भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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३५२ भावप्रकाशनिघण्टुः ९१. रेह का नमक हिं०-रेहगवा नोन, रेह का नमक, मटिया नोन, शोरा नोन। बं०-फूला लवण। जांगल देश की खारी भूमि में रेह उत्पन्न होती है। उत्तर प्रदेश, पञ्जाब, बिहार एवं बंगाल आदि प्रान्तों की ऊसर जमीन में भी रेह होती है। उसी रेह से बना हुआ नमक रेहगवा नोन कहलाता है। जिस प्रकार की मिट्टी होगी उसी प्रकार का नमक प्राप्त होता है। जिस मिट्टी से शोरा अलग किया जाता है उससे प्राप्त नमक में शोरे का अंश रहता है। ऐसे नमक को कुछ लोग सौवर्चल लवण मानते हैं। तथा सज्जी मिट्टी से प्राप्त नमक में सज्जीखार की कुछ मात्रा रहती है। इसे वे औद्भिद लवण या रेहगवा नोन मानते हैं। कुछ भी हो जो ऊसर मिट्टी से नमक निकाला जाता है उसे रेहगवा नोन कहा जाता है। यह नमक कुछ तीता, कड़वा एवं क्षारीय होता है। रासायनिक संगठन-इस नमक में काफी मात्रा में खारी नोन (सोडा सल्फ) तथा अल्प मात्रा में सोडियम् कार्बोनेट एवं मॅग्नेशियम् सल्फेट रहते हैं। गुण और प्रयोग-रोचक, दीपन एवं पाचन गुण के कारण सभी पाचन योगों में इसका व्यवहार किया जाता है। सामान्य मात्रा में मूत्रल भी होता है। योगों के अतिरिक्त स्वतन्त्र रूप में लवणों का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। वमन कराने के लिए प्रायः सैन्धव ही प्रयुक्त होता है। मात्रा-४ रत्ती से १ माशा। नोट-उपर्युक्त लवणों के अतिरिक्त चरक (वि० अ० ८) के लवण स्कन्ध में एवं सुश्रुत (सू० अ० ४६) में इतर विशिष्ट लवणों का उल्लेख किया गया है। अथ चणकाम्लकम्। तस्य गुणानाह चणकाम्लकमत्युष्णं दीपनं दन्तहर्षणम्। लवणानुरसं रुच्यं शूलाजीर्णविबन्धनुत् ।। २५१ ।। चनाखार के नाम तथा गुण-चनाखार को संस्कृत में चणकाम्ल कहते हैं। चणकाम्ल-अत्यन्त उष्णवीर्य, अग्निदीपक, दन्तहर्षण (दन्तहर्ष अर्थात् दाँतों में खट्टापन लग जाने से चबाने में असमर्थ कर देने वाला), कुछ लवण रस युक्त, रुचिकारक, शूल, अजीर्ण तथा विबन्ध को दूर करने वाला होता है। [२५१] ९२. चनाखार हिं०-चने का खारा, चनाखार, चनक लोनी, चने का सिरका। म०-हरभरयाची आँव। गु०-चणा नो खार। मार्गशीर्ष के महीने में जब चने के क्षुप लवण युक्त हो जाते हैं तब मलमल का सफेद कपड़ा लेकर प्रतिदिन प्रातःकाल उक्त क्षुपों पर फिर, उन पर पड़े हुए ओस की बूँदों से उसको तर कर सुखा दे। इस प्रकार एक मास करके उस कपड़े को पानी में खूब मलकर उसका अम्ल पदार्थ निकाल लें। फिर उस पानी को ५-७ घण्टे स्थिर छोड़ कर उसका पानी निथार लें। नीचे जमे हुए पदार्थ को सुखा लें और पानी को अग्नि पर औंटा कर उसको भी सुखा लें। फिर दोनों को एक में मिला कर सुरक्षित रख दें। उपर्युक्त विधि के अतिरिक्त केवल रात में या सुबह मलमल का कपड़ा चने के क्षुपों पर डाल कर सुबह उसको निचोड़ लेते हैं। जो द्रव प्राप्त होता है उसे उसी द्रव रूप में या सुखा कर काम में लाया जाता है। कुछ लोग क्षार-निर्माण विधि की तरह चने का क्षुप जलाकर उससे क्षार निकालते हैं वह गलत है क्योंकि उसमें तो केवल क्षार (पोटैशियम् कार्बोनेट) ही रहता है। यहाँ जो गुण दिये गये हैं वे अम्ल के हैं। इसलिये ऊपर दी हुई विधि से ही इसे बनाना चाहिये न कि क्षार रूप में। रासायनिक संगठन-यद्यपि इसे चनाखार लिखा गया है लेकिन इसमें अम्ल द्रव्य होते हैं। इसमें ऑक्झॅलिक् (Oxalic), मॅलिक् (Malic) एवं अॅसेटिकू (Acetic) आदि अम्ल पाये जाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA