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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

३६८ भावप्रकाशनिघण्टुः गन्ध मालूम हो जाती है। यह कहा जाता है कि शिकार के समय इसकी तीव्र गन्ध से शिकारियों के वातनाडी संस्थान, आँख एवं कान पर बुरा असर पड़ता है। चीनी व्यापारियों का कहना है कि मदकाल में जब मृग में कस्तूरी की गन्ध तीव्र हो जाती है तब उसके प्रक्षोभ के कारण वह अपने खुरों से उसे खुरच कर निकाल देता है। ऐसी कस्तूरी मृगों के आवास स्थानों में पड़ी हुई पाई जाती है। लेकिन ऐसी कस्तूरी बहुत कठिनाई से ही मिलती है। असली कस्तूरी की पहचान—कस्तूरी की माँग बहुत होने के कारण तथा कठिनाई से मिलने के कारण इसमें मिलावट की जाती है। असली कस्तूरी मिलना बहुत कठिन है। व्यापारी लोग सूखा हुआ रक्त, यकृत् तथा दाल, गेहूँ एवं जव के दाने आदि मिला देते हैं। केवल गन्ध से कस्तूरी की पहचान करना कठिन है क्योंकि इसके सम्पर्क में आये पदार्थ को यह सुगन्धित कर देती है। चीन तथा तिब्बती व्यापारियों के यहाँ पहचान की कुछ पद्धतियाँ प्रचलित हैं जो वैज्ञानिक न होते हुये भी कुछ हद तक उपयोगी हैं। (१) कस्तूरी के दानों को जल में डालने पर यदि दाने वैसे ही रहें तो असली और यदि वे घुल जायँ तो मिलावटी। रा० नि० में भी लिखा है 'यदप्सु न्यस्ता नैव वैवर्ण्यमीयात्कस्तूरी सा राजभोग्या प्रशस्ता' १। जिस कस्तूरी को जल में डालने पर उसके वर्ण में परिवर्तन नहीं होता वह उत्तम होती है। (२) जलते लकड़ी के.अंगारे पर कस्तूरी के दाने डालने पर यदि वह पिघल कर उसमें से बुदबुदे निकलें तो असली और यदि वह एक दम कड़ी होकर कोयला बन जाय तो नकली। रा० नि० में भी लिखा है कि 'दाहं या नैति वह्नौ शिमिशिमिति चिरं चर्मगन्धा हुताशे, सा कस्तूरी प्रशस्ता वरमृगतनुजा राजते राजभोग्या। (३) असली कस्तूरी को गाड़ दें तब भी उसकी गन्ध में कोई परिवर्तन नहीं होता। (४) असली कस्तूरी मुलायम होती है तथा मिलावट होने पर वह कड़ी होती है। (५) पंजाब की तरफ एक परीक्षा प्रचलित है कि हींग में एक तागे को डालकर निकालते हैं फिर उसे नाभे में डालकर निकालते हैं। यदि हींग की गन्ध उस तागे में रहे तो कस्तूरी नकली मानते हैं। (६) कागज में रखने पर इसके कागज में पीला दाग पड़ जाता है तथा जलने पर इसमें मूत्र की गन्ध आती है। (७) कपूर, हॅलेरियन, लहसुन, हाइड्रोसाइनिक् एसिड एवं अर्गट का चूर्ण आदि के सम्पर्क में आने पर कस्तूरी की गन्ध नष्ट हो जाती है। कृत्रिम कस्तूरी (Artificial or synthetic musk)—कस्तूरी की माँग बहुत होने के कारण तथा मृग का शिकार करते-करते कहीं उनकी जाति ही नष्ट न हो जाय इस डर से कृत्रिम रूप से कस्तूरी बनाने की तरफ वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट हुआ तथा रासायनिक विधि से कृत्रिम कस्तूरी अब बनाई जाने लगी है। कृत्रिम कस्तूरी पीताभश्वेत रंग की तथा रवेदार होती है। इनमें बहुत तीव्र तथा स्थायी गन्ध होती है जो कस्तूरी से मिलती-जुलती होते हुये भी प्राकृतिक कस्तूरी से अलग मालूम होती है। मस्क क्झाइलेन् [Musk xylene, C₆ (CH₃)₂ (C₄ H₉) (NO₂)₃]—यह परिवर्तनशील दो स्थायी एवं अस्थायी रवेदार स्वरूपों में प्राप्त होती है। मस्क कीटोन् [Musk ketone, C₆ (CH₃)₂ (C₄ H₉) (CO CH₃) (NO₂)₂]—इसकी गन्ध प्राकृतिक कस्तूरी से मिलती-जुलती होती है लेकिन मस्क क्झाइलेन के इतनी तीव्र नहीं होती। मस्क ॲम्ब्रेह्टी [Musk ambrette, C₆ H (C₄ H₉) (C H₃) (O CH₃) (N O₂)₂]— १. या स्निग्धा धूमगन्धा वहति विनिहिता पीततां पाथसोंऽत निःशेषं या निविष्टा भवति हुतवहे भस्मसादेव सद्यः। या च न्यस्ता तुलायां कलयति गुरुतां मर्दिता रूक्षतां च ज्ञेया कस्तूरिकेयं खलु कृतमतिभिः कृत्रिमा नैव सेव्याः॥ रा० नि०।

यह कृत्रिम कस्तूरी में सबसे अच्छी मानी जाती है। इनके अतिरिक्त ॲल्डिहाइड् मस्क (Aldehyde musk), साइनो मस्क (Cyano musk) एवं ॲझिमिडो मस्क (Azimido musk) आदि कृत्रिम कस्तूरी होती हैं जिनका क्वचित् प्रयोग होता है। कृत्रिम कस्तूरी विषैली नहीं होती तथा सुगन्धि के लिये अधिकतर व्यवहार में लाई जाती है लेकिन प्राकृतिक कस्तूरी की अपेक्षा यह हीन श्रेणी की होती है। अन्य प्राणियों एवं वनस्पतियों में कस्तूरी— कस्तूरी की गन्ध के समान गन्धवाले पदार्थ विभिन्न देशों में पाये जानेवाले अनेक प्रकार के प्राणियों एवं वनस्पतियों में पाये जाते हैं। ‘अमेरिकन कस्तूरी’ नाम से एक प्रकार के चूहे से प्राप्त द्रव्य का उपयोग सुगन्धि के लिये किया जाता है। कुछ प्राणियों के नाम आगे दिये जा रहे हैं—ॲण्टीलोप डॉरकस् (Antilope dorcas) नामक एक प्रकार का हिरन, कँप्रा आइबेक्स (Capra ibex) नामक बकरा जिसके रक्त में गन्ध होती है, मस्टेला फॉइना (Mustela foina) नामक नेवले के समान जानवर जिसकी विष्ठा में गन्ध होती है, ओव्हिबोस मॉसकॅटस् (Ovibos moschatus) नामक बैल जिसके मांस को भारतवर्ष में खाया जाता है, बॉस इण्डिकस् (Bos indicus) नामक एक बैल, डाइकॉटिलिज टॉरक्वेटस् (Dicotyles torquatus) नामक सूअर की जाति का प्राणी, ॲनस् मॉस्कॅटा (Anas moschata) नामक बत्तख, क्रोकोडाइलस् ह्लगैरिस् (Crocodilus vulgaris) नामक मगर, वाइवेरा सिवेट्टा (Viverra civetta) नामक गन्धमार्जार, कॅस्टर फाइबर (Castor fibre) नामक ऊद बिलाव तथा अनेक प्रकार के समुद्री कछुवे एवं सर्प। संसार के विभिन्न स्थानों में पाई जाने वाली अनेक वनस्पतियों में कस्तूरी की गन्ध पाई जाती है जिनमें से भारत में लताकस्तूरी के बीज, कुजई (Rosa moschata Herrm.—रोज़ा मास्केटा), कद्दू, ज़ूफह-यविस् (Hyssopus officinalis Linn.—हाइस्सोपस् ऑफिशिनॅलिस्), सीलोन में पाया जानेवाला बड़ा गोखरू तथा हींग की जाति का वृक्ष आदि अपने यहाँ पाये जाते हैं। यद्यपि उपर्युक्त अनेक जान्तव एवं वानस्पतिक द्रव्यों में कस्तूरी से मिलती-जुलती गन्ध आती है तथापि व्यापार में कस्तूरी का स्रोत कस्तूरी मृग ही है। रासायनिक संगठन— कस्तूरी को वाष्प के साथ आसवन (Distill) तथा शुद्ध करने से एक गाढा रंगहीन तेल प्राप्त होता है जिसमें कस्तूरी की बहुत तेज गन्ध होती है। यह तैल एक प्रकार का कीटोन (Ketone) है जिसे मस्कोन कहा जाता है। एक अन्य कीटोन भी इसमें होता है जिसके विषय में अभी अधिक ज्ञान नहीं है। इनके अतिरिक्त कस्तूरी में वसा, मोम, कोलेस्टेरिन, ओलीन, जिलेटिन एवं ॲल्ब्यूमिन सदृश पदार्थ, राल एवं अमोनिया आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गन्धक के तेजाब की वाष्प पर इसको सुखाने से इसकी गन्ध बिलकुल चली जाती है जो फिर से हवा एवं आर्द्रता के सम्पर्क में आने से आ जाती है। कस्तूरी में ८% राख पाई जाती है जिसमें सोडियम्, कॅल्शियम् के क्लोराइडस् रहते हैं। कस्तूरी मद्यसार में १०-२०% एवं जल में करीब ५०-७५% घुल जाती है। सौ डिग्री उष्णता पर सुखाने से २०- ३०% इसका तौल कम हो जाता है। गुण और प्रयोग— कस्तूरी कटु, तिक्त, उष्ण, वृष्य, बल्य, विषघ्न, सौमनस्यजनन, हृदय एवं मस्तिष्क के लिये बलप्रद, आक्षेपहर, उद्वेष्टननिरोधी तथा कफविकार, वातविकार, शीत, दुर्गन्ध एवं शोथ को दूर करने वाली होती है। यह सुषुम्नाशीर्ष के लिये अत्यन्त तीव्र उत्तेजक तथा निपात (Collapse) में बहुत लाभदायक मानी जाती है। इससे रक्तप्रवाह की वृद्धि होती है तथा नाड़ियों में तनाव (Tension) बढ़ता है। यह मूत्रजननेन्द्रिय एवं श्वसन केन्द्र के लिये उत्तेजक है। इससे प्रथम रक्तवह संस्थान एवं मस्तिष्क को उत्तेजना मिलती है तथा बाद में इसका मादक एवं स्वेदजनक प्रभाव दिखलाई देता है। वातप्रकृति के लोगों में यह ज्यादा प्रभावशाली होती है। इसका उत्सर्ग मूत्र, स्वेद एवं दुग्ध के द्वारा होता है। मुदालियर, डेविड एवं रेड्डी (१९२९) के प्रयोगों से यह देखा गया कि जिन लोगों में

