भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३५३ गुण और प्रयोग-चणकाम्ल का उपयोग उदरशूल, अजीर्ण, बच्चों के आमातिसार, अग्निमांद्य, विबन्ध तथा कष्टार्तव में किया जाता है। इसको जल में मिला कर लू लगने पर तथा ज्वर में देने से तृषा, दाह एवं सन्ताप कम होता है। अजीर्ण में इसको सिरका के साथ मिला कर पिलाते हैं। लौंग तथा मिश्री के साथ इसको जल में मिलाकर हैजे में देने से लाभ होता है। मधुमेह एवं पथरी में इसका प्रयोग हानिकारक है। मात्रा-१-२ रत्ती या ५-१० बूंद। अथ यवक्षारः स्वर्जिका सुवर्चिका च । तन्नामगुणानाह पाक्यं क्षारो यवक्षारो यावशूको यवाग्रजः । स्वर्जिकाऽपि स्मृतः क्षारः कापोतः सुखवर्चकः ।। २५२ ।। कथितः स्वर्जिकाभेदो विशेषज्ञैः सुवर्चिका । यवक्षारो लघुः स्निग्धः सुसूक्ष्मो वह्निदीपनः ।। २५३ ।। निहन्ति शूलवातामश्लेष्मश्वासगलामयान् । पाण्ड्वर्शोग्रहणीगुल्मानाहप्लीहहृदामयान् ।। २५४।। स्वर्जिकाऽल्पगुणा तस्माद्विज्ञेया गुल्मशूलहृत् । सुवर्चिका स्वजिकावद् बोद्धव्या गुणतो जनैः ।। २५५ ।। जवाखार, सज्जी तथा सोरा के नाम और गुण-पाक्य, क्षार, यवक्षार, यावशूक और यवाग्रज ये सब जवाखार के संस्कृत नाम हैं। स्वर्जिका, क्षार, कापोत और सुखवर्चक ये सब सज्जी के संस्कृत नाम हैं। जवाखार की भाँति इसका भी संस्कृत में क्षार नाम है। द्रव्यों की विशेषताओं के ज्ञाता वैद्य जन सोरा को सज्जी का ही भेद बतलाते हैं। इसे संस्कृत में सुवर्चिका कहते हैं। जवाखार-लघु, स्निग्ध, अत्यन्त सूक्ष्म (सूक्ष्म स्रोतोगामी) तथा अग्निदीपक होता है एवम् यह शूल, वायु, आम, कफ, श्वास, गलरोग, पाण्डुरोग, बवासीर, संग्रहणी, गुल्म, आनाह, प्लीहा और हृद्रोग का नाश करता है। सज्जी-इसे जवाखार की अपेक्षा न्यून गुणवाली तथा विशेष करके गुल्म तथा शूल को दूर करने वाली समझना चाहिये। सुवर्चिका-(सोरा) इसे लोग गुणों में सज्जी के समान ही समझें, ऐसा वैद्यों का मत है। [२५२-२५५] ९३. जवाखार हिं०-जवाखार, जवखार। बं०-यवक्षार। म०-झाडाचे मीठ, जवाखार। गु०-जवाखार, खारो। ता०- मरवप्पु। ते०-मानुवप्पु। मल०-कारम्। क०-मरदउप्पु। अं०-Impure carbonate of potash (इम्प्योअर कार्बनेट ऑफ पोटॅश्)। ले०-Potasii carbonas (पोटॅसाइ कार्बोनस्)। जब यव क्षुपों पर बाल निकलने वाले हों तब पञ्चांग को संग्रह कर सुखा दें। और सुखाने पर आग लगा कर राख बना उसको २४ घंटे आठगुने पानी में भिगो दें। यदि पञ्चांग जलाने के बाद उसकी राख काली रहे तो जल में डालने के पूर्व उसे कढ़ाई में डाल कर राख सफेद होने तक पकाना चाहिए। फिर ऊपर का स्वच्छ जल निथार लें अथवा फिल्टर से पानी को छान लें। उस स्वच्छ जल को किसी कलईदार कड़ाही में अग्नि पर पकावें। पानी सूखने पर कड़ाही में जमे हुए क्षार को खुरच कर सुरक्षित रखें। इसी को जवाखार कहते हैं। यवक्षार नाम से औषध में उपर्युक्त विधि से तैयार किये हुए क्षार का व्यवहार करना चाहिये। इस क्षार में अधिकांश मात्रा पोटैशियम् कार्बोनेट (Potassium carbonate) की रहती है तथा कुछ अन्य पदार्थ भी रहते हैं। इसी प्रकार अधिकांश वृक्षों की राख में पोटैशियम् कार्बोनेट रहता है। तथा उनके अन्दर रहने वाले अन्य विभिन्न पदार्थों के कारण विभिन्न क्षारों के गुणों में अन्तर पाया जाता है। काष्ठमय झाड़ियों की अपेक्षा रसयुक्त वर्षायु क्षुपों में यह अधिक पाया जाता है। व्यापार की दृष्टि से पोटैशियम् कार्बोनेट्, आर्टिमिसिआ या वर्मवुड् (Artemisia; Wormwod) नामक वृक्षों से, वीट-रूट् (Beet-root) से, भेंड़ के बालों को धो कर उस घोल से, सोराखार से एवं पोटैशियम् सल्फेट (Potassium sulphate) आदि से प्राप्त किया जाता है। भूमि में पोटैशियम् के लवण रहते हैं। वृक्ष भूमि से इनका शोषण कर लेते हैं। इनके बिना वृक्षों की वृद्धि नहीं होती। २६ भाव.I