भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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३८२ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) वातरक्त तथा आमवात में इसको देते हैं तथा सन्थिशोथ पर लेप भी करते हैं। (२) ज्वर में इसका फांट पिलाने से प्यास कम होती है एवं रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। (३) चक्कर आना, अंगघात तथा अन्य वातविकारों में इसको खिलाते हैं एवं बाह्य लेप भी करते हैं। (४) हिचकी में मधु के साथ इसके चूर्ण को खिलाया जाता है। (५) अग्निमान्द्य, अरुचि, वमन, अतिसार तथा आँव आदि में इसका चूर्ण खिलाया जाता है। (६) अगर एवं ईश्वरमूल को पीस कर शिरःशूल में एवं बच्चों की खाँसी में छाती पर उसका लेप किया जाता है। इससे खुजली एवं दाह कम होने के कारण रक्त त्वचा (Erythema), त्वक् शोथ, विचर्चिका, गजचर्म एवं फोड़े आदि में इसको जल में घिसकर लगाते हैं। वातिक पीड़ा में भी इससे लाभ होता है। इससे जूँ आदि में भी लाभ होता है। (७) अगर का इत्र-१-२ बूँद इत्र पान पर लगाकर खिलाने से तमकश्वास में आराम मिलता है। वाजीकरण के लिये इसके पुराने इत्र को पान के साथ खिलाते हैं। मात्रा-चूर्ण ५-१५ र०; इत्र १-२ बूँद। अथ देवदारु । तस्य नामानि गुणाँश्चाह देवदारु स्मृतं दारुभद्रं दार्विन्द्रदारु च। मस्तदारु द्रुकिलिमं किलिमं सुरभूरुहः ।।२४।। देवदारु लघु स्निग्धं तिक्तोष्णं कटुपाकि च। विबन्धाध्मानशोथामतन्द्राहिक्काज्वरास्रजित् । प्रमेहपीनसश्लेष्मकासकण्डूसमीरनुत् ।।२५।। देवदारु के नाम तथा गुण-देवदारु, दारुभद्र, दारु, इन्द्रदारु, मस्तदारु, द्रुकिलिम, किलिम और सुरभूरुह ये सब देवदारु के संस्कृत नाम हैं। देवदारु-लघु, स्निग्ध, तिक्त रसयुक्त, उष्णवीर्य, विपाक में कटुरसयुक्त, एवम् विबन्ध, आध्मान, शोथ, आम, तन्द्रा, हिचकी, ज्वर, रक्तदोष, प्रमेह, पीनस, कफ, खाँसी, खुजली तथा वायु को नष्ट करने वाला होता है। [२४-२५] ११. देवदारु हिं०, म० गु०-देवदार। बं०-देवदारु। पहाड़ी-केलोन। ते०-देवदारि चेट्टु। पं०-केलु। ता०-देवदारु चेडि। फा०-देवदार। अं०-Himalayan cedar (हिमालय सिडार); Pinus deodar (पाइनस् देवदार)। ले०-Cedrus deodara (Roxb.) Loud. (सेड्रस् देवदार)। Fam. Pinaceae (पिर्नेसी)। पश्चिमोत्तर हिमालय में कुमाऊँ से पूर्व की ओर यह पाया जाता है। जौनसार और गढ़वाल में ७ से ८ ।। हजार फीट के बीच का भाग देवदारु वृक्षमाला का प्रधान उत्पत्ति स्थान है। इसका वृक्ष-बहुत विशाल, चिरायु, सुन्दर, १६० से १८० फीट तक ऊँचा तथा कहीं-कहीं इससे अधिक ऊँचा होता है। शाखाएँ-दिगन्तसम फैली हुई परन्तु शाखाग्र कुछ नीचे की ओर झुके हुये रहते हैं। पत्ते-त्रिकोण युक्त, सूच्याकार, १-१।। इञ्च लम्बे, लम्बी टहनियों पर एकाकी और पेचदार क्रम से निकले हुये और छोटी टहनियों पर गुच्छों में निकले हुये रहते हैं। फल-शाखाग्रों पर, एकाकी, ४-५ इञ्च लम्बे और ३-४ इञ्च मोटे होते हैं। बीज-१/२ इञ्च तक लम्बे, त्रिकोणाकार या अर्धचन्द्राकार और पक्ष युक्त होते हैं। बीजपत्र-लगभग १० होते हैं। देवदार की सुगन्ध युक्त लकड़ी (काष्ठसार) पीताभ बादामी रंग की तथा तैल से भरी होती है। लकड़ी को जलाकर एक तैल निकालते हैं जिसे केलोन का तेल कहा जाता है। यह तैल बहुत पतला होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA