भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३४९ समुद्र के खारे पानी से बनाये हुए नमक को समुद्र नमक कहते हैं। भारत में आवश्यक नमक का ३७% भाग बंबई के समुद्री तट से निर्मित होता है। नमक निकालने के लिये विभिन्न देशों में हवा की उष्णता के अनुसार विभिन्न पद्धतियाँ काम में लाई जाती हैं। समुद्र के किनारे पर छोटे-छोटे गढ़े बनाते हैं जिसमें समुद्र का जल धीरे-धीरे भरता है। सूर्य की गरमी से उसमें का जलीय अंश सूखने लगता है। १०० भाग जल में ३७ भाग नमक घुलता है। नमक को घुलने के लिये जितने जल की आवश्यकता होती है उससे कम जल जब सूख कर रह जाता है तब उसमें का नमक अलग होकर नीचे जमने लगता है। जैसे-जैसे नमक जमता है वैसे-वैसे उसे निकल कर जमा करते जाते हैं। उस नमक की राशि में से मॅग्नेश्यिम् क्लोराइड् (Magnesium chloride) निस्यंदित होकर निकल जाता है। समुद्री जल में खाने के नमक के साथ पोटाश्यिम् क्लोराइड (Potassium chloride), मॅग्नेश्यिम् क्लोराइड् (Magnesium chloride), मॅग्नेश्यिम् सल्फेट् (Magnesium sulphate) एवं कॅल्शियम सल्फेट् (Calcium sulphate) आदि द्रव्य रहते हैं जो खाने के नमक निकालने के बाद उस जल में रह जाते हैं। इस कड़वे जल में से इन पदार्थों को विभिन्न पद्धतियों से अलग कर लेते हैं। बाजारू समुद्री नमक कुछ आर्द्र रहता है उसका कारण यह है कि उसमें मॅग्नेश्यम् एवं कॅल्शियम क्लोराइड्स के कुछ अंश रह जाते हैं। शुद्ध नमक आर्द्र नहीं होता तथा इसका १ भाग २ ३/४ भाग जल में घुल जाता है। गुण और प्रयोग-सामुद्र लवण के गुण सैंधव के समान होते हुवे भी इसमें जो अन्य पदार्थ रहते हैं उनके कारण कुछ अंतर पड़ता है। (१) समुद्र में स्नान करने से जो चुनचुनाइट होती है उसके कारण शरीर का रक्त प्रवाह बढ़ जाता है तथा उससे शरीर में स्फूर्ति मालूम पड़ती है। (२) समुद्री जल का मांसपेश्यन्तर्गत सूचिकाभरण अजीर्ण, शोथ, जीर्ण चर्मविकार तथा बच्चों के पाचनसंस्थान के विकारों में लाभदायक माना जाता है। (३) समुद्री नमक में आयोडिन (Iodine) रहने के कारण गलगण्ड (Goitre) के प्रतिबंधन की दृष्टि से इसका उपयोग लाभदायक माना जाता है। (४) पाण्डु, आमाशयिक व्रण, प्रतिश्याय वातनाड़ीशोथ, नाड्यवसन्नता एवं पचनसंस्थान की दुर्बलता में समुद्री जल का उपयोग रोगनाशकरूप में किया जाता है। फ्रांस में बच्चों की जीवनी शक्ति (Vitality) बढ़ाने के लिये इसका प्रयोग करते हैं। अथ बिडलवणम् (बिरियासंचर)। तस्य नामगुणानाह बिडं पाक्यञ्च कृतकं तथा द्राविडमासुरम्। बिडं सक्षारमूर्ध्वाध कफवातानुलोमनम् ।।२४६।। बिरिया संचर नमक के नाम तथा गुण-विड, पाक्य, कृतक, द्राविड तथा आसुर ये सब बिरिया संचर नमक के संस्कृत नाम हैं। बिरिया संचर नमक-क्षार गुण युक्त (विकृत त्वचा मांसादिकों को गला कर दूर करने वाला) होता है तथा ऊपर (मुखादि) के मार्ग से कफ एवम् नीचे (गुदादि) के मार्ग से वायु का अनुलोमन करने वाला अर्थात् कफ को मुखादि से निकालने वाला और अपान वायु को अधोगामी करने वाला होता है ।।२४६] ❖ ऊर्ध्व कफमधो वातं सञ्चारयेदित्यर्थः ।।२४६।। यहाँ पर 'ऊर्ध्वाधःकफवातानुलोमनम्' का-'ऊपर मुखादि की ओर कफ को एवं नीचे गुदादि की ओर अपान वायु को संचारित करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये । [२४६] दीपनं लघु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं रुच्यं व्यवायि च। विबन्धानाहविष्टम्भहृद्गौरवशूलनुत् ।।२४७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA