम्बु का उपयोग १-२ औंस की मात्रा में किया जाता है जिससे हृदय को बल मिलता है एवं ताप भी कम हो जाता है। कर्पूराम्बु बनाने के लिये कपूर को महीन कपड़े में बाँधकर जल में डुबोते हैं तथा बाद में उस जल का प्रयोग करते हैं। (३) श्वसन, हृदय तथा रक्ताभिसरण के लिये कपूर उत्तेजक माना जाता है। स्वस्थ हृदय की अपेक्षा दुर्बल, अवसादित तथा अनियमित गति युक्त हृदय पर इसका प्रभाव अधिक होता है। इसका प्रभाव प्रत्यक्षतया हृदय के ऊपर तथा श्वसन के उत्तेजित होने से अप्रत्यक्षतया होता है। ज्वर, फुफ्फुसपाक एवं सन्निपात आदि में यदि हृदय की दुर्बलता से नाड़ी दुर्बल हो जाय, हृदयातिपात के लक्षण हों तो कर्पूरहिंगुवटिका ४-४ घंटे पर या १ भाग कपूर आठ भाग दूध में घोंट कर १/४ चम्मच ४-४ घंटे पर देने से लाभ होता है। कर्पूरहिंगुवटिका बनाने के लिये १ भाग कपूर, १ भाग हींग तथा थोड़ा सा मधु एक साथ घोंटकर २ रत्ती की गोली बनावें तथा आर्द्रक रस के साथ खिलावें। रोगी गोली निगलने में असमर्थ होने पर आर्द्रक रस में घोंट कर आवश्यक होने पर १/२ रत्ती कस्तूरी मिलाकर चटावें। कर्पूर का तैलीय सूचिकाभरण हृदय एवं श्वसन को उत्तेजित करने के लिये प्रयोग किया जाता है। (४) अवसादक तथा नशीली औषधियों के दुष्परिणाम से जब श्वसन क्रिया अवसादित होती है तब कपूर के प्रयोग से उत्तेजना आकर श्वास की गति तथा उसकी गहराई बढ़ती है। कुकास, तमकश्वास एवं जीर्ण श्वसनिकाशोथ आदि कफविकारों में इसके प्रयोग से श्लेष्मलकला का रक्तप्रवाह बढ़कर कफ पतला होकर निकलने लगता है। तमकश्वास में कर्पूरहिंगुवटिका ४-४ घंटे पर जब तक दमे का जोर रहता है, देते हैं। प्रतिश्याय में कर्पूरासव या समान मात्रा में कपूर एवं मद्यसार को मिलाकर ५ बूँद की मात्रा में दिया जाता है एवं कपूर को सुँघाया भी जाता है। (५) यह मस्तिष्क को उत्तेजित करता है जिससे प्रारंभ में संपूर्ण शरीर में उत्तेजना, चक्कर, विचारों में असंगति, गति में असहयोग तथा विषैली मात्रा में आक्षेप एवं बेहोशी आदि लक्षण होते हैं। किसी-किसी में हँसने-नाचने की प्रवृत्ति होती है तो किसी में तन्द्रा आती है। वातिक हृदय की धड़कन, कम्पवात, अपस्मार, योषापस्मार एवं उन्माद आदि में में कपूर को थोड़े से मद्यसार के साथ घोट कर गोली बनाकर १-२ रत्ती की मात्रा में ३-४ बार देते हैं। (६) अत्यधिक कामोत्तेजना, सुजाक से उत्पन्न पीड़ायुक्त शिश्नोत्थान एवं वीर्यपात आदि में कपूर का अधिक मात्रा में उपयोग किया जाता है। वीर्यपात में सोते समय २ रत्ती कपूर की गोली खुरासानी अजवाइन के साथ खिलाते हैं। स्त्रियों में अत्यधिक कामवासना, जननेन्द्रिय-कण्डू, गर्भाशय पीड़ा एवं कष्टार्तव में १ से २ रत्ती कपूर दिन में दो बार खिलाते हैं। स्त्रियों में दुग्ध कम करने के लिये इसको खिलाते हैं तथा स्तनों पर इसका लेप करते हैं।

३६६ भावप्रकाशनिघण्टुः (७) कपूर का स्थानिक एवं बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। इससे स्थानिक रक्तवाहिनियों की उत्तेजना से उष्णता एवं रक्तिमा उत्पन्न होती है। प्रारम्भ में इससे सांवेदनिक वातनाड़ियाँ उत्तेजित होती हैं लेकिन बाद में अवसादित होने के कारण शीतलता का अनुभव होता है तथा पीड़ा दूर होती है। इसका प्रतिदूषक गुण बहुत अल्प है। यह त्वग्रागकारक एवं प्रतिक्षोभक होने के कारण ४ गुने तेल में मिला कर जीर्ण आमवात, मोच, मरोड़, चोट, मांसपेशियों में ऐंठन होने से उत्पन्न पीड़ा, कटिशूल, पार्श्वशूल एवं जीर्ण कास, बच्चों की खाँसी, फुफ्फुसपाक एवं फुफ्फुसावरणशोथ आदि में इसकी मालिश की जाती है। जननेन्द्रिय कण्डू एवं विचर्चिका में यसद् भस्म एवं कपूर तैल में मिलाकर लगाते हैं। दाँत में गढ़ा होने के कारण दर्द होता हो तो कपूर का मद्यसार में घोल बनाकर उसका फाहा गढ़े में रखते हैं। मुखदुर्गन्धि में स्वल्प खदिरवटिका (भै० र०) अथवा कपूर, कबाबचीनी एवं टंकणक्षार की गोली मुख में रखने से लाभ होता है। दन्तमंजनों में कपूर का उपयोग किया जाता है। जीर्ण व्रणों में तथा कण्डू में इसका अवचूर्णन किया जाता है। विषैला प्रभाव—अत्यधिक मात्रा में कपूर के सेवन से आमाशयोर्ध्व भाग में पीड़ा, हल्लास, कभी-कभी वमन, चक्कर, दृष्टिमान्द्य, प्रलाप, उन्माद, अपस्मार के समान आक्षेप, श्यावता, अंगघात, शीतलप्रस्वेद, मूत्रकृच्छ्र, संन्यास एवं मृत्यु होती है। विष चिकित्सा—वामक द्रव्यों का प्रयोग एवं शीत तथा उष्ण निरूहण बस्ति का क्रम से बारंबार प्रयोग तथा प्रतिक्षोभक, विरेचक एवं उत्तेजक औषधियों का प्रयोग करना चाहिये। कुपीलु सत्त्व का सूचिकाभरण आवश्यकतानुसार किया जाता है। मद्यसार एवं तैलीय पदार्थों का प्रयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि कपूर उनमें घुल जाता है। जीर्ण विषैला प्रभाव—कुछ युवा स्त्रियों में सौन्दर्य वृद्धि के लिये कपूर खाने की आदत पड़ जाती है जिसको छुड़ाना कठिन होता है। इसके कारण साधारण मानसिक उत्तेजना, तन्द्रा, अत्यधिक दौर्बल्य एवं पाण्डुता आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। नोट—कपूर का चूर्ण बनाने के लिये खरल में घोटते समय रेक्टिफाइड स्पिरिट से कपूर आर्द्र कर लेने से आसानी से चूर्ण बन जाता है तथा खरल में चिपकता नहीं। मात्रा—१-२ रत्ती; आसव—५-२० बूँद; कर्पूराम्बु—१-२ औंस। अथ कस्तूरी । तस्या नामभेदगुणानाह औंस मृगनाभिर्मृगमदः कथितस्तु सहस्रभित् । कस्तूरिका च कस्तूरी वेधमुख्या च सा स्मृता ।।५।। कामरूपोद्भवा कृष्णा नेपाली नीलवर्णयुक् । काश्मीरी कपिलच्छाया कस्तूरी त्रिविधा स्मृता ।।६।। कामरूपोद्भवा श्रेष्ठा नेपाली मध्यमा भवेत् । काश्मीरदेशसम्भूता कस्तूरी ह्यधमा मता ।।७।। कस्तूरिका कटुस्तिक्ता क्षारोष्णा शुक्रला गुरुः । कफवातविषच्छर्दिशीतदौर्गन्ध्यशोषहृत् ।।८।। कस्तूरी के नाम, भेद तथा गुण—मृगनाभि, मृगमद, सहस्रभिद्, कस्तूरिका, कस्तूरी और वेधमुख्या ये सब कस्तूरी के संस्कृत नाम हैं। वर्णभेद से कस्तूरी तीन प्रकार की होती है जैसे—(१) कामरूप (कामरूपदेश) में उत्पन्न होने वाली कस्तूरी कृष्णवर्ण की (काली) होती है। (२) नेपाल देश में उत्पन्न होनेवाली नीले रङ्ग की होती है। (३) कश्मीर देश में उत्पन्न होने वाली कपिल वर्ण की होती है। इनमें से कामरूप देश की कस्तूरी उत्तम, नेपाल देश की मध्यम एवम् कश्मीर देश की अधम गुण वाली होती है। कस्तूरी—कटु तथा तिक्त रस युक्त, क्षार गुण विशिष्ट, उष्णवीर्य, वीर्यजनक और गुरु होती है। यह कफ, वायु, विष, वमन, शीत, दुर्गन्ध और शोष को दूर करने वाली होती है। [५-८] ३. कस्तूरी हिं०—कस्तूरी, मृगनाभि, मृगनाफा। बं०—मृगनाभि। ते०—कास्तूरी। म०—गु०—क०—ता०—कस्तूरी। फा०— मुष्क। अं०—Musk (मस्क)। ले०—Moschus (मोस्कस्)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३६७ हिरन की कई जातियां होती हैं किन्तु सब जाति के हिरनों से कस्तूरी नहीं निकलती। जिस हिरन से कस्तूरी निकलती है उसको संस्कृत में 'कस्तूरीमृग', यूनानी में 'हिनमुस्की' और लेटिन में मोस्कस् मोस्कीफेरस् (Moschus moschiferus; Fam. Cervidae) कहते हैं। यह मृग उत्तरी भारत, नेपाल, आसाम, कश्मीर, मध्य एशिया, तिब्बत, भूटान, चीन एवं रूस आदि स्थानों में ७०००-८००० फीट ऊँची पहाड़ी चोटियों पर सघन जंगलों में पाया जाता है। यह विशेष कर तिब्बत में अधिक होते हैं। यह हिरन की जाति का बहुत सुहावना और सुन्दर मृग होता है किन्तु न इसके सींग होते हैं न दुम। यह मृग करीब २० इञ्च ऊँचा, लौह के समान गहरे धूसर वर्ण का, अत्यन्त सशंक स्वभाव का प्राणी होता है। इसके ऊपरी जबड़े में दो लंबे दंष्ट्र होते हैं जो बाहर नीचे की ओर हुक की तरह निकले रहते हैं। इसका मुँह लंबा, पैर पतले तथा सीधे एवं बाल रूखे और लम्बे होते हैं। इसके लिंगेन्द्रिय के मणि को ढाँकने वाले चमड़े के प्रवर्धन से बनी हुई एक थैली होती है जिसके सूखे हुये स्राव को 'कस्तूरी' कहते हैं। नर हिरन में ही यह पायी जाती है। यह थैली नाभि के पास, नाभि एवं शिश्नावरण के बीच में स्थित रहती है। यह अंडाकार, १ १/४-३ इञ्च लम्बी एवं १-२ इञ्च चौड़ी होती है। इसके अग्रभाग में केशयुक्त एक छोटा सा छिद्र होता है तथा पिछले भाग में एक सिकुड़न सी होती है जो शिश्नाग्रचर्म के मुख से मिल जाती है। इसके अन्दर के चिकने आवरण की अनियमित तहों के कारण यह कई अपूर्ण विभागों में बटी होती है। कस्तूरी, युवावस्था के मृगों में उनके मदकाल (Rutting season) में अधिक मात्रा में होती है तथा उसी समय उसकी शक्ति एवं गन्ध अधिक रहती है। यह काल करीब १ महीने का होता है। रा० नि० में भी लिखा है कि-‘वाले जरति च हरिणे क्षीणे रोगिणि च मन्दगन्धयुता। कामातुरे च तरुणे कस्तूरी बहलपरिमला भवति।' बालक, वृद्ध, क्षीण और रोगी हिरन को कस्तूरी मन्द गन्ध वाली होती है तथा कामातुर और तरुण हिरन की कस्तूरी अत्यन्त सुगन्धित होती है। जब उक्त हिरन की नाभि में कस्तूरी बन जाती है तब उसमें से कस्तूरी की गन्ध आती है और वह मृग किसी दूसरे पदार्थ की गन्ध समझ कर इधर-उधर घूम-घूम कर वृक्षों को सूँघा करता है जिससे बहेलिये आसानी से पहचान कर उसको मार डालते हैं। १ साल के बच्चे में कस्तूरी नहीं होती तथा २ साल के बच्चे में करीब ६-७ माशे होती है जो दुधिया रहती है। वृद्ध प्राणी में भी ७ माशे से अधिक नहीं होती। इसमें सुगन्ध ही एक मनोहर गुण है जो बहुत तीव्र स्वतन्त्र प्रकार की और शीघ्र फैलने वाली होती है। इसका स्वाद सुगन्ध युक्त कड़वा होता है। कस्तूरी के प्रकार १- मृग के शिकार के बाद इन नाभों को निकाल कर धूप एवं हवा में सुखाते हैं। फिर इन नाभों को मृग के बालों में लपेट कर चमड़े की थैलियों में बन्द किया जाता है तथा बाद में सीलबन्द डब्बों में या अन्दर से टीन का अस्तर लगे हुये लकड़ी के बक्सों में बन्द कर बाहर भेजा जाता है। व्यापार की कस्तूरी तीन प्रकार की होती है। (१) रूस की कस्तूरी—इसमें गन्ध बहुत कम होती है। (२) आसाम की कस्तूरी—यह बहुत अच्छी तथा तीव्र गन्ध युक्त होती है तथा इसका रंग काला होता है। सम्भवतः प्राचीनों ने कामरूप कस्तूरी इसी को कहा है। (३) चीन की कस्तूरी—यह सबसे महँगी होती है क्योंकि अन्य हीन श्रेणी की कस्तूरी में जो कभी-कभी अमोनिया आदि की अप्रिय गन्ध होती हैं वह इसमें बिलकुल नहीं होती। यह कस्तूरी तिब्बत से ही चीन को जाती है। एक अन्य तीक्ष्ण अप्रिय गन्ध वाली कस्तूरी कॅबर्डाइन् नामक होती है जो मंगोलिया एवं मंचूरिया के उत्तरी भाग तथा पूर्वी साइबेरिया से आती है। उत्तम कस्तूरी—रक्ताभश्याम वर्ण की, गोल बड़े दानेवाली, तीक्ष्ण गन्ध वाली, स्वाद में तिक्त, हलकी एवं मुलायम कस्तूरी उत्तम होती है। इसकी गन्ध बहुत स्थायी रहती है तथा ३००० गुना विरल (Dilute) करने पर भी १. कपिला पिङ्गला कृष्णा कस्तूरी त्रिविधा क्रमात्। नेपालेऽपि च काश्मीरे कामरूपे च जायते ॥ साऽप्येका खरिका ततश्च तिलका ज्ञेया कुलित्थाऽपरा, पिण्डाऽन्यापि च नायिकेति च परा या पञ्चभेदाभिधा। सा शुद्धा मृगनाभितः क्रमशवादेषा क्षितीशोचिता पक्षत्यादिनिद्रन्त्रयेषु जनिता कस्तूरिका स्तूयते ॥ चूर्णाकृतिस्तु खरिका तिलका तिलाभा, कौलत्थबीजसदृशी च कुलित्थिका च। स्थूला ततः कियदिदं किल पिण्डिकाख्या तस्याश्च किंचिदधिका यदि नायिका सा ॥ रा० नि० ।