३७० भावप्रकाशनिघण्टुः श्वेतकणापकर्ष (Leucopenia–ल्यूकोपेनिया) हुआ रहता है उनमें कस्तूरी के टिंक्चर के १०-२० बूँद १ औंस जल के साथ पिलाने से १/२-१ घण्टे में श्वेत कणों की वृद्धि होती है। स्वस्थ व्यक्ति में कम प्रभाव दिखलाई देता है। डॉ० कर्नल चोपरा लिखते हैं कि उपर्युक्त तथ्य गलत है। उनके प्रयोग में स्वस्थ एवं कालज्वर पीड़ित रोगियों में जिनमें श्वेतकणापकर्ष हुआ रहता है, १/२ र० कस्तूरी भोजन के २१/२ घण्टे पश्चात् खिलाकर उसके २, ३ घण्टे बाद उन लोगों की तथा उनके रक्त की परीक्षा की गई। सात दिन तक यह प्रयोग किया गया। उनके मत से नाड़ी की गति, रक्त का दबाव, तनाव, श्वेतकणों की संख्या आदि किसी में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। कुछ लोगों ने कस्तूरी खाने के बाद आमाशय में कुछ उष्णता तथा अच्छेपन का अनुभव किया जो प्रभाव किसी वातानुलोमक मिश्रण (Carminative mixture) की तरह मालूम होता था। कर्नल चोपरा के मत से कस्तूरी का हृदय, श्वसन एवं वातनाड़ीसंस्थान के लिये उत्तेजक एवं वृष्य प्रभाव कस्तूरी की तीव्र गंध के कारण नासिका द्वारा प्रत्यावर्त्तन क्रिया (Reflex-action–रिफ्लेक्स ॲक्शन) के कारण एवं आमाशय में कुछ प्रक्षोभ के कारण है लेकिन अपस्मार, कंपवात एवं बच्चों के आक्षेप में इसकी उपयोगिता का कोई आधार नहीं है। अपतन्त्रक आदि अन्य आक्षेपयुक्त रोगों में हींग, ह्वलेरियन आदि तीव्र गन्धयुक्त औषधों की तरह एवं कुकास तथा शूल आदि में अन्य सुगन्धि तैलों की तरह इसका प्रभाव पड़ता है। कर्नल चोपरा का कहना है कि कस्तूरी को वृथा अधिक महत्त्व दिया गया है और उसमें कोई विशेष औषधीय गुण नहीं है। उनका कहना है कि अधिकतर कस्तूरी मिलावटी होने कें कारण अत्यन्त विश्वस्त स्थानों से प्राप्त कस्तूरी का ही प्रयोग किया गया था। कस्तूरी को थोड़े से मद्यसार में घोंटकर फिर उसमें जल मिलाकर २४ घण्टे रख कर, छान कर प्रयोग किया गया। इसमें करीब ७०-७५% भाग घुल जाता है। कस्तूरी का उपयोग योषापस्मार, हिक्का, उद्वेष्टनयुक्त तमकश्वास, हृदय एवं मस्तिष्क की दुर्बलता, हृदय की धड़कन, वातिक उन्माद, अपस्मार, संन्यास, विस्मृति, पक्षाघात, अर्दित, शून्यता, कंपवात, कुकास, शूल, बच्चों के आक्षेप आदि वातिक तथा श्लैष्मिक विकारों में एवं उत्तेजक तथा हृद्य औषध के रूप में आन्त्रिक ज्वर, फुप्फुसपाक, श्वसनिका शोथ, प्लेग एवं मस्तिष्कावरण शोथ आदि में किया जाता है। हृदय की दुर्बलता के लिये चन्द्रोदय, बृहत् कस्तूरीभैरव का उपयोग बलामूल के साथ लाभदायक है। उद्वेष्टन निरोधि प्रभाव के कारण हनुस्तम्भ, जलसंत्रास, तीव्र श्वसनावरोध एवं कुकास आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। अन्य औषधों के साथ वाजीकरण के लिये इसका बहुत उपयोग करते हैं। दक्षिण के वैद्य बच्चों के आक्षेप में अफीम के साथ कस्तूरी का प्रयोग करते हैं। मन्दज्वर, जीर्णकास, दुर्बलता, वातरक्त एवं विसूचिका आदि में यह लाभदायक है। कस्तूरी का प्रयोग मधु के साथ अथवा मृगमदासव (भै० र०) के रूप में तथा मकरध्वज के साथ किया जाता है। उष्ण प्रकृति वालों के लिये यह हानिकारक तथा शिरःशूलजनक होती है तथा इसके दुष्परिणाम को दूर करने के लिये गुलाबजल एवं वंशलोचन का प्रयोग करना चाहिये। मात्रा—१-४ र०, आसव या टिंक्चर—१०-३० बूँद। अथ लताकस्तूरी (मुष्कबीज)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह लता कस्तूरिका तिक्ता स्वाद्वी वृष्या हिमा लघुः । चक्षुष्या छेदिनी श्लेष्मतृष्णावस्त्यास्यरोगहृत् ।।९।। लता कस्तूरी के गुण—लताकस्तूरी—तिक्त रस युक्त, सुस्वादु, वृष्य (वीर्यवर्धक), शीतवीर्य, लघु, नेत्रों के लिये हितकर, छेदक (गाढ़े कफादि का छेदन करने वाली), कफ, प्यास, बस्ति तथा मुखसम्बन्धी रोग को दूर करने वाली होती है ॥९॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३७१ ४. लता कस्तूरी हिं०, बं०-लताकस्तूरी, कस्तूरी दाना, मुष्कदाना। म०-कस्तूरीभेंडा। मा०-मुष्कदाणा। गु०-लता कस्तूरी। ते०-कर्पूरीभेंड। ता०-वेत्तिलै कस्तूरी, कट्टुक कस्तूरी। पं०-धोनार कस्तूरी। अ०-इब्बुलमि(मु) ष्क। फा०- मुष्कदाना। अं०-Musk-mallow (मस्क-मॅल्लो)। ले०-Hibiscus abelmoscheus, Linn. (हिबिस्कस् एबेल्-मोस्कस्, लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेंसी)। यह बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा विशेषकर इस देश के गरम प्रदेशों में उत्पन्न होती है। इसको बागों में लगाते हैं और यह आप ही आप जंगली भी उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-२-३ फुट तक ऊँचा, रोमश तथा जंगली भिंडी के क्षुप के आकार वाला होता है किन्तु कहीं-कहीं इससे भी ऊँचा क्षुप देखने में आता है। पत्ते-भिंडी के पत्तों के आकारवाले, गोलाकार गहरे कटे किनारीदार एवं तीन से पाँच भागों में विभक्त रहते हैं। फूल-भिंडी के फूलों के समान ही ३-४ इञ्च के घेरे में घंटाकार चमकीले पीले रंग के होते हैं। फली-२॥-३ इञ्च लम्बी, पहलदार रोमश किञ्चित् नुकीली भिंडी की ही तरह होती है और बीज-भिंडी के बीजों के समान किन्तु वृक्काकार, कुछ चिपटे तथा काले रंग के होते हैं। इन बीजों को मसलने से कस्तूरी की तरह गंध आती है। इसके पत्र, मूल तथा बीजों का औषध में व्यवहार किया जाता है। लताकस्तूरी के नाम से यह बोध होता है कि इसकी लता होती है। 'निघण्टुरत्नाकर' में लिखा है कि इसकी लता दक्षिण में पाई जाती है परन्तु लता देखने में नहीं आती, इसका क्षुप ही होता है जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। श्रीविश्वनाथजी द्विवेदी अपनी भावप्रकाश की टीका में लताकस्तूरी का पर्याय वेद्मुश्क लिखते हैं। वास्तव में वेद्मुश्क लताकस्तूरी से अलग है तथा उसका लेटिन नाम सॅलिक्स कॅप्रिया (Salix caprea Linn.) है। चरक-सुश्रुतादि ग्रन्थों में मुखशुद्धि के लिये एवं मुख में रुचि तथा सुगन्धि लाने के लिये मुख में धारण करने के लिये जातीफल, कटुक, पूग, कंकोल, ताम्बूल, सूक्ष्मैला, लवङ्ग एवं कर्पूर का उपयोग लिखा है। टीकाकारों ने कटुक शब्द का अर्थ लताकस्तूरी किया है। कुछ लोगों ने कटुक का अर्थ लघुकक्कोल (छोटी कबाबचीनी) किया है तथा कक्कोल का अर्थ बृहत्कक्कोल (बड़ी कबाबचीनी) किया है। रासायनिक संगठन-इसमें गोंद, एक रवेदार पदार्थ, सुगन्धद्रव्य, राल, अल्ब्यूमिन एवं एक उड़नशील तैल रहता है। यह तैल हरापन लिये पीला होता है तथा वायु में खुला रखने पर गाढ़ा हो जाता है। गुण और प्रयोग-इसके बीज शीतल, दीपन, वाजीकर, बल्य, वातानुलोमक, नेत्र्य, रोचक, बस्तिशोधक, तृषाशामक एवं उद्वेष्टननिरोधी हैं। इनका उपयोग कफरोग, बस्तिविकार, मुखरोग, अपतन्त्रक, दुर्बलता, स्नायुदौर्बल्य, कुपचन, अग्निमान्द्य एवं ज्वर में किया जाता है। (१) इसके फाण्ट को २ से ४ तोले की मात्रा में कफविकार, तमकश्वास एवं ज्वर में दिया जाता है। इससे श्वासमार्ग में स्निग्धता उत्पन्न होकर श्वासनलिकाओं का उद्वेष्टन दूर होता है। उत्तेजक होने के कारण इससे हृदय को भी बल प्राप्त होता है। (२) इसको मुख में रखकर चबाने से मुख स्वच्छ एवं सुगन्धित होता है तथा खाने पर रुचि बढ़ती है। स्वरभङ्ग एवं मुखशोथ में इसका धूम्रपान उपयोगी है। (३) २ १/२ औंस बीज तथा २० औंस मद्यसार में इसका टिंक्चर बनाकर १-२ ड्रा० की मात्रा में उत्तेजक, उद्वेष्टननिरोधी एवं वातानुलोमक रूप में अपतंत्रक, दुर्बलता तथा अन्य वातिक विकारों में दिया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

३७२ भावप्रकाशनिघण्टुः (४) सूखी खुजली में दूध में पीसकर इसके उबटन का प्रयोग किया जाता है। सर्पदंश पर इसके चूर्ण को मद्यसार में भिगोकर लगाते हैं तथा आन्तरिक प्रयोग भी करते हैं। महीन चूर्ण को नेत्र में लगाने से लाभ होता है। (५) इसके मूल तथा पत्तों का लुआब निकाल कर मिश्री मिलाकर सोजाक, रतिजन्य रोग एवं बस्तिविकारों में दिया जाता है। शुक्रमेह में बीजों का चूर्ण खिलाते हैं। (६) औषधीय तैलों को सुगन्धित करने के लिये इसके बीजों का उपयोग किया जाता है। (७) कॉफी के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। अधिक मात्रा- २ ड्रा० से अधिक टिंकचर के प्रयोग से शिरःशूल एवं चक्कर आते हैं। मात्रा- चूर्ण २-४ माशा; टिंकचर- १-२ ड्रा०। अथ गन्धमार्जारवार्यम् (जबादकस्तूरी) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह गन्धमार्जारवीर्यन्तु वीर्यकृत्कफवातहृत्। कण्डूकूष्ठहरं नेत्र्यं सुगन्धं स्वेदगन्धनुत् ।।१०।। गन्धमार्जार का वीर्य अर्थात् जबादकस्तूरी के गुण-गन्धमार्जारवीर्य-वीर्यजनक, कफवातनाशक, खुजली तथा कुष्ठ को दूर करने वाला, नेत्रों के लिये हितकर, सुगन्धयुक्त तथा पसीने की दुर्गन्ध को दूर करनेवाला होता है। [१०] ५. जबाद कस्तूरी हिं०- जबाद कस्तूरी, जबाद, बेद अञ्जीर, मुश्क बिलाव कस्तूरी, गन्ध ओतु। गु०-जवादियाँ कस्तूरी। ता०- पुनुग, जबादी। अ०-ज(जु) ब्बाद्, ज(जु) बाद। अं०-Civet (सिह्वेट)। प्राणिनाम-हि०-मुश्क बिल्ली, खतास। ने०-भ्रान। बं०-माचमोंदर, बगदास, 'पूडोगंद। ता०-पुनुगु पूने। फा०-गुर्बए जबाद। अं०-Civet cat (सिह्वेट कॅट)। ले०-Viverra zibetha, Linn. (वाइवेरा झिबेथा, लिन.)। यह सुगन्धित पदार्थ गन्धमार्जार नामक एक अकार की बिल्ली के पूँछ के नीचे की थैली से प्राप्त द्रव्य है। यह प्राणी अफ्रिका, दक्षिण एशिया एवं भारतवर्ष के मालावार प्रान्त में पाया जाता है। इसका कद बिल्ली का सा किन्तु दुम बड़ी लम्बी होती है। शरीर पर गहरे रंग के धब्बे होते हैं। गुदा और जननेन्द्रिय के बीच में पूँछ के नीचे एक बड़ी थैली होती है जो दो भागों में विभक्त रहती है। इस थैली में जो द्रव पदार्थ बनता है उसको भी सिह्वेट ही नाम दिया जाता है। प्राकृतिक दशा में सिह्वेट की गन्ध अत्यन्त तीक्ष्ण या असह्य होती है, किन्तु जब वह अन्य वस्तुओं के साथ मिलाकर तैयार की जाती है, तो उसमें कस्तूरी की सी सुगन्ध आने लगती है। इस बिल्ली को एक तंग पिंजरे में खड़ाकर देते हैं और थैली में से द्रव पदार्थ को निचोड़ लेते हैं। मलावार की तरफ कृषक लोग खेतों में बाँस गाड़ देते हैं। यह मार्जार उस पर अपना शिश्न घर्षण करके वीर्य निकाल देता है जो बाँस पर लग जाता है। कृषक लोग उसे संग्रह करके बेच देते हैं। कई लोग इस मार्जार को मारकर उसका अण्डकोष उल्टा करके ग्रन्थियाँ फेंक देते हैं और उल्टे हुवे कोष में तृण भरकर शुष्क करके बेच देते हैं। कलकत्ता में यह शुष्क कोष 'खट्टाशी' नाम से मिलता है। बंगाली वैद्य नारायण तैल आदि को सुगन्धित करने के लिये खट्टाशी उसमें छोड़कर मन्द अग्नि से पकाते हैं। गन्धमार्जारवीर्य नया होने पर पीताभ श्वेत वर्ण का, नरम और प्रायः मधु के समान गाढ़ा होता है। पुराना होने पर रंग में कुछ श्यामता आ जाती है। यह श्वेत रंग का निकृष्ट समझा जाता है। दक्षिण भारत के बंगलोर, मैसूर, मदुरा आदि शहरों में यह पुनुग या जबादी नाम से सुगन्धि द्रव्य बेचने वालों के यहाँ मिलता है। इसमें छोटे बाल, तन्तु, लकड़ी तथा अमोनिया आदि मिले रहते हैं। परीक्षा-'गंजबादावर्द' में जबाद की परीक्षण विधि इस प्रकार लिखी है—

