भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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३५० भावप्रकाशनिघण्टुः बिरिया संचर नमक-अग्निदीपक, लघु (शीघ्र पच जाने वाला) तीक्ष्ण तथा उष्ण वीर्य, रूक्ष, रुचिकारक, व्यवायि (परिपक्व होने के पहले ही शरीर में प्रभाव दिखाने वाला), विबन्ध, आनाह, विष्टम्भ, हृद्रोग, शरीर की गुरुता तथा शूल को नष्ट करने वाला भी होता है। [२४७] ८९. बिरिया संचर नमक हिं०-बिरिया (आ) नमक, बिरिया संचर नमक, बिरिया सोंचर नमक, कटीला नमक, कालानमक। बं०- विटनुन। म०-पादेलोण, विडलोण। गु०-विड लवण। विडलवण क्या है इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। श्रीयुत् द० अ० कुलकर्णी जी ने अपनी रसरत्नसमुच्चय की टीका में इसका स्पष्टीकरण किया है। जो क्षार, अम्ल, गंधक तथा नमक आदि पदार्थ पारद में दिये हुवे ग्रास को जीर्ण करने के लिये प्रयुक्त होते थे उन्हें विड कहा जाता था। बाद में इस शब्द का प्रयोग अन्य धातुओं को पारद में जीर्ण कराने के लिये एवं भिन्न-भिन्न धातुओं के शोधन अथवा द्रावण के लिये प्रयुक्त द्रव्यों के लिये किया जाने लगा। इसके पश्चात् रसशास्त्र की अवनति के काल में उपर्युक्त दोनों अर्थ भूल गये और बिड का प्रयोग नमक के साथ करके बिडनमक के रूप में कालानमक के लिये आजकल किया जा रहा है। यह कालानमक मनुष्य के खाये हुवे ग्रास अथवा गुरु भोजन को जीर्ण अथवा हजम कराने में समर्थ होने के कारण विडनमक या कालानमक यह अर्थ ही अब व्यवहार में विशेष रूढ़ हो गया है। सुश्रुत की टीका में डल्हण लिखते हैं कि 'कृत्रिमं स्वनाम्ना ख्यातं, तच्च प्रसारिणी कल्कभक्तलवणसंयोगादग्निदाहेन निवृत्तम्' अर्थात् प्रसारिणी का कल्क, भात तथा नमक आदि को जलाकर बनाया हुआ नमक। गुजरात की ओर उपर्युक्त चीजों को गढ़े में डालकर जलाते हैं तथा १०, १५ दिन बाद उसमें से नमक के ढेले निकाल कर व्यवहार करते हैं। कुछ लोगों ने सौवर्चल लवण को कालानमक लिखा है। आजकल विडलवण नाम से जिस काले नमक का व्यवहार किया जाता है उसके बनाने की निम्नलिखित विधि है। यह हिसार जिले में भिवानी नामक ग्राम में अधिक बनाया जाता है। १ मन सेंधानमक तथा हर्रा, आँवला तथा सज्जीखार (व्यापार का सोडियम् कार्बोनेट) प्रत्येक आधा सेर लेकर सब चीजों को कूट कर एवं मिलाकर मिट्टी की हाँड़ियों में पकाते हैं। जब सब चीजें गलकर एक हो जाती हैं तब आँच को बन्द करके ठंडा होने पर नमक के ढोकों को निकाल लिया जाता है। एक अन्य विधि यह है कि २८ सेर सांभर नमक तथा ५० तो० आँवला चूर्ण को मिला कर उसका चतुर्थांश एक सँकरे मुँह को हाँड़ी में रखकर गरम करें तथा लाल होने पर बाकी चूर्ण में से थोड़ा-थोड़ा उस हाँड़ी में डालते जायँ। करीब ६ घण्टे पश्चात् २४ सेर के लगभग काला नमक तैयार हो जावेगा। यह काला नमक गहरे लाल काले से चमकीले रंग का, नमकीन एवं विशिष्ट गंधयुक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रधानतया (९५%) खाने का नमक तथा अत्यल्प मात्रा में खारी नोंन (Sodium Sulphate-सोडियम् सल्फेट), ॲल्यूमिना, मॅग्नेशिया, फेरिक् ऑक्साइड् एवं आयर्न सल्फाइड् आदि पदार्थ पाये जाते हैं। इसकी गन्ध इसके आयर्न सल्फाइड् के कारण रहती है लेकिन इसमें यह बहुत अल्प (१०० में १ से कम) मात्रा में रहता है। गुण और प्रयोग-यह अग्निदीपक, वातानुलोमक, विरेचक एवं बल्य है। इसका प्रयोग प्लीहावृद्धि, यकृत विकार, आध्मान, शूल, अपचन एवं अन्य आंत्रिक विकारों में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA