भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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कर्पूरादिवर्गः ३८३ औषध में काष्ठसार, तैल, पत्र एवं कोमल शाखाओं का व्यवहार किया जाता है। दक्षिण तथा गुजरात की तरफ देवदार नाम से सरल (चीड़ की) की लकड़ी बिकती है। नोट-चरक एवं सुश्रुत में इसका अनेक रोगों में उपयोग किया गया है। रासायनिक संगठन-इसमें केलोन का तैल नामक एक तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-देवदार स्वेदजनन, मूत्रजनन, वातानुलोमक, वात-कफहर एवं त्वग्दोषहर है। इसका तैल टर्पेण्टाइन के समान गुण वाला होता है लेकिन उससे यह कुछ न्यून गुण वाला है। देवदार का प्रयोग ज्वर, जीर्ण आमवात, शिरःशूल, श्लीपद, जलोदर, कास, श्वास, अतिसार, वातिक विकार, शोथ, अश्मरी तथा व्रण में किया जाता है। इसके तैल का प्रयोग कुष्ठ, कफ, कास एवं त्वचा के रोगों में किया जाता है। (१) ज्वर में इसको देने से काफी पसीना निकलता है तथा मूत्र की मात्रा भी बढ़ती है। ज्वर चाहे शोथ से हो या कफजन्य हो इसके प्रयोग से शोथ कम होता है तथा कफ की दुर्गंध दूर होकर कफ कम होता है। (२) जलोदर में देवदार, सहेजन की छाल तथा अपामार्ग प्रत्येक १/२ तो० गोमूत्र में पीसकर देने से मूत्र द्वारा जल निकल जाता है तथा रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। (३) सोजाक, फिरंग, वातरक्त एवं आमवात में देवदार्यादि क्वाथ का रसायन के रूप में प्रयोग करते हैं। (४) श्लीपद में इसको सरसों के तैल के साथ खिलाते हैं तथा चित्रक के साथ गोमूत्र में पीस कर लगाते हैं। (५) वातिक हृद्रोग में देवदार एवं सोंठ को पीसकर पिलाने से हृदय की धड़कन तथा शूल आदि दूर होते हैं। (६) हिक्का तथा श्वास में इसका क्वाथ पीने से लाभ होता है। (७) शिरःशूल में इसे जल में घिसकर कपाल पर लगाते हैं। पुराने शोथ पर हल्दी एवं गुग्गुलु के साथ इसका लेप किया जाता है। (८) इसका तैल-कुष्ठ में बहुत लाभदायक माना जाता है। इसको ,अधिक मात्रा में देना पड़ता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसको खिलाते हैं तथा बाह्य लगाते भी हैं। इससे पुराने तथा दुर्गन्ध युक्त व्रण अच्छे हो जाते हैं। कर्णशूल में इसका तैल डालने से आराम मिलता है। कफज कास में त्रिकटु एवं यवक्षार के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण ३-६ माशा; तेल १०-४० बूँद। अथ सरलः (धूप) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह सरलः पीतवृक्षः स्यात्तथा सुरभिदारुकः। सरलो मधुरस्तिक्तो कटुपाकरसो लघुः ।।२६।। स्निग्धोष्णः कर्णकण्ठाक्षिरोगक्षोहरः स्मृतः। कफानिलस्वेददाहकासमूर्च्छाव्रणापहः ।।२७।। सरल (धूप) अर्थात् चीड़के नाम तथा गुण-सरल, पीतवृक्ष और सुरभिदायक ये सब संस्कृत नाम चीड़ के हैं। चीड़-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, लघु, स्निग्ध तथा उष्ण वीर्य होता है एवम् कर्ण, कण्ठ तथा नेत्र सम्बन्धी रोग, रक्षोग्रह, कफ, वायु, स्वेद (पसीना), दाह, खाँसी, मूर्च्छा तथा व्रण को दूर करने वाला होता है। [२६-२७] १२. धूप सरल हिं०-धूप सरल, चिर, चीढ़, चीड़। बं०-सरलगाछ, तार्पीन तैलेर गाछ। म०-सरल। गु०-सरल देवदार, तेलियो देवदार। ता०-शिरसाल। नेपा०-धूप सलसी। अ०-शज्रतुल बक, सनोवर हिन्दी। फा०-दरख्ते वसक।