कर्पूरादिवर्गः ३७३ इसे सुतली के सिरे पर लगाकर अग्नि के समीप रखने से पिघल कर तेल हो जाय तो कृत्रिम और यदि एकत्रीभूत होकर सिरे पर लगा रहे तो असली समझे। इसे अग्नि पर गरम करें या दोनों हाथों से इतना मलें कि गरमी पैदा हो जाय, उस समय सूँघने से जो चीज उसमें मिली होगी वह व्यक्त हो जायगी। रासायनिक संगठन—इसमें स्वतन्त्र अमोनिया, राल, वसा, कार्यकारी सत्त्व एवं उड़नशील तैल आदि पदार्थ पाये जाते हैं जिनके कारण इसमें सुगन्ध होती है। गुण और प्रयोग—यह उष्ण, वृष्य, नेत्र्य, सुगन्धि, उत्तेजक, सौमनस्यजनन, आविजनन, हृदय एवं ज्ञानेन्द्रियों के लिये बलकारक, उद्वेष्टननिरोधी तथा कफ, वायु, कण्डू और स्वेद की दुर्गन्ध को दूर करने वाला एवं स्थानिक पीड़ाशामक है। इसका प्रयोग अपतन्त्रक, वातनाड़ी दुर्बलताजन्य शैथिल्य, नपुंसकता एवं सुखप्रसूति के लिये किया जाता है। सुगन्धि के काम में तथा धूपों में इसका औषध की अपेक्षा अधिक प्रयोग किया जाता है। नीचे कुछ यूनानी प्रयोगों को दिया जाता है— (१) मद्य या अन्य औषधों के साथ २ रत्ती की मात्रा में देने से मन उल्लसित होता है एवं मूर्च्छा, हृदय की धड़कन एवं उदासीनता आदि में लाभ होता है। (२) १॥ माशा जबाद, थोड़ा सा केशर एवं मुर्गे का मां सरस प्रसव के समय पिलाने से सुखपूर्वक प्रसव होता है। (३) प्रतिश्याय, शिरःशूल और अर्धावभेदक में इसको सूँघने से लाभ होता है। (४) बादाम के तेल में घिसकर कान में डालने से श्रवणशक्ति बढ़ती है। (५) शिश्न पर लेप करके संभोग करने से अधिक आनन्द होता है तथा गर्भधारण नहीं होता। (६) इसके मर्दन से दर्द दूर होती है। व्रणशोथ पर लेप करने से वह पककर जल्दी अच्छा होता है। मात्रा—१ से २ माशा। अथ चन्दनम्। तस्य नामान्याह श्रीखण्डं चन्दनं न स्त्री भद्रश्रीस्तैलपर्णिकः। गन्धसारो मलयजस्तथा चन्द्रद्युतिश्च सः ॥११॥ चन्दन के नाम—श्रीखण्ड, चन्दन (यह पुंलिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग में होता है), भद्रश्री, तैलपर्णिक, गन्धसार, मलयज और चन्द्रद्युति ये सब चन्दन के संस्कृत नाम हैं। [११] अथोत्तमचन्दनस्य लक्षणमाह स्वादे तिक्तं कषे पीतं छेदे रक्तं तनौ सितम्। ग्रन्थिकोटरसंयुक्तं चन्दनं श्रेष्ठमुच्यते ॥१२॥ श्रेष्ठ चन्दन के लक्षण—जो चन्दन स्वाद में तिक्त रस युक्त, घिसने में पीले वर्ण का, टुकड़े करने पर लाल वर्ण का एवम् देखने में श्वेत वर्ण का हो तथा गाँठ और कोटर (खोड़रा) से युक्त हो तो श्रेष्ठ कहलाता है। [१२] अथ चन्दनस्य गुणानाह चन्दनं शीतलं रूक्षं तिक्तमाह्लादनं लघु। श्रमशोषविषश्लेष्मतृष्णापित्तास्रदाहनुत् ॥१३॥ चन्दन के गुण—चन्दन—शीतवीर्य, रूक्ष, तिक्त रस युक्त, चित्त को आह्लादित करने वाला और लघु होता है तथा श्रम, शोष, विष, कफ, प्यास, पित्तविकार, रक्तदोष और दाह को दूर करने वाला होता है। [१३]

३७४ भावप्रकाशनिघण्टुः ६. चन्दन हिं०-चंदन, सफेद चंदन। बं०-म०-चंदन। क०-श्रीगन्धमर। गु०-सुखड़। ता०-चंदन मरं। ते०- गंधपु चेक्का। फा०-संदले सफेद। अ०-संदले अव्यज। अं०-Sandalwood (सॅण्डलवुड)। ले०-Santalum album, Linn. (सॅण्टॅलम् ॲल्वम्)। Fam. Santalaceae (सॅण्टेलेसी)। यह मैसूर, कुर्ग, कोयम्बटूर एवं मद्रास के दक्षिणी भागों में ४००० फीट की ऊँचाई तक उत्पन्न होता है तथा इसकी उपज भी की जाती है। करीब ६००० वर्ग मील का क्षेत्र इससे व्याप्त है जिसमें से ८५% भाग मैसूर एवं कुर्ग में है। कहीं-कहीं वाटिकाओं में भी रोपण करते हैं। इसका वृक्ष-सदाहरित, २०-३० फीट ऊँचा एवं अर्धराश्रयी स्वरूप का होता है क्योंकि यह दूसरे आस-पास के घास, झाड़ी, क्षुप एवं वृक्षों से कुछ अंशों में पोषक द्रव्यों का शोषण करता है। उद्भेद के कुछ महीने पश्चात् ही इसके मूल आसपास के पेड़-पौधों के मूल में घुस जाते हैं तथा उनसे खाद्य द्रव्यों का शोषण करते हैं। छोटे पौधों को बहुत सावधानी के साथ इतर पोषित (Host) वृक्षों के साथ पुनः रोपण किया जाता है। यदि सावधानी के साथ रोपण न किया जाय और पास-पास रोपण किया जाय तो स्पाइक (Spike) नामक रोग से ये बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं। इसकी छाल-कालापन युक्त भूरे रंग की, अन्तर छाल-लाल, लकड़ी-तेल युक्त दृढ़ और सार भाग-पीलापन युक्त भूरे रंग का तथा सुगन्धित होता है। पत्ते-विपरीत, २-३ इञ्च लम्बे, अण्डाकार-लट्वाकार एवं उपपत्र रहित होते हैं। फूल-छोटे, निर्गन्ध, जामुनी रंग के तथा गुच्छों में आते हैं। फल-मांसल, गोल एवं कृष्णाभ बैंगनी रंग के होते हैं। इसका केवल काष्ठसार ही सुगंधित होता है। कठिन, पहाड़ी तथा लाल भूमि में उत्पन्न वृक्षों में तैल अधिक होता है। उपजाऊ भूमि में तैल की मात्रा कम होती है। इसके वृक्षों को यद्यपि अन्य स्थानों में रोपित करने का प्रयत्न किया गया तथापि उसमें बहुत कम सफलता मिली। इसके वृक्ष १८-२० वर्षों में परिपक्व होते हैं तब तक इसमें काष्ठसार सतह ले २ इञ्च अंदर तक विकसित हो जाता है। इस अवस्था में वृक्षों को काटते हैं। बाहर की छाल एवं बाहरी रसकाष्ठ (Sapwood-सॅपवुड) तथा डालियाँ जो गंधहीन होती हैं उन्हें फेंक दिया जाता है। अंदर के काष्ठसार (Heart wood-हार्टवुड) को करीब २ १/२ फीट लम्बे टुकड़ों में काटकर बंद गोदामों में सूखने के लिये रख दिया जाता है। ऐसा समझा जाता है कि इससे इसकी सुगन्ध और अच्छी हो जाती है। वृक्ष का तिहाई भाग करीब काष्ठसार होता है। काष्ठसार के टुकड़ों तथा बुरादे से आसवन (Distillation-डिस्टिलेशन) के द्वारा तैल निकालते हैं। इसकी उड़नशीलता कम होने के कारण एवं इसका काष्ठ अधिक सघन होने के कारण तैल बहुत धीरे-धीरे निकलता है तथा इसमें व्यय भी अधिक होता है। इसके मूल से भी तैल निकाला जाता है जो काष्ठ की अपेक्षा अधिक मात्रा में एवं अधिक अच्छा होता है। औसतन १ टन (२८ मन) काष्ठ से १०५-११० पौण्ड तैल निकलता है। अधिकांश वृक्षों पर राज्य का अधिकार है तथा बंगलौर एवं मैसूर में इसके तैल निकालने के कारखाने हैं। राज्य को अमेरिका आदि देशों में इसके निर्यात से बहुत आमदनी होती है। अन्य देशों में कुछ ऐसे वृक्ष पाये गये हैं जिनसे भारतीय चन्दन तैल सदृश तैल प्राप्त होता है लेकिन वह उतना अच्छा नहीं होता। पूर्वी जावा से चन्दन के ही वृक्ष से निकाला हुआ मॅकेस्सर सॅण्डलॅवुड ऑइल (Macassar sandalwood oil) आता है लेकिन उसमें भारतीय तैल जैसी सुगंध नहीं होती। वेस्ट इण्डियन सॅण्डलवुड् ऑइल (West Indian sandalwood oil) यह चंदन के वृक्ष से नहीं निकालते वरन् फ्यूसॅनसॅ ॲक्यूमिनेटस् (Fusanus acuminatus) से निकालते हैं तथा ईस्ट अफ्रिकन सॅण्डलवुड् ऑइल (East African sandalwood oil) ऑसिरिस् टेनुइफोलिया (Osyris tenuifolia) से निकालते हैं। वेस्ट ऑस्ट्रेलियन् सॅन्डलवूड् ऑइल (West

