भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 406, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरीतक्यादिवर्गः ३५५ सज्जी—सफेदी लिए भूरे रंग का एक प्रसिद्ध खार है। औषध के अतिरिक्त काँच, साबुन एवं कागज आदि अनेक पदार्थों के निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है। सज्जी कई प्रकार से बनाई जाती है जिनका संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है। (१) समुद्र के किनारे तथा क्षारीय भूमि में उत्पन्न होने वाले कुछ वृक्ष होते हैं, उनकी राख में सज्जी होती है। समुद्र के सेवार में भी सज्जी होती है जिसकी राख को केल्प (Kelp) कहा जाता है। ये स्पंज के समान कड़े गट्ठे होते हैं तथा इसमें ३-८% सज्जी होती है। खारे वृक्षों की राख को खार सज्जी (Barila-बरिला) कहा जाता है जिनमें २५-४०% सज्जी होती है। भारतवर्ष में निम्नलिखित तीन वर्ग के खारे वृक्ष पाये जाते हैं—चिनोपोडिएसी Chenopodiaceae, सैलिकोर्निसी (Salicorniceae) एवं (Salsolaceae) सॅल्सोलेसी। पंजाब में अक्तूबर से जनवरी तक सज्जी बनाने के कारखाने काम करते हैं। खारे वृक्षों को सुखाकर ६ फीट गोल एवं ३ फीट गहरे गढ़े में डालकर धीरे-धीरे जलाते हैं। गढ़े में हाँड़ियों को नीचे छेद कर उल्टे मुँह रखते हैं। कुछ समय बाद राख में से पतला द्रव निकल कर हाँड़ियों में जमता है। ४ दिन वैसे ही अपने आप ठंडा होने देते हैं। हाँड़ियों में जो सज्जी जमा होती है उसे वहाँ लोटासज्जी कहा जाता है। हाँड़ियों के बाहर जो सज्जी जमती है वह अशुद्ध होती है। लोटासज्जी कॅरोक्साइडॉन् ग्रिफिथिआइ (Caroxylon Griffithii) नामक वृक्ष से बनाई जाती है। यह सबसे शुद्ध होती है तथा औषध में इसका व्यवहार किया जाता है। मांटगोमरी प्रांत में इसे खगनखार कहा जाता है। दूसरे वृक्षों से प्राप्त सज्जी जो हलके दर्जे की होती है उसे भूत्नीसज्जी कहते हैं। लोटासज्जी को औषध में व्यवहार में लाने के पूर्व शोधन कर लेना चाहिये। इसके लिये इसे दुगुने जल में बंद पात्र में २ घंटे उबालते हैं तथा बार-बार हिलाते जाते हैं। फिर ऊपर के गरम तरल भाग को छान कर तामचीनी को कढ़ाइयों में मन्द आँच पर सुखाते हैं। बचे हुये नीचे के भाग में फिर जल डालकर उबाल कर ऊपर का द्रव छान कर सुखाते हैं। इस प्रकार प्राप्त हुई सज्जी को फिर उष्ण जल में घोल कर सुखाते हैं जिससे सइके रवे बनते हैं। इन्हें बंद बोतलों में रखना चाहिये। (२) भारतवर्ष के अनेक प्रान्तों में ऊसर अथवा रेहाल भूमि होती है। ऐसी भूमि में सज्जी, खारीनोन (सोडियम् सल्फेट), नमक एवं सोरा आदि मिले रहते हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों की रेह में इनकी मात्रा कम ज्यादा हुआ करती है तथा और भी कुछ पदार्थ उसमें रहते हैं। जिस रेह में सज्जी की अधिकता होती है उसे सज्जी माटी या धोबी की मट्टी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश में गंगा और जमुना नदी के बीच के प्रदेश में रेह बहुत होती है। इसमें ८८% सज्जी होती है। जिस स्थान में रेह अधिक होती है वहाँ इसका जमीन पर बरफ की तरह सफेद स्तर स्पष्ट दिखलाई देता है। हिमालय से जो नदियाँ बहती आती हैं वे अपने साथ विभिन्न क्षार तथा लवणों को बहा ले आती हैं। ये आसपास की जमीन में जमा होते हैं। गरमी के दिनों में उष्णता से जब नीचे का जल ऊपर आता है तब उसके साथ ये क्षार ऊपर आकर जम जाते हैं। जिस रेह में सज्जी अधिक होती है उसे जल में घोल कर एवं निथार-छानकर सुखा लेते हैं। (३) मध्यप्रांत में लोणार तालाब से भी सज्जी बनाई जाती है। यह रेह से प्राप्त सज्जी से शुद्ध होती है। इस तालाब में सज्जी के बड़े-बड़े टुकड़े भी मिलते हैं तथा उसके जल को सुखाकर भी सज्जी प्राप्त करते हैं। इस तालाब से सोडियम् बाइकार्बोनेट (Sodium bicarbonate, Na H C O₃), सं०-द्रोणलवण भी प्राप्त होता है। इसको दोने में लेकर जमाते हैं। इसलिये इसे द्रोण लवण कहा जाता है। (४) उपर्युक्त विधियों के अतिरिक्त खाने के नमक एवं खारीनोन आदि से भी सज्जी बनाई जाती है। शुद्ध सज्जी को सुरतीखार कहा जाता है तथा बाजारी अशुद्ध सज्जी को बांगडखार कहते हैं। सर्वप्रथम लिखे हुए प्रकार की शुद्ध सज्जी का औषध में व्यवहार करना चाहिये। यह शुभ्र, गंधहीन, अस्वादु, कुछ नमकीन एवं ताजी अवस्था में रवेदार होती है। खुली हवा में रखने पर इस पर बुरादा जम जाता है। यह जल में विलेय लेकिन मद्यसार में अविलेय होती है।