भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-इसमें प्रधानतया सोडियम् कार्बोनेट (Sodium carbonate, Na₂ Co₃ 10 H₂O) रहता है। गुण और प्रयोग-सज्जी के गुण यवक्षार के गुणों के समान ही हैं किन्तु उससे यह कुछ हीनगुण युक्त है। यह दीपन, पाचन, मूत्रल, कफनिःसारक, अम्लतानाशक एवं आध्मानहर है। इसका उपयोग कास, श्वास, अजीर्ण, अम्लपित्त, शूल, आध्मान, मूत्रकृच्छ्र, आमवात एवं गुल्म आदि रोगों में किया जाता है। (१) अग्निमांद्य, अजीर्ण एवं परिणामशूल में सज्जीखार, यवक्षार एवं पञ्चलवण सब समान मात्रा में लेकर नींबू के रस की भावना देकर १० रत्ती की मात्रा में दिया जाता है। (३) अनेक चर्म रोगों में इसके हल्के घोल में अवगाहन कराया जाता है एवं जले हुए भाग पर १०% घोल की पट्टी रखने से पीड़ा शांत होती है। सज्जीखार एवं यवक्षार दोनों को जल में मिलाकर फोड़े पर लगाने से फोड़ा जल्दी फूटकर बह जाता है। मात्रा-१-२ रत्ती। नोट-पाश्चात्य चिकित्सा में यवक्षार (पोटैशियम् कार्बोनेट) एवं सज्जीखार (सोडियम् कार्बोनेट) की अपेक्षा आंतरिक प्रयोग के लिये पोटैशियम् बाइकार्बोनेट एवं सोडियम् बाइकार्बोनेट का अधिक प्रयोग किया जाता है क्योंकि ये अधिक सौम्य होते हैं। इनमें भी पोटैशियम् के लवण शरीर में एक निश्चित अनुपात में रहते हैं। जब तक इन्हें अत्यधिक मात्रा में या सिरा द्वारा प्रयोग नहीं करते तब तक इनके प्रभाव में विशेष अंतर दिखलाई नहीं देता। भारतवर्ष के लोणार तालाब की सज्जी में सोडियम् बाइ कार्बोनेट रहता है। ९५. सोरा (सुवर्चिका) सं०--सौराक्षार, सूर्यक्षार, सौवर्चल, वह्न्युत्तेजक, सुवर्चिका, कर्पूर शिलाजतु । हिं०--सोरा, कलमी सोरा, सोराखार । बं०--सोरा । गु०--सुरोखार । पं०--कल्मीशोर । ता०--पोत्तिवुप्पु । अ०--अब़कर । फा०--शोरा । अं०-- Saltpetre (साल्टपीटर = पहाड़ी नमक); Potassium Nitrate (पोटैशियम् नाइट्रेट) । ले०--Potassii Nitras (पोटॅसिआइ नाइट्रेट्रास्) । भारतवर्ष में सोरे की जानकारी बहुत दिनों से है। शुक्रनीति एवं रसार्णव में इसे सौवर्चल लिखा है। माधवविरचित आयुर्वेद-प्रकाश में सोरे को 'कर्पूराभं शिलाजतु सोराकाख्यं तु पाण्डुरम्' ऐसा लिखकर अग्निबाण में इसका उपयोग होता है, ऐसा लिखा है। रसपद्धति में 'श्वेतं शिलाजतु वह्न्युत्तेजकं' लिखा है तथा उचित रोगोपयोग भी दिया है। रसरत्नसमुच्चय में भी 'कर्पूर शिलाजतु' नाम से इसका उल्लेख है तथा गुण भी सोरे से मिलते हैं। इसका मारण अथवा सत्त्वपातन नहीं किया जाता' यह निर्देश ध्यान देने योग्य है। और भी अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख मिलता है। मूल में यह आया हैं कि 'सुवर्चिका स्वर्जिकावद् बोद्धव्या गुणतो जनैः' यह बात भ्रमात्मक मालूम होती है। या तो सज्जी का ही कोई भेद होगा जिसके लिए सुवर्चिका शब्द का प्रयोग भावप्रकाशकार ने किया हो या डॉ० देसाई के कथनानुसार 'भावप्रकाशकार का कथन गलत हो। इसी प्रकार 'सौवर्चल' शब्द के विषय में भी मतभेद है जिसके संबन्ध में सौवर्चल लवण के अन्तर्गत विवेचन किया गया है। यहाँ सोरे का वर्णन दिया जा रहा है। प्राचीनकाल में भारतवर्ष से सोरे के निर्यात का व्यापार बहुत था लेकिन अंग्रेजों के नियन्त्रण के कारण इसका व्यापार बहुत कम हो गया। यहाँ उत्तर हिन्दुस्तान, पंजाब, सिंध एवं गङ्गा नदी के बीच के प्रदेश तथा बिहार में यह बहुत उत्पन्न होता है। बिहार में तो यह सबसे अधिक उत्पन्न होता है। वहाँ पर जमीन पर ओस की तरह