कर्पूरादिवर्गः ३७५ Australian sandalwood oil) यह फ्यूसॅनस् स्पाइकैटस् (Fusanus spicatus) से निकालते हैं जो कुछ परिवर्तन करने के पश्चात् भारतीय तैल जैसा बन जाता है एवं व्यापार में भारतीय तैल की प्रतिद्वन्द्विता कर सकता है। चन्दन के भेद-प्राचीन निघण्टुकारों ने चन्दन के कई भेद लिखे हैं। ध० नि० में चन्दन (श्वेतचन्दन), रक्त चन्दन, कुचन्दन, कालीयक और बर्बरीक ये पाँच प्रकार के चन्दन के भेद लिखे हैं। रा० नि० में बेट्ट और सुक्कडि नामक (श्वेत) चन्दन के दो भेद एवं रक्त चन्दन, पतंग (कुचन्दन), कालीयक, बर्बरक तथा हरिचन्दन ये सब मिलाकर ७ प्रकार लिखे हैं। भावप्रकाश में चन्दन, रक्तचन्दन, कालीयक (पीतचन्दन) एवं कुचन्दन (पत्रांग) ये ४ भेद लिखे हैं। ध० नि० ने हरिचन्दन का स्वतन्त्र उल्लेख न करके रक्तचन्दन के पर्याय में हरिचन्दन लिखा है तथा भावप्रकाशकार ने कालीयक (पीतचन्दन) के पर्याय में हरिचन्दन को लिखा है। श्वेतचन्दन-रा० नि० श्वेतचन्दन के दो भेद किये हैं। आर्द्र अवस्था में वृक्ष को काटने पर प्राप्त चन्दन को बेट्ट संज्ञा दी है। अपने आप वृक्ष के सूख जाने पर काटे हुए चन्दन को सुक्कडि कहा है। कुछ लोगों का मत है कि मलय पर्वत के पास के बेट्ट नामक पर्वत से प्राप्त चन्दन 'बेट्टचन्दन' है। इसी प्रकार 'बर्बर' नामक चन्दन का जो भेद लिखा है वह भी श्वेत ही होता है तथा वह बर्बर नामक पहाड़ पर उत्पन्न होता है। ध० नि० इसे निर्गन्ध एवं रा० नि० सुगन्धियुक्त मानते हैं। श्वेतचन्दन के जो अन्य पर्याय भद्रश्री, तैलपर्ण एवं गोशीर्ष आदि दिये गये हैं वे मलय पर्वत, तिलपर्ण तथा गोशीर्ष पर्वत पर पाये जाने वाले चन्दनों के नाम हैं, ऐसा मानते हैं। चन्दन के प्रयोग के संबन्ध में लिखा है-'उक्ते चन्दनशब्दे तु गृह्यते रक्तचन्दनम्। चूर्णस्नेहासवा लेहाः साध्याः धवलचन्दनैः ।। कषायलेपयोः प्रायो युज्यते रक्तचन्दनम् ।।' योग में सामान्य चन्दन शब्द से रक्तचन्दन का ग्रहण करना चाहिये। चूर्ण, तैल, घृतादि, आसव-अरिष्टादि एवं लेह में चन्दन से श्वेत चन्दन का ग्रहण करना चाहिये तथा कषाय स्वरस आदि एवं लेप के लिये रक्तचन्दन का ग्रहण करना चाहिये। चरक के कई गणों में चन्दन का उल्लेख एवं सुश्रुत के कई गणों में चन्दन तथा कुचन्दन का प्रयोग आया है। सालसारादि गण में कालीयक का भी उल्लेख है। डल्हण ने सालसारादिगण एवं पटोलादिगण में कुचन्दन का अर्थ रक्त चन्दन किया है। जब कुचन्दन से रक्त चन्दन एवं चन्दन से भी रक्त चन्दन लिया जायेगा तो दो अलग लिखने का क्या अभिप्राय है ? सु० सू० अ० ३८ में प्रियंग्वादिगण में कुचन्दन का अर्थ रक्त चन्दन न करके मलयादि चन्दन किया है तथा चन्दन का अर्थ रक्त चन्दन किया है। गुडूच्यादिगण में चन्दन से रक्तचन्दन लिया है। इस प्रकार 'चन्दने रक्तचन्दनम्' यह उचित नहीं मालूम पड़ता तथा चूर्णादि में श्वेत एवं कषायादि में रक्तचन्दन का प्रयोग भी ऋषि सम्मत नहीं मालूम पड़ता। जिस प्रकार का प्रयोग हो वैसा अर्थ लेना चाहिये। सुगन्धि आदि के लिये श्वेत चन्दन एवं रक्तपित्तादि में रक्त चन्दन का प्रयोग उचित है। रासायनिक संगठन-इसके काष्ठसार में २.५-६% तक एक उड़नशील तैल, राल एवं टैनिक एसिड आदि पदार्थ पाये जाते हैं। चन्दन का तैल हलके पीले रंग का, गाढ़ा, चिपचिपा, स्वाद में कड़वा एवं किंचित् तीता तथा तीव्र विशिष्ट गन्धवाला होता है। यह २०° से० उष्णता पर ५ भाग मद्यसार (७०%) में घुल जाता है। इसका विशिष्ट गुरुत्व ०.९७३-०.९८५ होता है। इस तैल में ९०% तक अॅल्फा-सॅण्टेलॉल एवं बीटा-सॅण्टेलॉल (a-santalol and B- santalol] C₁₅ H₂₄ O) नामक दो सभाजिक (Isomeric-आइसोमेरिक्) सेस्क्विटर्पन् ॲल्कोहोल्स् (Sesquiterpene alcohols) पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त इस तैल में ॲल्डिहाइड्स (Aldehydes) एवं कीटोन (Ketone) द्रव्य पाये जाते हैं। इस तैल में देवदार का तैल (Cidarwood oil) १०% तक एवं रेंडी का तेल आदि अन्य तैलों की मिलावट की जाती है जिनकी पहचान इसके भौतिक परिवर्तन से की जा सकती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

३७६ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-श्वेत चन्दन-कड़वा, शीतल, रूक्ष, दाहशामक, पिपासाहर, ग्राही, हृदयसंरक्षक, विषघ्न, वर्ण्य, कण्डूघ्न, वृष्य, आह्लादकारक, रक्तप्रसादक, मूत्रल, दुर्गन्धहर एवं अंगमर्द-शामक है। इसका उपयोग ज्वर, रक्तपित्त, पैत्तिक विकार, तृषा, दाह, वमन, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, रक्तमेह, श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर, उष्णवात (सोजाक), रक्तातिसार तथा अनेक चर्मरोगों में किया जाता है। (१) पित्तज्वर, तीव्रज्वर एवं जीर्णज्वर में चंदन के प्रयोग से दाह एवं तृषा की शांति होती है तथा स्वेद उत्पन्न होकर ज्वर भी कम होता है। ज्वर के कारण हृदय पर जो विषैला परिणाम होता है वह भी इसके देने से नहीं होता। (२) नारियल के जल में चन्दन घिसकर २ तो० की मात्रा में पिलाने से प्यास कम होती है। (३) चन्दन को चावल की धोवन में घिस कर मिश्री एवं मधु मिलाकर पिलाने से रक्तातिसार, दाह, तृष्णा एवं प्रमेह आदि में लाभ होता है। इसी प्रकार मूत्रदाह, मूत्राघात, रक्तमेह एवं सोजाक में चन्दन को चावल की धोवन में घिस कर मिश्री मिलाकर पिलाते हैं। (४) आँवले के रस के साथ चन्दन देने से वमन बंद होता है। (५) दुर्गंध युक्त श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर एवं प्रमेह आदि में चंदन का क्वाथ उपयोगी है। (६) ग्रीष्मऋतु में शीतल, आह्लाददायक पेय के रूप में चन्दन पानक (शरबत) का उपयोग किया जाता है। इससे आमाशयगत उष्णता कम होती है। हृदय, यकृत तथा आमाशय को बल प्राप्त होता है एवं दाह, तृष्णा शांत होती है। (७) त्वक् शोथ, विसर्प, फोड़े-फुन्सी, कण्डू, अत्यधिक स्वेद एवं अम्हौरी आदि में चंदन एवं कपूर, गुलाब जल में घिसकर लगाते हैं। ज्वर में शरीर में पीडा हो तब इसको लगाने से लाभ होता है। शिरःशूल में लगाने से शिरःशूल दूर होता है। चन्दन का तैल-यह उत्तम मूत्रजनन, मूत्रमार्ग के लिये प्रतिदूषक, वृक्कोत्तेजक, त्वग्दोषहर, कृमिघ्न, कफनिःसारक एवं स्नेहन है। इससे वृक्क को कोई नुकसान नहीं होता। इसका उत्सर्ग मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान तथा फुफ्फुसों द्वारा होता है और उत्सर्ग के समय इनके स्रावों की वृद्धि होती है तथा जीवाणुनाशन भी होता है। सेवन के पश्चात् गले में खुश्की एवं प्यास तथा अधिक मात्रा में शूलवत् वेदना एवं कटिप्रदेश में भारीपन मालूम होता है। इसका प्रयोग सोजाक, बस्तिशोथ, गवीनीमुखशोथ, जीर्णकास, विषम ज्वर एवं खुजली (पामा) में तथा सुगन्धि के लिये किया जाता है। (१) नये अथवा पुराने सोजाक में इसको १५-२० बूँद दिन में ३ बार देने से बहुत लाभ होता है। यदि जलन अधिक हो तो ५-१० बूँद हर घंटे पर दें। कोपाइबा (Copaiba) की तरह इससे मूत्रादि में दुर्गन्धि नहीं आती। इसे पूयस्राव बंद होने के २ हफ्ते बाद तक देना चाहिये जिससे फिर से न हो। इसमें इलायची एवं वंशलोचन के साथ या सोंठ या अजवायन के फांट के साथ भी इसका प्रयोग किया जाता है। (२) जीर्ण बस्तिशोथ (Cystitis), गवीनीमुख शोथ (Pyelitis-पाइलाइटिस्), बस्ति के राजयक्ष्मा उपसर्ग से यदि बार-बार पेशाब होती हो एवं मूत्रकृच्छ्र में इसको बताशे में डालकर दूध के साथ देते हैं। यह क्षारीय मूत्र में ही प्रतिदूषक का कार्य करता है इसलिये साथ में क्षारीय औषधों का प्रयोग आवश्यक है। (३) दुर्गन्धित कफयुक्त कास में २-३ बूँद बताशे पर डालकर देते हैं। (४) खुजली (पामा-Scabies) में इसको लगाने से लाभ होता है। कर्णशूल, दंतशूल एवं शोथ आदि पर तथा अनेक चर्मरोगों में इसका स्थानिक उपयोग किया जाता है। नाक पर की फुन्सियों पर दुगुने सरसों के तेल में मिलाकर इसे लगाते हैं।

कर्पूरादिवर्गः ३७७ चन्दन के बीज-पेसरी के रूप में गर्भपात के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २-४ माशा, तैल ५-१५ बूँद। अथ पीतचन्दनम्। (कलम्बक इति लोके)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह- कालीयकं१ तु कालीयं पीताभं हरिचन्दनम् ।।१४।। हरिप्रियं कालसारं तथा कालानुसार्यकम्। कालीयकं रक्तगुणं विशेषाद् व्यङ्गनाशनम् ।।१५।। पीत चन्दन अर्थात् जिसे लोक में 'कलम्बक' कहते हैं उसके नाम तथा गुण-कालीयक, कालीय, पीताभ, हरिचन्दन, हरिप्रिय, कालसार तथा कालानुसार्यक ये सात पीले चन्दन के संस्कृत नाम हैं। पीलाचन्दन-गुणों में रक्तचन्दन के समान ही होता है किन्तु विशेषता यह है कि यह विशेष रूप से व्यङ्ग (मुख की झाँई) को भी दूर करने वाला होता है। [१४-१५] ७. पीतचन्दन हिं०-पीतचन्दन, पीला चन्दन, कलंबक। बं०-कलंबा। म०-पिंवले चन्दन। फा०-संदल अबियज। नवीन औद्भिदी विज्ञों के अनुसार पीत चन्दन का स्वतन्त्र कोई वृक्ष नहीं पाया जाता। ध० नि० एवं भावप्रकाश में उत्तम श्वेत चन्दन के विषय में लिखा है कि 'कषे पीतम्', अर्थात् घिसने पर जो पीतवर्ण का हो वह उत्तम श्वेत चन्दन होता है। इसी प्रकार ध० नि० में 'मलयोत्थम् पीतकाष्ठम् चतुर्थं हरिचन्दनम्', लिखा है जिससे ज्ञात होता है कि पीतचन्दन मलयपर्वत पर ही होता है। श्वेत चन्दन का उत्पत्ति स्थान भी मलय पर्वत दिया हुआ है। इस प्रकार उत्पत्ति स्थान एवं घिसने पर पीतवर्ण दोनों चन्दनों के एक ही हैं केवल ऊपर से देखने में पीत चन्दन कुछ अधिक पीला तथा श्वेत चन्दन पीताभ श्वेत होता है। इसलिये यदि उत्तम पीतवर्ण के काष्ठसार को पीतचन्दन एवं कुछ श्वेत वर्ण के काष्ठसार को श्वेत चन्दन मान लिया जाय तो पीत चन्दन की संगति लग सकती है। दूसरा द्रव्य जिसकी तरफ ध्यान जाता है वह है कलंबा (Calumba)। यह अफ्रीका में होनेवाली एक लता जेटिओहाइझा पामेटा (Jateorhiza palmata Miers; Fam. Menispermaceae) के पीतवर्ण के मूल के टुकड़े हैं जिनका आधुनिक चिकित्सा में तिक्त पौष्टिक एवं दीपन द्रव्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह भारत में भी लगाई हुई मिलती है एवं इसका भारतीय प्रतिनिधि है 'झाड़ की हलदी' (पृष्ठ १२२) जिसको दक्षिण में दारुहरिद्रा के स्थान पर व्यवहार करते हैं। इस भारतीय द्रव्य को सीलोन कलंबा या नकली कलंबा भी कहा जाता है। दारुहरिद्रा के पर्यायों में भी 'कालीयक' आता है। इन बातों से ऐसा आभास होता है कि संभवतः 'झाड़ की हलदी' (नकली कलंबा) या कलंबा पीतचन्दन हो। अथ रक्तचन्दनम् (लाल चन्दन)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह रक्तचन्दनमाख्यातं रक्ताङ्गं क्षुद्रचन्दनम्। तिलपर्णं रक्तसारं तत्प्रवालफलं स्मृतम् ।।१६।। रक्तं शीतं गुरु स्वादुच्छर्दितृष्णाऽस्रपित्तहृत्। तिक्तं नेत्रहितं वृष्यं ज्वरव्रणविषापहम् ।।१७।। लाल चन्दन के नाम तथा गुण-रक्तचंदन, रक्ताङ्ग, क्षुद्रचंदन, तिलपर्ण, रक्तसार और प्रवालफल ये सब लाल चंदन के संस्कृत नाम हैं। लाल चन्दन-शीतवीर्य, गुरु, स्वादु तथा तिक्त रस युक्त तथा वमन, प्यास और रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। यह नेत्रों के लिये हितकर, वृष्य और ज्वर, व्रण तथा विष को दूर करने वाला होता है। [१६-१७] १. कलम्बकं इति पाठ०।

३७८ भावप्रकाशनिघण्टुः ८. लालचन्दन हिं०—लाल चंदन, रक्तचंदन। बं०, म०—रक्तचंदन। गु०—रतांजली। ते०—रक्तचंदनम्। ता०—शेन् चंदनम्। पं०, मा०—लाल चंदन। मला०—रक्तशंदनम्। फा०—संदले सुर्ख। अ०—संदले अह्मर। अं०—Red Sanders Wood (रेड सॅण्डर्स वुड); Red Sandal Wood (रेड सॅण्डल वुड)। ले०—Pterocarpus santalinus, Linn. f. (प्टेरोकार्पस् सॅण्टॅलिनस्, लिन.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह दक्षिण भारत में विशेष कर कुडापा, उत्तर आरकोट, कर्नूल के दक्षिण भाग एवं चिंगलपुट में १५०० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। यह दक्षिण भारत तथा फिलीपाइन द्वीपों में नैसर्गिक रूप में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष—२५ फुट तक ऊँचा होता है। छाल—कालापन युक्त भूरे रंग की, लकड़ी—दृढ़ तथा काष्ठसार— अत्यंत कठिन एवं कालापन युक्त लाल रंग का होता है। पत्ते—संयुक्त, प्रायः पत्रक तीन, १ १/२-३ इञ्च लम्बे, गोलाई युक्त अंडाकार एवं कुण्ठिताग्र होते हैं। पत्तों के अधोपृष्ठ हलके वर्ण के एवं मृदु रोमश होते हैं। फूल—अल्प, पीताभ श्वेत एवं सवृंतकाण्डज गुच्छों में आते हैं। फलियाँ—करीब १ १/२ इञ्च व्यास की, टेढ़ी, आधार की तरफ कम चौड़ी एवं छोटे से डंठल से युक्त होती हैं। इसके काष्ठसार का औषध में व्यवहार किया जाता है। यह गहरे काले से लाल रंग का, अत्यंत कठोर, वजन में भारी एवं रेशेदार होता है। यह लम्बाई में आसानी से टूट जाता है। इसके सफाई से कटे हुये अनुप्रस्थ विच्छेद में (Transverse section) वार्षिक चक्र (Annual rings) नहीं होते किन्तु गहरे रंग की घन काष्ठतंतुओं (Wood fibres) की स्पर्श समतलीय (Tangential) पट्टियाँ (Bands) होती हैं जो कम चौड़ी, हलके रंग की काष्ठ तंतुमित्तिक (Wood parenchyma) की करीब-करीब संतत पट्टियों से एकांतरित रहती हैं। इन पट्टियों के अन्दर के किनारों पर महावाहिनियाँ (Vessels) दूर-दूर पर विन्यस्त रहती हैं। इन पट्टियों को समकोण में काटती हुई अत्यंत महीन, हलके रंग की मज्जक किरणें (Medullary rays) होती हैं जो १० गुना बड़ा करके ही देखी जा सकती हैं। इसका बुरादा बाजार में मिलता है। इससे मद्यसार का रंग गहरा लाल हो जाता है लेकिन जल में बहुत कम इसका भाग घुलता है। इसमें गन्ध नहीं होती तथा स्वाद कुछ कसैला होता है। नोट—यद्यपि इसे रक्तचंदन कहा गया है तथापि इसमें चंदन के समान सुगंध नहीं होती। रा० नि० में एक सुगंधि युक्त लालचंदन का उल्लेख 'हरिचंदन' नाम से किया है लेकिन यह भी लिखा है कि यह दिव्य होता है एवं दुर्लभ होता है। कुछ लोगों ने रक्तचंदन से पतंग का ग्रहण किया है क्योंकि वह भी रक्तचंदन से मिलता-जुलता होता है लेकिन वह इस वृक्ष से अलग वृक्ष है जिसका आगे वर्णन दिया गया है। 'निघण्टुआदर्श' में कुचंदन का ले० नाम अंडेनेन्थेरा पॅह्वोनिना लिन० (Adenanthera pavonina Linn.) बं०—रक्तकंबल; बम्ब०—थोरलीगुञ्ज, बाल; हिं०—बड़ी गुमची, रक्तचंदन लिखकर 'वनौषधि दर्पण' से उद्धृत उसकी टीका में लिखा है कि 'कुचंदन यह रा० नि० का पतंग है जिसका रक्तचंदन के स्थान पर प्रयोग किया जाता है।' लेकिन पतंग का वृक्ष अलग होता है जिसे सिझल्पिनिआ सप्पन कहते हैं। बड़ी घुमची को रक्तचंदन अथवा पतंग मानना उचित नहीं। इस प्रकार रक्तचंदन एवं पतंग के अलग-अलग वृक्ष पाये जाते हैं। केवल रा० नि० का सुगंध युक्त लालचंदन (हरिचंदन) अभी तक नहीं प्राप्त हो सका है। संभव है वनस्पतियों का व्यापक अनुसंधान होने पर इस विषय का अंतिम निर्णय किया जा सके। रासायनिक संगठन—इसमें सॅण्टॅलिन् (सॅण्टॉलिक एसिड) [Santalin (santalic acid)] नामक एक रञ्जक द्रव्य तथा डेस्ऑक्सि सॅण्टलिन् नामक एक अन्य पदार्थ पाया जाता है। सॅण्टॅलिन् से मद्यसार में रक्त के समान लाल रंग, ईथर में पीला, अमोनिया एवं दाहक क्षार में नीललोहित रंग आता है। यह जल में नहीं घुलता। इसके अतिरिक्त लालचन्दन में प्टेरोकार्पिन (Pterocarpin), होमो-प्टेरोकार्पिन (Homo-pterocarpin) एवं सॅण्टाल् ये तीन रंगहीन रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें मद्यसार में घुलनशील पदार्थ २% से कम एवं राख २% से अधिक न होनी CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३७९ चाहिये । इसके मद्यसारीय घोल से इसके रंग को खनिज अम्लों (Mineral acids) के द्वारा निस्सादिन (Precipitated) किया जा सकता है । गुण और प्रयोग-रक्तचन्दन शीतल, बल्य, सौम्य एवं ग्राही है । इसका बाह्य लेप शीतल, शोथघ्न एवं व्रणरोपक है। इसका प्रयोग पैत्तिक विकार, रक्तदोष, रक्तार्श, रक्तपित्त, अतिसार, संग्रहणी एवं शिरःशूल, शोथ तथा त्वचा के रोगों में किया जाता है । रंजक द्रव्य के रूप में इसका अधिक उपयोग किया जाता है । (१) शोथ, फोड़े, व्रण, अम्हौरी तथा शिरःशूल में इसको शीतल प्रलेप के रूप में जल में घिसकर लगाते हैं । पलकों की सूजन पर इसे लगाने से सूजन दूर होती है । (२) ग्राही होने के कारण अन्य ओषधों के साथ इसका क्वाथ अतिसार एवं संग्रहणी आदि में प्रयोग किया जाता है। (३) रक्तार्श में इसे दूध में पीसकर पिलाते हैं एवं जल में घिसकर लेप भी करते हैं । (४) इसके मद्यसारीय घोल से खनिज अम्लों के द्वारा इसके रंजक द्रव्य को निस्सादित कर लिया जाता है जिसका उपयोग रंजन के लिये करते हैं । कंपाउंड टिंक्चर ऑफ ल्हेवेण्डर में इसी का रंग होता है । मात्रा-४ रत्ती-८ रत्ती । बड़ी गुमची Adenanthera pavonina Linn; Fam. Leguminosae (अँडेनेन्थेरा पॅह्वानिना लिन, लेग्यूमोनोसी)- यह पूर्वी हिमालय तथा पश्चिमी पेनिन्सुला में पाया जाता है । इसके बीजों का प्रयोग फोड़े तथा सूजन आदि पर किया जाता है तथा छाल का उपयोग आमवात एवं रक्तष्ठीवन में किया जाता है । अथ पतङ्गम् (बकम्) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पतङ्गं रक्तसारञ्च सुरङ्गं रञ्जनं तथा । पट्टरञ्जकमाख्यातं पत्तूरञ्च कुचन्दनम् ।। १८ ।। पतङ्गं मधुरं शीतं पित्तश्लेष्मव्रणास्रनुत् । हरिचन्दनवद्वेद्यं विशेषाद्दाहनाशनम् ।। १९ ।। पतङ्ग के नाम तथा गुण-पतङ्ग, रक्तसार, सुरङ्ग, रञ्जन, पट्टरञ्जक, पत्तूर और कुचन्दन ये सब पतङ्ग के संस्कृत नाम हैं । पतङ्ग-मधुररस युक्त, शीतवीर्य एवम् पित्त-कफ, व्रण और रक्तदोष को दूर करने वाला होता है । यद्यपि पतङ्ग का गुण पीले चन्दन के समान ही होता है तथापि इसे विशेष करके दाहनाशक समझना चाहिये । [१८-१९] ९. पतङ्ग हिं०-पतङ्ग, बक, बकम काठा, आल । बं०-बकम काष्ठ, बोकोम । म०, गु०-पतङ्ग । ते०-बुक्कपुचेट्टु । ता०-वरतंगि, शप्पङ्गु । मला०-चप्पनम् । फा०, अ०-बकम । अं०-(Sappan Wood (सँप्पन वुड) । ले०- Caesalpinia sappan Linn. (सिझल्पिनिया सँप्पन) । Fam. Caesalpiniaceae (सिझल्पिनिएसी) । यह पूर्व और पश्चिम प्रायद्वीप एवं मद्रास प्रान्त में अधिक पाया जाता है । बंगाल और बिहार के किसी-किसी स्थान में देखने में आता है । इसका वृक्ष-छोटा एवं काँटेदार होता है । लकड़ी दृढ़, सारभाग-नारङ्गी या चमकीले लाल रंग का होता है । पत्ते- संयुक्त, उपपक्ष ८ से १२ जोड़े; पत्रक-१० से १८ जोड़े, ³/४ इञ्च तक लम्बे, आयताकार, न्यूनाधिक विनाल, गोलाग्र CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

३८० भावप्रकाशनिघण्टुः एवं मध्य शिरा के दोनों तरफ के भाग असमान होते हैं। फूल-किंचित् पीताभ रंग के आते हैं। फलियाँ-चिपटी, ३-४ इञ्च × १ १/२-२ इञ्च बड़ी होती हैं। प्रत्येक में ३-४ बीज होते हैं। इसके काष्ठसार का उपयोग किया जाता है। यह लालचन्दन जैसी, फीके लाल रंग की, कड़ी एवं निर्गन्ध होती है। बाजार में सिंगापुरी, धुनसरी और सिलौनी इन तीन नामों से इसकी लकड़ी मिलती है। रासायनिक संगठन—इसमें सँप्पन रेड (Sappan red) नामक एक लाल रंग, गॉलिक एवं टॉनिक् एसिड तथा उड़नशील तैल आदि पाये जाते हैं। इसमें का रंग होमैटोक्साइलिन (Haematoxylin) से मिलता-जुलता है तथा ईथर, मद्यसार एवं जल में घुल जाता है। पतंग का कायकारी सत्त्व हीमॅटीन (Haematin) से मिलता-जुलता तथा ब्रॅसिलिन (Brasilin) के समान होता है। इसकी राल में एक रवेदार पदार्थ पाया जाता है जो यदि आसुत करके पोटॉश के साथ गलाया जाए तो रीसॉसिन (Resorcin) प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग—यह ग्राही, रक्तसंग्राहक, गर्भाशय के लिये उत्तेजक एवं संकोचक, श्लेष्मघ्न एवं व्रणरोपक है। (१) फुफ्फुस, गर्भाशय एवं आन्त्र आदि स्थानों से रक्तस्राव होने पर इसका क्वाथ पिलाने से लाभ होता है। (२) पुराने व्रणों पर इसके महीन चूर्ण का अवचूर्णन करने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं तथा स्थानिक रक्तस्राव भी बन्द होता है। इसके क्वाथ की पट्टी रखने से स्थानिक रक्तस्राव रुक जाता है। श्वेत प्रदर में इसके क्वाथ की बस्ति दी जाती है। पतंग एवं वनफ्शा के क्वाथ से मांसाबुदों का प्रक्षालन करने से पीड़ा एवं दुर्गन्ध कम हो जाती है। लिचेन (Lichen) नामक त्वग् रोग में इसे पीस कर इसका लेप करते हैं। मात्रा—१-२ माशा। अथ सर्वेषां चन्दनानां मध्ये मलयजस्य श्रेष्ठतामाह— चन्दनानि तु सर्वाणि सदृशानि रसादिभिः। गन्धेन तु विशेषोऽस्ति पूर्वः श्रेष्ठतमो गुणैः ।।२०।। सभी प्रकार के चन्दनों में मलयागिरी चन्दन की उत्तमता—यद्यपि रसादिकों में प्रायः सभी प्रकार के चन्दन समान ही होते हैं, उनमें विशेषता केवल गन्ध की ही रहती है। तथापि उनमें सर्वप्रथम जो मलयागिरी चन्दन है, वही गुणों में सर्वश्रेष्ठ होता है। [२०] अथागुरु कृष्णागुरु च (अगर, काला अगर) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह अगुरु प्रवरं लोहं राजार्हं योगजं तथा। वंशिकं कृमिजं वाऽपि कृमिजग्धमनार्यकम् ।।२१।। अगुरूष्णं कटु त्वच्यं तिक्तं तीक्ष्णञ्च पित्तलम्। लघु कर्णाक्षिरोगघ्नं शीतवातकफप्रणुत् ।।२२।। कृष्णं गुणाधिकं तत्तु लोहवद्वारी मज्जति। अगुरुप्रभवः स्नेहः कृष्णागुरुसमः स्मृतः ।।२३।। अगर तथा काले अगर के नाम और गुण एवं अगर के तेल के गुण—अगुरु, प्रवर, लोह, राजार्ह, योगज, वंशिक, कृमिज, कृमिजग्ध और अनार्यक ये सब अगर के संस्कृत नाम हैं। अगर—उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त रस युक्त, त्वचा के लिये हितकारी, तीक्ष्ण, पित्तजनक, लघु एवम् कान व नेत्र संबंधी रोगों को दूर करने वाला तथा शीत, वात व कफ को नष्ट करने वाला होता है। काला अगर—यह अगर की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है तथा पानी में डालने से लोहे की भाँति डूब जाने वाला होता है। अगर का तेल—अगर से निकाला हुआ तेल गुणों में काले अगर के समान ही समझा जाता है। [२१-२३] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३८१ १०. अगर हिं०-अगर, काला अगर । बं०-अगर काष्ठ, अगुरु चन्दन । म०, गु०-अगर । पं०-ऊद, ऊदारसी । क०, ता०, ते०-कृष्णागरु । अ०-ऊद खाम । अं०-Eagle-wood (ईगल वुड) । ले०-Aquilaria agallocha Roxb. (एक्विलेरिया एगेलोचा राक्स.) Fam. Thymelaeaceae (थाइमेलिएसी) । यह पूर्व हिमालय, आसाम, भूटान, खासिया पहाड़ एवं सिलहट आदि प्रान्तों में पाया जाता है । इसका वृक्ष-बड़ा, ६०-७० फीट ऊँचा, ५-८ फीट व्यास का धारीदार एवं सदाहरित रहता है । काष्ठ-लकड़ी मुलायम, हलकी, लचीली, श्वेत या हलकी पीताभ श्वेत एवं इसमें कोई विशेष गंध नहीं होती । इसमें वार्षिक वृद्धि के वलय नहीं होते तथा मध्यम या छोटे आकार की ३ से ४ अरीय (Radial) वाहिकाओं (Vessels) की कतारें एवं इनके बीच तन्तुगुच्छों का फ्लोएम (Phloem) रहता है । काष्ठसार अलग नहीं दिखलाई देता । पत्ते-विपरीत, २-४.५ × .८-२ इञ्च बड़े, आयताकार भालाकार या कुछ दीर्घवृत्ताकार, चिकने तथा बहुत छोटे नाल से युक्त होते हैं । पुष्प-श्वेत रंग के गुच्छों में आते हैं । फल-१.५-२ इञ्च लम्बे, अभिअंडाकार एवं मृदु रोमावृत होते हैं । अगर-यह सुगन्धित द्रव्य पुराने वृक्षों के काष्ठ में कहीं-कहीं पाया जाता है । यह एक विशेष प्रकार के फफूँद (Fungi Imperfecti) के द्वारा निर्मित विकृतिजन्य परिणाम है । प्राचीनों ने संभवतः इसीलिये इसे 'कृमिज' कहा है । विकृत भाग काला सा तेलिया हो जाता है । जिस वृक्ष में इस प्रकार परिवर्तन हुआ रहता है उन्हें दूर से देखने से ही पता लग जाता है । जहाँ शाखाएं विभक्त होती हैं वहाँ यह अधिक होता है । सिलहट का अगर अच्छा होता है । इसमें के तैलीय अंश के अनुसार इसका रंग हलका या गहरा काला होता है । इसके कोमल काष्ठ के छिद्रों में राल जैसा पदार्थ जमा रहता है । यद्यपि अन्य निघंटुकारों ने इसके कई भेद लिखे हैं तथापि जो अगर देखने में काले रङ्ग का, वजन में भारी, चबाने पर चिपचिपाहट युक्त और पानी में डालने से डूब जाय तथा दियासलाई जला कर लगा देने से जलने लगे वह अगर उत्तम है । इसका स्वाद कड़वा, कसैला तथा तैलिया मालूम होता है । इसमें हलकी मधुर गन्ध होती है जो इसे जलाने पर चारों तरफ फैलती है । सिलहट की तरफ अगर का इत्र बहुत निकाला जाता है । यह निम्न श्रेणी के मुलायम तथा पीताभ श्वेत अगर से निकालते हैं जो करीब ०.७५ से २.५% निकलता है । नोट-भारतवर्ष में प्राचीन काल में अगर का उपयोग सुगन्धि, धूप तथा शीतहर प्रलेप¹ के रूप में किया जा रहा है । अगर तिक्त होते हुए भी उष्ण होता है ।² सुश्रुत इसके तैल को 'दुष्टव्रणशोधन, कृमिकफकुष्ठानिलहर एवं तिक्त, कटु, कषाय मानते हैं (सू० अ० ४५) । सुश्रुत के अनुसार जिसके व्रण में अगर की गन्ध आती हो उस मनुष्य को मुमूर्षु समझना चाहिये (सू० अ० २८) । वाग्भट इसे रसायन मानते हैं । धूप तथा अगरबत्ती बनाने में इसका उपयोग किया जाता है । इसकी छाल से आसाम में कागज भी बनाया करते थे । रासायनिक संगठन-इसमें ईथर में घुलने वाला एक उड़नशील तैल (इत्र) उत्तेजक तथा मद्यसार में घुलने वाली एक राल होती है जो ईथर में नहीं घुलती । मद्यसार में ४८% घुलनशील भाग होता है । गुण और प्रयोग-अगर उष्ण, सुगन्धित, उत्तेजक, वातनाड़ी संस्थान के लिये उत्तेजक, वाजीकर, श्वास एवं कफ हर, वातानुलोमक, शीत प्रशमन, रसायन एवं त्वक् रोगों में लाभदायक है । १. रास्नागुरुणी शीतापनयनप्रलेपनानाम् । (च. सू. अ. २५) २. अर्कगुरुगुडूचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते । (च. सू. अ. २६)

३८२ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) वातरक्त तथा आमवात में इसको देते हैं तथा सन्थिशोथ पर लेप भी करते हैं। (२) ज्वर में इसका फांट पिलाने से प्यास कम होती है एवं रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। (३) चक्कर आना, अंगघात तथा अन्य वातविकारों में इसको खिलाते हैं एवं बाह्य लेप भी करते हैं। (४) हिचकी में मधु के साथ इसके चूर्ण को खिलाया जाता है। (५) अग्निमान्द्य, अरुचि, वमन, अतिसार तथा आँव आदि में इसका चूर्ण खिलाया जाता है। (६) अगर एवं ईश्वरमूल को पीस कर शिरःशूल में एवं बच्चों की खाँसी में छाती पर उसका लेप किया जाता है। इससे खुजली एवं दाह कम होने के कारण रक्त त्वचा (Erythema), त्वक् शोथ, विचर्चिका, गजचर्म एवं फोड़े आदि में इसको जल में घिसकर लगाते हैं। वातिक पीड़ा में भी इससे लाभ होता है। इससे जूँ आदि में भी लाभ होता है। (७) अगर का इत्र-१-२ बूँद इत्र पान पर लगाकर खिलाने से तमकश्वास में आराम मिलता है। वाजीकरण के लिये इसके पुराने इत्र को पान के साथ खिलाते हैं। मात्रा-चूर्ण ५-१५ र०; इत्र १-२ बूँद। अथ देवदारु । तस्य नामानि गुणाँश्चाह देवदारु स्मृतं दारुभद्रं दार्विन्द्रदारु च। मस्तदारु द्रुकिलिमं किलिमं सुरभूरुहः ।।२४।। देवदारु लघु स्निग्धं तिक्तोष्णं कटुपाकि च। विबन्धाध्मानशोथामतन्द्राहिक्काज्वरास्रजित् । प्रमेहपीनसश्लेष्मकासकण्डूसमीरनुत् ।।२५।। देवदारु के नाम तथा गुण-देवदारु, दारुभद्र, दारु, इन्द्रदारु, मस्तदारु, द्रुकिलिम, किलिम और सुरभूरुह ये सब देवदारु के संस्कृत नाम हैं। देवदारु-लघु, स्निग्ध, तिक्त रसयुक्त, उष्णवीर्य, विपाक में कटुरसयुक्त, एवम् विबन्ध, आध्मान, शोथ, आम, तन्द्रा, हिचकी, ज्वर, रक्तदोष, प्रमेह, पीनस, कफ, खाँसी, खुजली तथा वायु को नष्ट करने वाला होता है। [२४-२५] ११. देवदारु हिं०, म० गु०-देवदार। बं०-देवदारु। पहाड़ी-केलोन। ते०-देवदारि चेट्टु। पं०-केलु। ता०-देवदारु चेडि। फा०-देवदार। अं०-Himalayan cedar (हिमालय सिडार); Pinus deodar (पाइनस् देवदार)। ले०-Cedrus deodara (Roxb.) Loud. (सेड्रस् देवदार)। Fam. Pinaceae (पिर्नेसी)। पश्चिमोत्तर हिमालय में कुमाऊँ से पूर्व की ओर यह पाया जाता है। जौनसार और गढ़वाल में ७ से ८ ।। हजार फीट के बीच का भाग देवदारु वृक्षमाला का प्रधान उत्पत्ति स्थान है। इसका वृक्ष-बहुत विशाल, चिरायु, सुन्दर, १६० से १८० फीट तक ऊँचा तथा कहीं-कहीं इससे अधिक ऊँचा होता है। शाखाएँ-दिगन्तसम फैली हुई परन्तु शाखाग्र कुछ नीचे की ओर झुके हुये रहते हैं। पत्ते-त्रिकोण युक्त, सूच्याकार, १-१।। इञ्च लम्बे, लम्बी टहनियों पर एकाकी और पेचदार क्रम से निकले हुये और छोटी टहनियों पर गुच्छों में निकले हुये रहते हैं। फल-शाखाग्रों पर, एकाकी, ४-५ इञ्च लम्बे और ३-४ इञ्च मोटे होते हैं। बीज-१/२ इञ्च तक लम्बे, त्रिकोणाकार या अर्धचन्द्राकार और पक्ष युक्त होते हैं। बीजपत्र-लगभग १० होते हैं। देवदार की सुगन्ध युक्त लकड़ी (काष्ठसार) पीताभ बादामी रंग की तथा तैल से भरी होती है। लकड़ी को जलाकर एक तैल निकालते हैं जिसे केलोन का तेल कहा जाता है। यह तैल बहुत पतला होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ३८३ औषध में काष्ठसार, तैल, पत्र एवं कोमल शाखाओं का व्यवहार किया जाता है। दक्षिण तथा गुजरात की तरफ देवदार नाम से सरल (चीड़ की) की लकड़ी बिकती है। नोट-चरक एवं सुश्रुत में इसका अनेक रोगों में उपयोग किया गया है। रासायनिक संगठन-इसमें केलोन का तैल नामक एक तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-देवदार स्वेदजनन, मूत्रजनन, वातानुलोमक, वात-कफहर एवं त्वग्दोषहर है। इसका तैल टर्पेण्टाइन के समान गुण वाला होता है लेकिन उससे यह कुछ न्यून गुण वाला है। देवदार का प्रयोग ज्वर, जीर्ण आमवात, शिरःशूल, श्लीपद, जलोदर, कास, श्वास, अतिसार, वातिक विकार, शोथ, अश्मरी तथा व्रण में किया जाता है। इसके तैल का प्रयोग कुष्ठ, कफ, कास एवं त्वचा के रोगों में किया जाता है। (१) ज्वर में इसको देने से काफी पसीना निकलता है तथा मूत्र की मात्रा भी बढ़ती है। ज्वर चाहे शोथ से हो या कफजन्य हो इसके प्रयोग से शोथ कम होता है तथा कफ की दुर्गंध दूर होकर कफ कम होता है। (२) जलोदर में देवदार, सहेजन की छाल तथा अपामार्ग प्रत्येक १/२ तो० गोमूत्र में पीसकर देने से मूत्र द्वारा जल निकल जाता है तथा रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। (३) सोजाक, फिरंग, वातरक्त एवं आमवात में देवदार्यादि क्वाथ का रसायन के रूप में प्रयोग करते हैं। (४) श्लीपद में इसको सरसों के तैल के साथ खिलाते हैं तथा चित्रक के साथ गोमूत्र में पीस कर लगाते हैं। (५) वातिक हृद्रोग में देवदार एवं सोंठ को पीसकर पिलाने से हृदय की धड़कन तथा शूल आदि दूर होते हैं। (६) हिक्का तथा श्वास में इसका क्वाथ पीने से लाभ होता है। (७) शिरःशूल में इसे जल में घिसकर कपाल पर लगाते हैं। पुराने शोथ पर हल्दी एवं गुग्गुलु के साथ इसका लेप किया जाता है। (८) इसका तैल-कुष्ठ में बहुत लाभदायक माना जाता है। इसको ,अधिक मात्रा में देना पड़ता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसको खिलाते हैं तथा बाह्य लगाते भी हैं। इससे पुराने तथा दुर्गन्ध युक्त व्रण अच्छे हो जाते हैं। कर्णशूल में इसका तैल डालने से आराम मिलता है। कफज कास में त्रिकटु एवं यवक्षार के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण ३-६ माशा; तेल १०-४० बूँद। अथ सरलः (धूप) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह सरलः पीतवृक्षः स्यात्तथा सुरभिदारुकः। सरलो मधुरस्तिक्तो कटुपाकरसो लघुः ।।२६।। स्निग्धोष्णः कर्णकण्ठाक्षिरोगक्षोहरः स्मृतः। कफानिलस्वेददाहकासमूर्च्छाव्रणापहः ।।२७।। सरल (धूप) अर्थात् चीड़के नाम तथा गुण-सरल, पीतवृक्ष और सुरभिदायक ये सब संस्कृत नाम चीड़ के हैं। चीड़-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, लघु, स्निग्ध तथा उष्ण वीर्य होता है एवम् कर्ण, कण्ठ तथा नेत्र सम्बन्धी रोग, रक्षोग्रह, कफ, वायु, स्वेद (पसीना), दाह, खाँसी, मूर्च्छा तथा व्रण को दूर करने वाला होता है। [२६-२७] १२. धूप सरल हिं०-धूप सरल, चिर, चीढ़, चीड़। बं०-सरलगाछ, तार्पीन तैलेर गाछ। म०-सरल। गु०-सरल देवदार, तेलियो देवदार। ता०-शिरसाल। नेपा०-धूप सलसी। अ०-शज्रतुल बक, सनोवर हिन्दी। फा०-दरख्ते वसक।

भावप्रकाशनिघण्टुः ३८४ अं०-Long-leaved Pine (लांग लीह्वड पाइन); Chir Pine (चीर पाइन)। ले०-Pinus longifolia Roxb. (पाइनस् लांगिफोलिया रॉक्स.)। Fam. Pinaceae (पिर्नेसी)। इसके वृक्ष हिमालय में अफगानिस्तान से लेकर काश्मीर, पञ्जाब, उत्तर प्रदेश, भूटान तथा आसाम एवं वर्मा में २०००-६००० फीट की ऊँचाई तक प्रायः समूहबद्ध होकर उगे हुए पाये जाते हैं। इसकी ४, ५ जातियाँ भारतवर्ष में पाई जाती है जिनमें से पा० एक्सेलसा वाल. (P. excelsa Wall.) तथा पा० खास्या रायली (P. khasya Royle) मुख्य हैं। चीड़ के प्रकाशप्रिय विशाल वृक्ष बहुत सीधे (सरल) तथा १००-१५० फीट ऊँचे होते हैं। स्तम्भ-सीधा, गोल एवं घेरा ५-७ फीट या १२ फीट तक होता है। छाल-खुरदरी, ऊँची-नीची, गढ़ेदार एवं १-२ इञ्च मोटी होती है। काष्ठ-स्निग्ध तथा तीक्ष्णगन्धी होता है। पत्ते-छोटी-छोटी टहनियों के अन्त में ९-१२ इञ्च लम्बे, पतले कुछ-कुछ त्रिकोणयुक्त, हलके हरे रंग के एवं तीन-तीन के समूह में पाये जाते हैं। माघ से चैत्र तक फूलों के गुच्छे लगते हैं। एक वर्ष के उपरान्त में इसके फल या डोडे पकते हैं। नरमञ्जरी प्रायः १/२ इञ्च लम्बी और सामूहिक शंक्वाकार फल (Cone) एकाकी अथवा ३-५ तक एक साथ रहते हैं जिनमें प्रत्येक ४-८ इञ्च लम्बा और ३.५ इञ्च मोटा लट्वाकार होता है। बीजवाहक पत्रों का अग्र मुढ़ा हुआ, मोटा, प्रायः एक तीक्ष्ण काले नोक और पृष्ठ पर ४.५ कोणों से युक्त होता है। चैत्र-वैशाख में फल फट जाते हैं जिनमें से बीज निकलते हैं तथा फल वृक्ष पर ही लगे रहते हैं। बीज १/२ इञ्च से कुछ कम लम्बा, चिपटा, पंखयुक्त (पंख बीज से बड़ा और पतला) और ऊपर से मालाकार होता है। पा० एक्सेलसा (चील या कैल) नामक इसकी उपजाति ६-१० हजार फीट के बीच उत्तरप्रदेश एवं पञ्जाब में पाई जाती है। इसके पत्ते नीलहरित और ५-६ तक प्रतिगुच्छे में होते हैं। सामूहिक फल लम्बगोल होते हैं और बीजवाहक पत्रों के अग्र बहुत मोटे नहीं होते। रासायनिक संगठन-इसके बहिःकाष्ठ (Sapwood) से सहज अथवा क्षत करने से एक प्रकार का तेलिया निर्यास निकल कर जम जाता है जिसे गन्धाबिरोजा कहते हैं। पहले यह सफेद कुछ पतला और गाढ़ा होता है। इसके बाद उत्तरोत्तर अधिक गाढ़ा एवं पीला फिर गहरा पीला हो जाता है। यह चिपचिपा, मुलायम तथा उग्रगन्धयुक्त होता है। पा० एक्सेलसा में निर्यास कम निकलता है पर अधिक अच्छा होता है। गन्धाबिरोजा को बिना जल के ऊर्ध्वनलिका यन्त्र में गरम करके एक गाढ़ा तथा लाल रंग का तैल निकालते हैं जिसे खन्नुतेल या (पं०) सतविरोजा कहते हैं। इसमें गन्धाविरोज़ा की गन्ध रहती है। बिरोजा का आभ्यन्तरिक प्रयोग करने के लिये निम्नलिखित विधि से शुद्ध किये हुये बिरोजे का व्यवहार करना चाहिये। समभाग दूध और जल भरे हुए पात्र पर कपड़ा बाँध, उस पर गन्धाबिरोजा डाल कर नीचे आँच देते हैं, जिससे बिरोजा कपड़े से टपक कर नीचे के पात्र में जम जाता है। इसको निकाल कर सुखा कर रख लें। गन्धाबिरोजा को वाष्प के साथ ऊर्ध्व नलिका यन्त्र द्वारा गरम करने से एक रंगहीन तैल प्राप्त होता है जिसे तारपीन का तेल (Turpentine oil) कहते हैं। ५६ पौंड गन्धाबिरोजा से ८ पौंड तैल निकलता है। तैल निकालने के बाद जो अवशेष रह जाता है उसे डाक्टरी में रेजिन या कोलोफोनि (Resin, Colophony) कहा जाता है। इसे छान कर उबलते हुये जल के साथ कढ़ाई में डाल कर घोटते हैं। जिससे एक काला सा मधु के समान गाढ़ा पदार्थ तैयार होता है जिसे गन्धाबिरोजा का डामर कहते हैं। यह यूरोपीय बरगंडी पिच के समान होता है। यहाँ पर सरल (चीड़) वृक्ष के गुण और प्रयोग दिये जा रहे हैं। आगे 'सरलनिर्यास' के अन्तर्गत गन्धाबिरोजा तथा तारपीन के तैल आदि के गुण और प्रयोग दिये गये हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, दुर्गन्धहर, उत्तेजक, दीपन, वातानुलोमक, स्वेदल, मूत्रल, प्रतिदूषक एवं कफहर है।

कर्पूरादिवर्गः ३८५ इसका आन्तरिक उपयोग अन्य औषधों के साथ क्वाथ के रूप में दाह, कास, मूर्च्छा, आध्मान, अङ्गघात आदि वातिक व्याधियाँ, अश्मरी, कफज्वर, कृमि, श्लेष्मातिसार एवं वातज हिक्का में किया जाता है। इसका लेप व्रण, शोथ, कंठमाला, जन्तुओं के दंश, त्वचा के अनेक विकार एवं वातव्याधियों में किया जाता है। व्रण में इसकी छाल का धुआँ दिया जाता है। इसकी लकड़ी को कपड़ा लपेट कर तथा घृत में डुबोकर जलाते हैं तथा जो तेल टपकता है उसे कान में डालने से कर्णशूल दूर होता है। व्रणरोपण तैलों में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-३ माशा। अथ तगरं पिण्डतगरं च तयोर्नामानि गुणाँश्चाह कालानुसार्यं तगरं कुटिलं नहुषं नतम्। अपरं पिण्डतगरं दण्डहस्ती च बर्हिणम्॥२८॥ तगरद्वयमुष्णं स्यात्स्वादु स्निग्धं लघु स्मृतम्। विषापस्मारशूलाक्षिरोगदोषत्रयापहम् ॥२९॥ तगर तथा पिण्ड तगर के भेद एवं दोनों के नाम और गुण-तगर दो प्रकार का होता है उसमें प्रथम प्रकार के तगर के-कालानुसार्य, तगर, कुटिल, नहुष और नत ये सब संस्कृत नाम हैं। दूसरे प्रकार के तगर के-पिण्डतगर, दण्डहस्ती और बर्हिण ये सब संस्कृत नाम हैं। दोनों प्रकार के तगर-उष्णवीर्य स्वादिष्ट, स्निग्ध तथा लघु होते हैं। यह विष, अपस्मार (मिर्गीरोग), शूल, नेत्ररोग तथा त्रिदोष को दूर करने वाले होते हैं। [२८-२९] १३. तगर हिं०-तगर, सुगन्ध वाला, मुश्क वाला। बं०-तगर पादुका, शुमियो, असारून। म०-तगर गण्ठोडा, तगरमूल। गु०-तगर गण्ठोडा। फा०-असारून। उर्दू-रिशवाल। पं०-बालमुदक, मुश्कवली। अं०-Indian Valerian Rhizome (इण्डियन वेलेरियन हाइमोम)। ले०-Valeriana wallichii DC. (बॅलेरिआना वालिशिआइ)। Fam. Valerianaceae (वॅलेरिॲनेसी)। तगर क्या है इसके सम्बन्ध में पहले मतभेद था। कुछ लोग श्वेत पुष्पवाले एक छोटे वृक्ष टेबर्नी मोण्टॅना कोरोनेरिया (Tabernae montana coronaria B. Br.), हिं०-चाँदनी के मूल को तगर मानते थे। कहीं-कहीं श्यामवर्ण की चंदन जैसी वजनदार लकड़ी बिकती है। बंगाल में कोई जल में उत्पन्न होने वाली घास तथा पंजाब में कोई पीले काष्ठ आदि का व्यवहार किया जाता रहा। लेकिन अब निर्विवाद रूप से यह सिद्ध हो गया है कि ऊपर लिखे हुये वेलेरिआना वालिशिआइ का मूलस्तम्भ (मूल) ही तगर है। बाजार में यह 'सुगन्ध वाला' के नाम से बिकता है तथा इसे वैद्य 'बालकम् या हीबेर' के स्थान पर प्रयोग करते रहे हैं। वास्तव में यह सुगन्धवाला नहीं है। बालक या हीबेर (सुगन्धवाला) का स्वतन्त्र वर्णन आगे दिया हुआ है। बाजार में 'तगर' नाम से जो द्रव्य बिकता है वह कोई निर्गन्ध काष्ठ है और किसी सुगन्धित द्रव्य के साथ रख कर गन्धयुक्त बना दिया जाता है। भारतीय तगर-पाश्चात्य चिकित्सा में व्यवहार में लाये जाने वाले विदेशी वॅलेरियन, वॅलेरिआना ऑफिसिनॅलिस् लिन. (Valeriana offcinalis Linn.) के स्थान में उत्तम प्रतिनिधि माना जाता है। यद्यपि भारतीय तगर अपने यहाँ पर्याप्त होता है तथापि व्यापारी तगर अधिकतर अफगानिस्तान से निर्यात किया हुआ रहता है। भारत में विदेशी तगर (वे० ऑफिसिनॅलिस) बहुत थोड़ी मात्रा में काश्मीर के उत्तर में सोनमर्ग स्थान पर ८ से ९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसकी अन्य उपजाति वे० हार्डविकाइ वाल. (V. hardwickii Wall.) भी वे० वालिचिआइ के साथ पाई जाती है। बाजार में इस तगर को सुगन्धवाला एवं असारून नाम से लोग बेचते हैं। श्री ठा० दलजीतसिंहजी द्वारा लिखित यूनानी द्रव्यगुण विज्ञान में असारुन का ले० नाम असारूम् यूरोपियम् लिन., एरिस्टोलोकिएसी (Asarum europaeum Linn.; Fam. Aristolochiaceae) लिखा हुआ है। स्वरूपादि का वर्णन भी उसी का (अ० २८ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

