भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 402, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३५१ अथ सौवर्चलं लवणम् । तस्य नामगुणानाह सौवर्चलं स्याद् रुचकं मन्थपाकञ्च तन्मतम्¹। रुचकं रोचनं भेदि दीपनं पाचनं परम् ।।२४८।। सस्नेहं वातनुन्नातिपित्तलं विशदं लघु। उद्गारशुद्धिदं सूक्ष्मं विबन्धानाहशूलजित् ।।२४९।। काला नमक के नाम तथा गुण-सौवर्चल, रुचक और मन्थपाक ये सब काला नमक के संस्कृत नाम हैं। कालानमक-रोचक, भेदक, अग्निदीपक, अत्यन्त पाचक, स्नेहयुक्त, वातनाशक एवम् अत्यन्त पित्तजनक नहीं होता है। तथा यह विशद गुण युक्त, हलका, उद्गार (डकार) को शुद्ध करने वाला, सूक्ष्म (सूक्ष्म स्रोतोगामी), विबन्ध, आनाह तथा शूल का नाश करने वाला है। [२४८-२४९] ९०. सोंचर नमक हिं०-कालानमक, सोंचर नमक, चौहार कोड़ा, चोहार कोरानोन, चौहार कारा, चौहार काला। बं०-संचल लवण। म०-सोनचक मीठ। गु०-संचल। क०-चौवर्चल। ते०-नालु उपु। फा०-नमक सिया, नमक स्याह। यू०-नमक काला। अ०-माला अस्वद, मलह अस्वद। अं०-Black Salt (ब्लॅक साल्ट), Sochal Salt (सोचल साल्ट)। ले०-Unaqua Sodium Chloride (अनकुआ सोडियम् क्लोराइड)। जिस प्रकार विडलवण के सम्बन्ध में मतभेद है उसी तरह सौवर्चल लवण के सम्बन्ध में भी मतभेद है। कुछ लोगों ने इसे काललवण लिखा है। कुछ लोगों ने यह लिखा है कि जो सौवर्चल निर्गन्ध होता है वह काललवण है तथा वह दक्षिण समुद्र के समीप बनता है। डॉ० देसाई लिखते हैं 'रसग्रन्थों में सौवर्चल नाम शोरे को दिया गया है। सु = सुष्ठु, वर्चः = दिप्ति, अल् = प्राप्ति, सर्वथा अलति अनेन इति सौवर्चलं = जिसके कारण भली प्रकार प्रकाश पड़ता है अर्थात् 'वह्न्युत्तेजक'। श्रीयुत् द० अ० कुलकर्णीजी लिखते हैं 'जिस मिट्टी से शोरा प्राप्त किया जाता है उसे लुनिया मिट्टी कहते हैं तथा उस मिट्टी में कुछ खाने का नमक भी रहता है जिसे अलग कर लिया जाता है। ऐसे नमक में कुछ शोरे का अंश रहता है। शोरे के साथ-साथ पैदा होने के कारण तथा शोरे की कुछ मात्रा इसमें रहने के कारण इसको सोंचर अथवा सोवर्चल कहते हैं। सोंचर नमक बनाने की निम्नलिखित विधि प्रचलित है-सज्जी माटी को जल में घोल दिया जाता है फिर उसमें थोड़ा-थोड़ा खाने का नमक डालते जाते हैं और जितना घुलता है उतना घुलने देते हैं। फिर इस घोल को छानकर अग्नि से सुखाते हैं। यह कुछ गहरे रङ्ग का होता है। रासायनिक संगठन-इसमें खाने का नमक, खारी नोन (सोडा सल्फ) एवं सज्जीखार (कॉस्टिक सोडा) रहता है लेकिन सोडियम् कार्बोनेट नहीं रहता। गुण और प्रयोग-इसका उपयोग विड लवण के स्थान पर भी किया जाता है। यह अग्निदीपक, पाचक एवं विरेचक होता है। इसका उपयोग शूल, गुल्म, आन्त्रकृमि एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती। अथ खानिजं लवणम् । तस्य नामगुणानाह औद्भिदं पांशुलवणं यज्जातं भूमितः स्वयम् । क्षारं गुरु कटु स्निग्धं शीतलं वातनाशनम् ।। २५० ।। खानिज लवण अर्थात् रेहगवा नोन के नाम, उत्पत्ति तथा गुण-औद्भिद तथा पांशुलवण ये दो नाम संस्कृत में उस नमक का है जो कि जमीन से स्वयम् उत्पन्न होता है। रेहगवा नोन-क्षार गुणयुक्त गुरु, कटुरसयुक्त, स्निग्ध, शीतल और वातनाशक होता है। [२५०] १. 'अक्षपाकं च धातुमत्' इति पाठा० ।