भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 405

३५४ भावप्रकाशनिघण्टुः उपर्युक्त क्षार मृदुक्षार कहलाता है। तीक्ष्ण क्षार बनाने के लिये क्षारोदक (वृक्ष को जला कर बनाई राख के जलीय भाग) में चूना मिलाना चाहिये तथा बाद में उस घोल को सुखाना चाहिये। यह अत्यन्त दाहक होता है तथा इसमें पोटैशियम् हाइड्रोऑक्साइड् रहता है। यवक्षार का स्वाद राखी के समान किन्तु कुछ नमकीन होता है। गुण और प्रयोग-यवक्षार अग्निदीपक, मृदुविरेचक, अम्लतानाशक, रक्तशोधक, सौम्यमूत्रल, कफनिःसारक एवं कुछ स्वेदजनक है। इसका उपयोग शूल, अजीर्ण, अम्लपित्त, अम्लोत्कर्ष, मूत्रकृच्छ्र, यकृत् प्लीहा एवं अन्यग्रन्थियों की वृद्धि, ज्वर, अर्श, कामला एवं गुल्म में किया जाता है। (१) जीर्ण आमाशयशोथ तथा आमाशय में श्लेष्मा की अधिकता होने पर भोजन के २० मिनट पूर्व यवक्षार का उपयोग अन्य सुगन्धित एवं तिक्त औषधों के साथ किया जाता है जिससे श्लेष्मा कम हो कर पाचक स्रावों की उत्पत्ति होती है तथा पाचन ठीक होता है। परिणाम शूल एवं अम्लपित्त आदि विकारों में भोजन के २ घंटे पश्चात् इसके उपयोग से अम्लता की अधिकता से होने वाला शूल नहीं होता। नींबू के रस के साथ फेनायमान मिश्रण के रूप में लेने से आमाशय पर शामक प्रभाव होकर वमन में लाभ होता है। (२) यकृत्, प्लीहावृद्धि एवं गुल्म आदि में बड़ाहर्रा, रोहितक की छाल एवं छोटी पीप के क्वाथ के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इसके उपयोग से आन्त्रिक श्लेष्मा कम होकर पित्त मार्ग का अवरोध दूर होने से कामला में लाभ होता है। (३) इसके उपयोग से कफ पतला होकर निकलने लगता है। शुष्क कास तथा श्वसनिकाशोथ आदि में ४ रत्ती यवक्षार, १० बूँद अडूसा का रस तथा २ रत्ती लौंग का चूर्ण देने से लाभ होता है। (४) ज्वर तथा अम्लोत्कर्ष की अवस्थाओं में इसका उपयोग किया जाता है। ज्वर में स्वेदल रूप में पसीना लाने के लिये नीम के रस या क्वाथ के साथ इसका उपयोग लाभदायक है। (५) इससे वृक्कों को उत्तेजना मिलने से मूत्रोत्सर्ग अधिक होता है। मूत्रकृच्छ्रता में इससे प्रक्षोभ का शमन होकर पेशाब की जलन दूर होती है। मूत्र की प्रतिक्रिया क्षारीय होने से यूरिक् एसिड (Uric acid) का उत्सर्ग अधिक होकर आमवात, वातरक्त तथा यूरिक् एसिड से बनने वाली पथरी में लाभ होता है। (६) इसके घोल का बाह्य प्रयोग शीतपित्त, उदर्द, खुजली, श्वित्र, विचर्चिका एवं कीटदंश पर किया जाता है। इससे त्वचा के ऊपर का तैलीय अंश घुल कर निकल जाता है जिससे सादे जल की अपेक्षा इसके घोल से त्वचा अधिक साफ हो जाती है। अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से अतिसार, शोथ, फॉस्फेट्स से बनने वाली पथरी आदि व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं तथा वृक्क भी विकारग्रस्त हो जाते हैं। मात्रा-१-२ रत्ती। ९४. सज्जी हिं०-सज्जी, सज्जीखार, सज्जीमिट्टी। बं०-साजिखार, साजीमाटी, साजी खारु। म०-सज्जीखार, साजी। मा०-साजीक्षार। गु०-साजीखार। क०-साजीखारुं, साजी खार, सज्जीखार। ता०-सज्जीकारं। पं०-सज्जी, लोटा सज्जी, खगनखार। फा०-संजार कलिया, अशखार। अ०-कलिमास्कर, कलिवशब्बुल असफर। अं०- Barilla (बॅरिल्ला-खारे वृक्ष की राख); Impure Carbonate of Soda (इम्प्योअर कार्बोनेट ऑफ् सोडा)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

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