३८६ भावप्रकाशनिघण्टुः यूरोपियम्) मालूम पड़ता है लेकिन गुण धर्म जो लिखे हैं वे तगर (वेलेरियन) से मिलते लिखे हैं। इन्होंने इसका एक प्रतिनिधि भारतीय भेद माना है जिसको 'तुग्गुर' नाम दिया है। डॉ० देसाई ने तगर (वेलेरिआना वालिचिआइ) एवं असरून (अ० यूरोपियम्) का अलग-अलग वर्णन किया है तथा दोनों के गुण धर्म भी अलग लिखे हैं। डॉ० देसाई ने असरून को वामक, शिरोविरेचक, स्वेदजनन, कफघ्न, संर्सा एवं शोथघ्न लिखा है जो तगर से भिन्न हैं। इसके परिचय में लिखा है कि असरून की जड़ में मिरिच जैसी गन्ध तथा स्वाद कटु (तीता) होता है तथा इसके पंञ्चाग के चूर्ण को सूँघने से छींक आती है। तगर का स्वाद कड़वा एवं गन्ध अलग प्रकार की होती है। डॉ० चोपड़ा भी डॉ० देसाई के मत से सहमत हैं। डॉ० देसाई ने यह स्पष्ट लिखा है कि असरून के समान ही दिखलाई देने वाली लेकिन गुणों में भिन्न एक दूसरी वनस्पति है जिसको तुग्गुर कहते हैं तथा उसका लोग असरून के स्थान पर व्यवहार करते हैं। इस दृष्टि से बाजार में सुगन्धवाला के नाम से बिकने वाला द्रव्य असली तगर (वेलेरिअन) है एवं इसे असरून नाम देना या असरून के स्थान पर प्रयोग करना उचित नहीं है। असरून अलग द्रव्य है। इसी प्रकार सुगन्धवाला भी अलग द्रव्य है। बाजार में तगर नाम से बिकने वाले कृष्ण वर्ण के काष्ठ चूर्ण आदि को भी तगर नहीं मानना चाहिये। इसके क्षुप-हिमालय पहाड़ के साधारण भाग में काश्मीर से भूटान तक ४ से १२ हजार फीट की ऊँचाई पर तथा खासिया के पहाड़ों पर ४ से ६ हजार फीट की ऊँचाई पर बहुत पाये जाते हैं। इसका क्षुप (Herb)-किंचित् रोमश एवं बहुवर्षायु होता है। मूलस्तम्भ-मोटा, अधोगामी मोटे तन्तुओं से युक्त एवं जमीन में दिगन्तसम फैला रहता है। काण्ड-१५.४५ से० मी० ऊँचे एवं प्रायः गुच्छेदार होते हैं। पत्ते-आधारीय पत्र प्रायः २।।-७।। से० मी० व्यास में, लम्बे नाल से युक्त, लट्वाकार, आधार पर गहरे ताम्बूलाकार, तीक्ष्णाग्र तथा धारयुक्त दन्तुर या लहरदार होते हैं। काण्डपत्र संख्या में थोड़े, बहुत छोटे एवं अखंड या खंडित होते हैं। फूल-श्वेत रंग के या कुछ-कुछ गुलाबी होते हैं और समशिख क्रम से शाखाओं पर पाये जाते हैं। ये प्रायः एकलिंगी होते हैं तथा पुंपुष्प एवं स्त्रीपुष्प अलग-अलग क्षुपों पर होते हैं। वृत्तपत्रक (Bracteoles)-फल के इतने लम्बे, आयताकार- रेखाकार होते हैं। बाह्यकोश-पुष्पित होते समय बाह्यदल के खंड क्वचित् व्यक्त लेकिन बाद में करीब १२, रेखाकार, रोमयुक्त खण्डों में दिखलाई देते हैं। आभ्यन्तर कोश-यह कुप्पी के आकार का, पाँच खण्डों से युक्त तथा फैला हुआ होता है। पुंकेशर-संख्या में ३ होते हैं। स्त्रीकेशरी-कुक्षिवृन्त पतला, अविभाजित तथा कुक्षि अग्र में स्थित रहती है। अंडाशय-३ गहरों वाला होता है। फल-रोमश या करीब-करीब रोमहीन होते हैं। इसके मूल तथा मूलस्तम्भ का व्यवहार औषध में किया जाता है। मूलस्तम्भ के अत्यन्त गाँठदार, टेढ़े-मेढ़े, खुरदरे, हलके पीताभ बादामी (Dull yellowish-brown) रंग के, ४-८ से० मी० लम्बे तथा ५-१० मि० मी० मोटे टुकड़े होते हैं। यह कुछ चिपटे से होते हैं। इनके ऊपरी पृष्ठ पर अनेक टूटे हुये पत्तों के निशान तथा अधोपृष्ठ पर टूटे हुए मूल के निशान रहते हैं तथा अधोपृष्ठ से कुछ मोटे मूल निकले हुये रहते हैं। इसका भग्न-छोटा तथा कंटकित होता है। इसका स्पष्ट अनुप्रस्थ (Trausverse) विच्छेद करके देखने से गहरे रंग का बाह्यक (Cortex), मज्जक (Pith), एधा (Cambium) की स्पष्ट रेखा एवं चौड़े मज्जक किरणों (Medullary rays) से पृथक् किये हुये १२-१५ छोटे हलके रंग के दारूपूलों (Xylem bundles) का वर्तुल आदि भाग दिखलाई देते हैं। इसके मूल बहुत से, ६-७ मि० मी० लम्बे एवं १-२ मि० मी० मोटे या कभी-कभी नहीं भी रहते। इसके अन्दर का भाग हलके वर्ण का काष्ठमय एवं छाल गहरे रंग की होती है। तगर में एक विशिष्ट उग्र गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कड़वा होता है। रासायनिक संगठन-भारतीय वेलेरियन (तगर) में एक उड़नशील तैल ०.५-२.१२% पाया जाता है। वसन्त ऋतु में संगृहीत ताजे मूल में इसकी अधिकतम मात्रा होती है। इस तैल में प्रधानतया सेस्क्व्टपैन्‌स (Sesquiterpenes),

कर्पूरादिवर्गः ३८७ वेलेरिक् एसिड (Valeric acid) एवं टर्पेन अल्कोहोल (Terpene alcohols) स्वतन्त्र या ईस्टर के रूप में संयुक्त अवस्था में पाये जाते हैं। इस तैल के अतिरिक्त इसमें ॲराचिडिक् एसिड (Arachidic acid), हेण्ट्रियाकोण्टेन (Hentriacontane) तथा स्नेहीय अम्लों के मिश्रण रहते हैं। ताजे मूल में जल में घुलनशील कार्यकारी पदार्थ अल्प मात्रा में पाये जाते हैं। **गुण और प्रयोग-**यह वातहर, उद्वेष्टिननिरोधी, रक्ताभिसरण एवं वातनाड़ी तन्तुओं के लिये उत्तेजक, चेतनाकारक, स्वापजनक, वातानुलोमक, केन्द्रीय वातनाड़ीसंस्थान के लिये अवसादक एवं स्थानिक वेदनास्थापक तथा व्रणरोपक है। अल्प मात्रा में देने से अन्य सुगन्धित तैलों की तरह इससे आमाशयोर्ध्वप्रदेश में उष्णता मालूम होती है, नाड़ी की गति बढ़ती है तथा कुछ मानसिक उत्तेजना होती है। इससे सांवेदनिक नाड़ियों के अग्र में बधिरता उत्पन्न होती है। अधिक मात्रा में इसको देने से चक्कर आने लगते हैं, हिचकी आती है, वमन होता है एवं हृदयावसाद होता है। (१) अपतन्त्रक, अतत्त्वाभिनिवेश (Hypochondriasis-हाइपोकॉण्ड्रियासिस्), अशान्ति तथा इसी प्रकार की मानसिक व्यथाओं में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। इसके साथ यशदभस्म का उपयोग भी किया जाता है। इसका यह प्रभाव संभवतः इसके अरुचिकारक स्वाद एवं उग्र गन्ध के कारण होता है। कंपवात में भी कभी-कभी इसका उपयोग किया जाता है। (२) जीर्ण ज्वर के कारण जब हृदय तथा सम्पूर्ण शरीर में शिथिलता आई रहती है तथा त्रिदोष की तीव्रता रहती है तब इसके देने से हृदय को बल मिलता है एवं प्रलाप, अस्वस्थता आदि दूर होकर रोगी को चेतना आती है। बेहोशी एवं हृदय की धड़कन में इसका तैल २-५ बूँद की मात्रा में गोंद के साथ मिलाकर दालचीनी के फांट के साथ देते हैं। (३) यह वातानुलोमक होने के कारण आध्मान आदि में इससे लाभ होता है। (४) कुकास, तमकश्वास, जीर्णविबन्ध, पीड़ायुक्त व्रण, घाव, अस्थिभग्न एवं तीव्र आमवात में शोथयुक्त संधिशूल कम करने के लिये इसके फांट का उपयोग करते हैं। (५) वातनाड़ी संस्थान के रोगों के कारण उत्पन्न मधुमेह तथा बहुमूत्र में इसके साथ सूक्ष्म मात्रा में अफीम का प्रयोग किया जाता है। (६) विषम ज्वर में मनैःशिला, यशदभस्म, तगर, भांग या अफीम को पान के रस के साथ गोली बनाकर देते हैं जिससे ज्वर के कारण उत्पन्न मानसिक तथा शारीरिक थकावट कम होती है। शीत ज्वर में पारी न आकर केवल शिरःशूल या उदरशूल हो तो तगर एवं यशदभस्म को देते हैं। **मात्रा-**चूर्ण २-८ र०। अथ पद्मकम्। तस्य नामानि गुणाँश्चाह पद्मकं पद्मगन्धि स्यात्तथा पद्माह्वयं स्मृतम्। पद्मकं तुवरं तिक्तं शीतलं वातलं लघु ॥३०॥ वीसर्पदाहविस्फोटकुष्ठश्लेष्मास्रपित्तनुत् । गर्भसंस्थापनं रुच्यं¹ वमिव्रणतृषाप्रणुत् ॥३१॥ **पद्माख के नाम तथा गुण-**पद्मक, पद्मगन्धि तथा पद्माह्वय (कमल के पर्याय वाचक समस्त शब्द) ये सब पद्माख के संस्कृत नाम हैं। **पद्माख-**कषाय तथा तिक्तरस युक्त, शीतवीर्य, वातजनक तथा लघु होता है एवं विसर्प, दाह, विस्फोट, कुष्ठ, कफ और रक्तपित्त को दूर करता है। यह गर्भ का स्थापन करने वाला, रुचिकारक एवं वमन, व्रण तथा तृषा को दूर करने वाला होता है। [३०-३१] १. 'वृष्यमिति' पाठा०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA